Maharashtra Chunav: क्या है 'MADHAV' फॉर्मूला, जिसमें मराठा आंदोलन की काट देख रही है BJP?

Maharashtra Chunav 2024: महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों की घोषणा हरियाणा और जम्मू और कश्मीर विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद कभी भी हो सकती है। बीजेपी राज्य विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी है और महायुति सरकार में ही नहीं, सदन में भी उसके सबसे ज्यादा विधायक हैं। इस वजह से पार्टी ने चुनाव तारीखों की औपचारिक घोषणा से पहले ही अपनी चुनावी रणनीतियों पर अमल करना शुरू कर दिया है। इसमें से एक है 'माधव' फॉर्मूले पर फिर से गंभीरता से काम करना।

भारत की चुनावी राजनीति में एक कटु सत्य ये है कि मतदान से पहले चाहे जितनी तरह की बातें हों और जो भी मुद्दे उछाले जाएं, लेकिन वोटिंग होते-होते आमतौर पर सबकुछ जातिगत समीकरणों पर ही जाकर सिमट जाता है। बीजेपी का माधव फॉर्मूला भी उसी जातिगत वोट बैंक पर जोर देने वाला है।

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क्या है 'माधव' फॉर्मूला?
दरअसल, अंग्रेजी का यह MADHAV (माधव) शब्द तीन ओबीसी जातियों पर आधारित समीकरण है। ये हैं- माली, धनगर और वंजारी समाज। महाराष्ट्र में यह तीनों ही सबसे प्रभावशाली ओबीसी जातियां हैं। विधानसभा और विधान परिषद में इनका ओबीसी में सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व रहता है। इनमें अकेले धनगरों की आबादी लगभग 10% बताई जाती है और माली और वंजारी भी उनके बाद बहुतायत में हैं।

मराठाओं की नाराजगी के बीच बीजेपी को इस बार के लोकसभा चुनावों में मराठवाड़ा में एक भी सीट नहीं मिली और पश्चिमी महाराष्ट्र में सिर्फ 2 ही सीटें निकाल पाई। यही वजह है कि बीजेपी अपने माधव फॉर्मूले पर फिर से फोकस कर रही है।

पार्टी नेताओं को लग रहा है कि मराठा आरक्षण पर अस्पष्टता की वजह से ये जातियां भी उससे दूर हुई हैं। ईटी के मुताबिक एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा है कि इन जातियों में अपनी पकड़ फिर से जमाने के लिए पार्टी को इनके उम्मीदवारों को टिकट देना जरूरी है।

पिछली बार मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र में अच्छा रहा था बीजेपी का प्रदर्शन
मराठवाड़ा में 46 और पश्चिम महाराष्ट्र में विधानसभा की 70 सीटें हैं, जो कि महाराष्ट्र के किसी भी क्षेत्र से सबसे ज्यादा हैं। 2019 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को पश्चिम महाराष्ट्र में 20 (39 पर लड़ी) और मराठवाड़ा में 16 (26 पर लड़ी) सीटें मिली थीं।

पुराने वोट बैंक को सहेजने की कोशिश में भाजपा
लेकिन, मराठा आरक्षण की मांग को लेकर इस समाज की पार्टी से नाराजगी ने बीते लोकसभा चुनावों में इसका सीन खराब कर दिया। यही वजह है कि पार्टी अपने आजमाए हुए पुराने फॉर्मूले पर फिर से फोकस कर रही है। इसी कड़ी में हाल ही में महायुति सरकार ने अहमदनगर का नाम अहिल्यादेवी होल्कर के नाम पर अहिल्यानगर किया है। अहिल्यादेवी को धनकर समाज देवी स्वरूप में देखता है।

कुनबी, तेली और हिंदू दलित भी बीजेपी के चुनावी एजेंडे में
इसी तरह से विदर्भ इलाके में 62 सीटें हैं। नागपुर भी इसी क्षेत्र में आता है, जो कि आरएसएस का मुख्यालय है। लेकिन, इसके बाद भी लोकसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन बहुत ही निराशाजनक रहा था। पार्टी को लगता है कि कांग्रेस के दलित, मुस्लिम और कुनबी रणनीति का सिक्का चल गया था। इस क्षेत्र में तेली समाज की भी प्रभावी आबादी है, जो कि ओबीसी है। बीजेपी को लगता है कि यह समाज भी उससे छिटका है।

इस वजह से पार्टी विदर्भ में तेली समाज को फिर से अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले इसी जाति से आते हैं और वह भी विदर्भ क्षेत्र के ही हैं। इनके अलावा पार्टी एक और ओबीसी कुनबी के अलावा हिंदू दलितों पर भी डोरे डालने में जुटी है। इस क्षेत्र में कई दलितों ने बौद्ध धर्म अपना लिया है।

मराठा आंदोलन की काट खोज रही बीजेपी?
मराठा आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे मराठा राज्य में सबसे प्रभावशाली जाति मानी जाती है। करीब 30% आबादी की वजह से इनका राजनीतिक तौर पर भी बहुत दबदबा रहा है। यह अपने लिए सरकार से कुनबी या ओबीसी सर्टिफिकेट की मांग कर रहे हैं। लेकिन, ओबीसी से जुड़ी जातियां उन्हें ओबीसी के तहत आरक्षण देने का विरोध कर रही हैं।

इस तरह से बीजेपी की रणनीति उन ओबीसी जातियों पर फोकस करने की लग रही है, जो मराठा को ओबीसी दर्जा दिए जाने के विरोध में हैं। पार्टी को लगता है कि लोकसभा चुनाव में अस्पष्टता की वजह से ये जातियां भी उससे दूर रह गई थीं, लेकिन अब उन्हें गोलबंद करने का समय आ चुका है।

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