Bombay HC Single Mother Verdict: सिंगल मदर पर हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला,कहा- बच्चे की पहचान पिता से नहीं
Bombay High Court Single Mother Verdict: बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ (Bombay High Court Aurangabad Bench) ने 'सिंगल मदर्स' और उनके बच्चों के अधिकारों को लेकर एक ऐसा ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जो सदियों पुरानी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को चुनौती देता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी बच्चे का पालन-पोषण केवल उसकी मां ने किया है, तो उसे उस पिता की पहचान (नाम और जाति) ढोने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जिसका उसके जीवन से कोई संबंध नहीं है।

दरअसल, बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक दुष्कर्म पीड़िता मां और उसकी 12 साल की बेटी की याचिका पर सुनवाई करते हुए समाज और प्रशासन को आईना दिखाया है। जस्टिस विभा कांकणवाड़ी और जस्टिस हितेन वेणुगावकर की पीठ ने आदेश दिया कि स्कूल रिकॉर्ड से पिता का नाम और उपनाम हटाकर मां की पहचान दर्ज की जाए। कोर्ट ने कहा कि पहचान गरिमा का हिस्सा है और अनुच्छेद 21 ( Single Mother Rights Article 21) के तहत हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है।
Father Name Removal School Records: क्या था पूरा मामला, जिस पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला
यह पूरा मामला 12 वर्षीय बच्ची और उसकी मां से जुड़ा है। मां एक यौन उत्पीड़न (रेप पीड़िता) की शिकार हुई थी। डीएनए टेस्ट से आरोपी का बायोलॉजिकल पिता होना सिद्ध हुआ, लेकिन उसने बच्चे और मां की जिम्मेदारी लेने के बजाय अलग रहना चुना। कानूनी समझौते के तहत बच्ची की स्थायी कस्टडी मां को मिली।
बच्ची के जन्म प्रमाणपत्र और स्कूल रिकॉर्ड में पिता का नाम और उसकी जाति 'मराठा' दर्ज थी। जब मां ने स्कूल से इसमें संशोधन की मांग की, तो स्कूल प्रशासन ने सरकारी नियमों (Secondary School Code) का हवाला देकर इससे इनकार कर दिया था। इसके बाद मां और बच्ची ने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
Bombay High Court की तल्ख टिप्पणी: क्यों जोड़ा जाए ऐसे पिता से नाम, जो जीवन में मौजूद ही नहीं?
हाई कोर्ट ने सवाल उठाया कि बच्चे की पहचान ऐसे पिता से क्यों जोड़ी जाए, जिसका उसके जीवन में कोई सक्रिय या भावनात्मक संबंध नहीं है? कोर्ट ने कहा कि समाज अगर खुद को विकसित और प्रगतिशील मानता है, तो वह इस बात पर ज़ोर नहीं दे सकता कि बच्चे की सार्वजनिक पहचान उस पिता से जुड़ी हो, जो उसकी ज़िंदगी से पूरी तरह गायब है, जबकि मां अकेले पूरे पालन-पोषण की जिम्मेदारी निभा रही है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में प्रशासनिक ढांचे में पैठी पितृसत्तात्मक सोच पर कड़ा प्रहार किया। पीठ ने कहा- बच्चे की नागरिक पहचान के लिए सिंगल मदर को 'पूर्ण अभिभावक' मानना कोई दान या दया नहीं है, बल्कि यह संविधान के प्रति निष्ठा है। समाज यह जिद नहीं कर सकता कि बच्चे की पहचान उसी पिता से जुड़ी रहे जो उसके जीवन से गायब है। कोर्ट ने आगे कहा कि पहचान को केवल पिता के जरिए तय करना समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन है। यह उस सोच का हिस्सा है जहां वंश को केवल पुरुषों की संपत्ति माना जाता रहा है।
स्कूल रिकॉर्ड: निजी नोट नहीं, सार्वजनिक दस्तावेज
अक्सर स्कूल ऐसे बदलावों को यह कहकर टाल देते हैं कि उनके पास अधिकार नहीं है। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्कूल रिकॉर्ड बच्चे के साथ वर्षों तक चलते हैं और उनके प्रोफेशनल जीवन का आधार बनते हैं। यदि मां एकमात्र अभिभावक और स्वाभाविक संरक्षक (Natural Guardian) है, तो पिता का नाम अनिवार्य रखना प्रशासनिक निष्पक्षता नहीं है। ऐसे 'स्पेशल केस' में रिकॉर्ड में सुधार करना किसी सार्वजनिक मकसद को नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि बच्चे को सामाजिक असुरक्षा से बचाता है।
जाति बदलने पर क्या कहा कोर्ट ने
बच्ची ने स्कूल रिकॉर्ड में अपनी जाति 'मराठा' से बदलकर 'अनुसूचित जाति' करने की भी मांग की थी, क्योंकि उसका पालन-पोषण अनुसूचित जाति की मां कर रही है। इस पर कोर्ट ने संतुलित रुख अपनाते हुए कहा जाति मनमाने तरीके से नहीं बदली जा सकती। कोर्ट ने कहा कि राज्य किसी बच्चे को उस पिता की जाति रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकता जिससे उसका स्थायी अलगाव हो चुका है।
स्कूल जाति प्रमाणन प्राधिकरण नहीं है लेकिन विशेष परिस्थितियों में रिकॉर्ड में मौजूद स्पष्ट गलती को सुधारा जा सकता है कोर्ट ने कहा कि राज्य किसी बच्चे को सख्त, पुरुष-प्रधान नियमों के तहत मजबूर नहीं कर सकता कि वह उस पिता की जाति धारण करे, जिससे उसका कोई सामाजिक या पारिवारिक संबंध नहीं है।
गरिमा को अधिकार मानने की ओर बदलाव
यह फैसला पिता की जाति को मानने की पुरानी धारणा से हटकर 'गरिमा को अधिकार' मानने की दिशा में एक बड़ा कदम है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि राज्य के नियम नैतिक निर्णय नहीं होने चाहिए, बल्कि उन्हें लोक कल्याण का साधन होना चाहिए।
यह फैसला देश की लाखों उन महिलाओं के लिए एक ढाल बनेगा जो अकेले अपने बच्चों का भविष्य संवार रही हैं। यह फैसला न सिर्फ सिंगल मदर्स के अधिकारों को कानूनी मान्यता देता है, बल्कि भारतीय प्रशासनिक ढांचे में गहराई से जमी पितृसत्तात्मक सोच पर भी सवाल खड़े करता है। हाई कोर्ट का यह आदेश आने वाले समय में स्कूलों, प्रशासनिक संस्थाओं और नीति-निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है।
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