Maharashtra Chunav: फेल हुआ मराठी बनाम गुजराती वाला दांव! MVA या महायुति में किसे लगेगा झटका?
Maharashtra Chunav 2024: महाराष्ट्र में मतदाताओं ने गुरुवार को सारी आशंकाओं को ध्वस्त करते हुए मतदान का 29 साल का रेकॉर्ड तोड़ दिया है। मायानगरी मुंबई में भी पिछले कई चुनावों के बाद पहले से ज्यादा तादाद में मतदाताओं ने मतदान किया है। इस चुनाव में कई सारे नकारात्मक प्रचार किए गए। इनमें से एक नैरेटिव इस चुनाव को मराठी बनाम गुजराती करने की चलाई गई। लेकिन, लगता है कि यह नकारात्मक कोशिश धाराशायी हो गई है।
टीओआई की एक रिपोर्ट को देखने से लगता है कि खासकर मुंबई के वोटरों ने विभाजनकारी नैरेटिव को नकारते हुए देश और प्रदेश के कल्याण के लिए विकास के मुद्दे पर वोट डाला है। जबकि, पूरे चुनाव में वोटरों के बीच एक दीवार खींचने के लिए 'सारे उद्योग महाराष्ट्र से गुजरात भेजे जा रहे हैं'वाले दावे किए जा रहे थे।

उद्धव और एमवीए की ओर से चला गया था दांव
दरअसल, यह दांव इस सोच के साथ चला गया था कि मराठियों का भावनात्मक मुद्दा उछाल कर उनके वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके। चुनाव प्रचार के आखिरी दिन एक चुनावी रैली में शिवसेना-यूबीटी चीफ उद्धव ठाकरे ने यह बताने की कोशिश की थी कि किस तरह से कथित तौर पर गुजरातियों का दखल बढ़ता जा रहा है।
गुजराती-मराठी के बीच दरार पैदा करने की कोशिश!
हालांकि, उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर कथित रूप से दोनों राज्यों में दरार पैदा करने का आरोप लगाया था। उन्होंने एक तरफ गुजरातियों से 'अपने असली दुश्मन' को पहचानने की भी गुजारिश की थी। साथ ही साध एक तरह से यह कहकर धमकाने की भी कोशिश की थी कि उनका किसी भी तरह से ध्रुवीकरण करना, उनके समुदाय के लंबे समय के हित के लिए सही नहीं होगा।
वोटरों ने विभाजन की साजिश को नाकाम कर दिया!
दरअसल, मुंबई के मालाबार हिल, कांदिवली ईस्ट, बोरिवली और विले पार्ले जैसे इलाकों को भाजपा का गढ़ माना जाता है। यहां बड़ी तादाद में गुजराती बोलने वाले लोग रहते हैं। वहीं पड़ोस के शिवाजी पार्क, लालबाग और वर्ली जैसे इलाके परंपरागत तौर पर शिवसेना के प्रभाव वाले इलाके रहे हैं। यहां मराठी-भाषी लोगों की बहुलता है।
विकास के नाम पर पड़े वोट
लेकिन, बुधवार को इन इलाकों के वोटरों के रुख से यही लगा है कि उन्होंने विभाजनकारी सियासत की कोशिशों की घज्जियां उड़ा दी हैं। एक रिटायर्ड बैंक हसमुख मेहता का कहना है, 'हम यहां शांति से रहते हैं। राजनेता हमे बांटने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन हमें ज्यादा समझ है।'
तिलक रोड इलाके की 20 वर्षीय युवा मतदाता प्रियंका शाह कहती हैं कि उनका फैसला विकास के लिए है। उन्होंने कहा, 'मैंने इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए वोट दिया है, बेहतर सड़कों और सार्वजनिक स्थानों के लिए। मेरा वोट किसी भी समुदाय के खिलाफ नहीं है।'
दहिसर में भाजपा की मनिषा चौधरी को लगा कि गुजराती वोटरों में उनकी पार्टी का 'बटेंगे तो कटेंगे' का नारा काम कर रहा है। वैसे शिवसेना-यूबीटी के संजय भोसले मराठी-भाषी बहुल क्षेत्रों में ज्यादा मतदान का गुणा गणित समझने की कोशिशों में लगे दिखे। वहीं एमएनएस के कुनाल मणिकर को लगा कि बोरिवली और चारकोप में कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा।
शिवसेना के परंपरागत गढ़ में भी विकास का मुद्दा रहा प्रभावी
इसी तरह से भांडुप जैसे शिवसेना के गढ़ माने जाने वाले क्षेत्र में सेना से जुड़े तीनों दलों का प्रभाव नजर आया। एक स्थानीय वोटर आनंद डौंडे के मुताबिक, 'इस बार तीन सेना है, शिवसेना, यूबीटी और एमएनएस, सबके मजबूत जनाधार हैं।' इन तीनों के लिए मराठी वोट अहम हैं। लेकिन, यहां के मतदाताओं में रिडेवलपमेंट प्रोजेक्ट और स्लम रिहैबिलिटेशन पर नजर है और वैसे दल पर दांव लगाया है, जो इसे पूरा कर सकें।
उद्धव और एमवीए को लग सकता है झटका!
मतलब, भाषा, समुदाय या पहचान कोई मुद्दा है,ऐसा कहीं नहीं दिखा। सबने बेहतर सड़कों, आवास और स्कूलों के बारे में सोचकर वोट डाला। अगर, मतदाताओं की ये सोच चुनाव नतीजों में तब्दील होती है तो विपक्षी महा विकास अघाड़ी (MVA) को झटका लग सकता है, जिनकी ओर से मराठी-भाषी वोटरों के ध्रुवीकरण का दांव चलने की कोशिश की गई थी, लेकिन लगता है कि उन्होंने इसकी जगह विकास को प्राथमिकता दी है।
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