मतदान: गांव की घूंघट वाली महिलाओं ने शहर की मॉर्डन महिलाओं को पछाड़ा
सागर, 08 जुलाई। शहरों की पढी-लिखी मॉर्डन महिलाएं लोकतंत्र के महायज्ञ मतदान में गांव की घुंघट वाली महिलाओं से लगातार पिछड रही हैं। आम धारणा है कि गांव की महिलाएं घरों की दहलीज कम पार करती हैं, घूंघट प्रथा और सामाजिक तानाबाना बडा कारण है, लेकिन इसके उलट शहरों में शिक्षा के स्तर से लेकर नौकरी पेशा महिलाएं कई मायनों में मॉर्डन मानी जाती हैं। लेकिन मतदान के मामले में स्थिति एकदम उलट नजर आ रही है।

मप्र में पिछले दिनों हुए त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव के दो चरण संपन्न हुए तो बीच में नगरीय निकाय चुनाव का पहला चरण संपन्न हुआ। शुक्रवार को पंचायत चुनाव के लिए तीसरा और आखिरी चरण का मतदान समाप्त हो गया है। मतदान के दौरान एक खास बात सामने आई कि पंचायत स्तर पर ग्रामीण इलाकों में मतदान को लेकर शहरों की अपेक्षा ज्यादा उत्साह और जागरुकता है। यह स्थिति अकेले किसी एक इलाके में नहीं बल्कि पूरे मप्र में सामने आई है। ग्रामीण इलाकों में जहां मतदान का प्रतिशत 70 से 83 प्रतिशत हो रहा है, वहीं शहरों में यह 60 से 65 के आसपास सिमट गया है। जबकि शहरों में शिक्षा का स्तर, अपने वोट की ताकत के प्रति जागरुकता, राजनीति की समझ, अपने अधिकारों का ज्ञान ज्यादा होता है।
गांव की महिलाओं ने ज्यादा दिखाई वोट की ताकत
बुंदेलखंड के संभागीय मुख्यालय सागर से लेकर दमोह, छतरपुर, टीकमगढ, पन्ना, निवाडी जिलों से लेकर राजधानी भोपाल तक गांव की महिलाओं ने तो कमाल कर दिया। चुनाव में आश्चर्यजनक रुप से पूरे प्रदेश में महिला मतदान का प्रतिशत एकदम से बढ गया है, जबकि शहरों में यह कुल मतदान के साथ घट गया है। पंचायत, जनपद व जिला पंचायत चुनाव में गांव में महिलाओं का वोट प्रतिशत पुरुषों की अपेक्षा 4 से 8 फीसदी तक अधिक है। जबकि शहरों में इसके विपरीत महिला मतदान का प्रतिशत पुरुषों की अपेक्षा 5 से 10 प्रतिशत तो कहीं कहीं इससे कम भी रहा।












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