निकाय चुनाव: निकायों में दोहरी जिम्मेदारी का जिले में इतिहास पुराना, पांच दशक से चली आ रही परंपरा
सागर, 21 जून। मप्र के सागर जिले में नगरीय निकाय के अध्यक्ष द्वारा दोहरी सांवैधानिक जिम्मेदारी के निर्वहन की परंपरा काफी पुरानी रही है। करीब 5 दशक पुरानी यह परंपरा बीते कार्यकाल तक कायम रही है। दरअसल सागर में ऐसे चार व्यक्ति हैं जो नपा अध्यक्ष, महापौर और निगम अध्यक्ष रहते हुए सांसद और विधायक चुने गए, बावजूद इसके इन्होंने दोनों जिम्मेदारी का एक साथ निर्वहन किया है।

राजनीति में नई पीढ़ी को नगरीय निकाय प्रमुख होने के साथ विधायक भी होने के मामले में कैलाश विजयवर्गीय का नाम ही याद आता है, लेकिन सागर में यह पांच दशक पूर्व ही हो चुका था और उसके ढाई दशक के बाद रहली विस में भी यह दोहराया जा चुका है। नगरीय निकायों से राजनीति शुरू कर जिले के कई नेता विधायक और मंत्री बने है, लेकिन 4 नेताओं के नाम यह रिकार्ड दर्ज है कि वह महापौर, नपाध्यक्ष रहने के दौरान ही विधायक और सांसद भी बने।
साल 1962 में सबसे पहली शुरूआत
सागर से दिवंगत कांग्रेस नेता डालचंद जैन 1962 में हुए सीधे निर्वाचन में सागर नपाध्यक्ष बने थे वह इस पद पर रहने के साथ ही 1967 में सागर से ही विधायक भी निर्वाचित हुए। लगभग यही स्थिति दो दशक बाद रहली विधानसभा क्षेत्र में भी बनी। प्रदेश के सबसे वरिष्ठतम मंत्री गोपाल भार्गव जिनकी राजनीति की शुरुवात छात्र संघ से हुई थी। 1981 में वह गढ़ाकोटा नपाध्यक्ष निर्वाचित हुए थे जो अगले तीन साल तक रहे और उसके बाद हुए विस चुनाव में जीते। उसके बाद से अब लगातार आठ बार से वह विधायक निर्वाचित होते आ रहे है। यही किस्सा एक बार फिर 2008 के चुनाव में नरयावली में हुआ, जब यहां से सागर नगर निगम के महापौर प्रदीप लारिया विधायक चुने गए।
वर्तमान सांसद ने भी दो पद संभाले
सागर लोकसभा से सांसद राजबहादुर सिंह ने भी दो पद एक साथ संभाले हैं। वे नगर निगम अध्यक्ष रहते हुए सांसद चुने गए थे। सांसद रहते हुए उन्होंने नगर निगम परिषद का संचालन किया। हालांकि यह काफी कम समय के लिए रहे, लेकिन निगम परिषद का कार्यकाल समाप्त होने तक वे दो पदों पर आसीन रहे थे।












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