मध्य प्रदेश में ऑक्‍सीजन-बेड की भारी किल्‍लत, अस्‍पतालों के अभाव में घरों पर ही दम तोड़ रहे मरीज

इंदौर। मध्य प्रदेश में बड़े शहरों के अस्‍पतालों में ऑक्सीजन की किल्‍लत है। इस वजह से कोरोना मरीजों को ऑक्सीजन सपोर्ट वाले बेड नहीं मिल पा रहे और उनकी जानें जा रही हैं। अस्‍पताल से मरीजों के परिजनों को एडमिट कराए बगैर लौटना पड़ जाता है, और घर पर मरीज की हालात वायरस से बदतर होती चली जाती है। इंदौर में तुलसी बाई यादव की इसी वजह से जान चली गई। वो 54 वर्ष की थी।

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    shortage of oxygen-beds in Madhya Pradesh, covid patients lost their lives at homes due to lack of hospitals

    तुलसी बाई यादव के बेटे राहुल यादव (30 साल) ने बताया कि, 17 अप्रैल को मां की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। वायरस से उनके 70% फेफड़े प्रभावित हुए थे। तबियत बिगड़ती जा रही थी। रविवार 25 अप्रैल की आधी रात को मां को इंदौर के अरबिंदो अस्पताल ले जाया गया, तब ऑक्सीजन लेवल 58 पाया गया था। राहुल कहते हैं, ''मैं अस्पताल के अंदर जाने के लिए एम्बुलेंस लेने निकला और अपनी मां को मैंने औपचारिकताएं पूरी करने के लिए छोड़ा। लेकिन मुझे साफ तौर पर एंट्री से वंचित रखा गया।''

    राहुल ने कहा, "जब तक मां सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल पहुंची, तब तक वो मर चुकी थी।" राहुल का कहना है कि, पहले मां को इंदौर के अपोलो अस्पताल ले गया था, लेकिन वहां यह कह दिया गया कि उनके पास ऑक्सीजन का कोई बेड़ नहीं है।

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    राहुल कहते हैं, ''हमें बताया गया था कि पाँच से छह दिन की वेटिंग अवधि थी और अगर कोई बेड़ उपलब्ध होता तो वे हमें फोन करते। वहीं, अस्पताल में अपना नंबर पंजीकृत किया, और फिर अगले दो दिनों में शहर के कम से कम चार अन्य निजी और सरकारी अस्पतालों में मां को भर्ती कराने की कोशिश की। मगर किसी में सफलता नहीं मिली। उसके बाद हमने घर पर ही मां की देखभाल करने का फैसला किया। कोरोना से जूझते हुए छह दिन बाद, वह मर गईं।"

    तुलसी बाई यादव के जैसी कितनी कहानियां सामने नहीं आ पातीं। खुद अस्‍पतालों के संचालक भी ऑक्‍सीजन वाले बेड की कमी का हवाला दे रहे हैं। अरबिंदो अस्पताल के बाहर एक बोर्ड टंगा है- "जीवन रक्षक उपकरणों और ऑक्सीजन की कमी के कारण" नए रोगियों की एंट्री रोक दी गई है।

    एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने कहा, "जब तक हमारे पास ऑक्सीजन से लैस करने के लिए पर्याप्‍त संसाधन नहीं होंगे, हम बेड की क्षमता नहीं बढ़ा सकते।"
    दिलचस्प बात यह है कि राज्य ने बिना ऑक्सीजन सपोर्ट वाले 21,731 प्रथक बेड की व्‍यवस्‍था की हुई है। जिनमें से आधे से ज्यादा (56%) खाली हैं। यदि इन्‍हें ऑक्सीजन सपोर्ट के साथ व्‍यवस्थित किया जाए तो कोरोना मरीजों के लिए बड़ी तादाद में बेड उपलब्‍ध हो सकेंगे।

    मध्‍य प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से जबलपुर पीठ के जवाब में, राज्य सरकार ने 27 अप्रैल को कहा था कि, प्रदेश में मार्च 2020 तक 11 जिलों में 536 ऑक्सीजन बेड थे, उसके बाद मार्च 2021 तक, 51 जिलों में 4,100 बेड उपलब्ध करा दिए गए। और 7,020 अन्य बेड भी उपलब्ध रहे। सरकार का कहना था कि, जिला अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में केंद्रीयकृत ऑक्सीजन की आपूर्ति उपलब्ध कराई गई है। वहीं, एक रिपोर्ट से सामने आया कि, अप्रैल 2020 और मार्च 2021 के बीच केवल 597 आईसीयू बेड जोड़े गए थे, जिसके उपरांत राज्य में कुल 826 काउंट किए गए थे।

    एम्स भोपाल के निदेशक डॉ. सरमन सिंह का कहना है कि उनके यहां 500 बेड वाला कोविड सेंटर 125% की क्षमता वाला है। सरमन बोले, "ऐसी कई रातें बीतीं, जब हम अपनी ऑक्सीजन सप्‍लाई को लेकर साेचने पर मजबूर हो गए। कलेक्टर को परेशान करने के लिए कॉल किए जाते हैं और हम किसी तरह प्रबंधन करते हैं। हमें केवल ऑक्सीजन ही नहीं, बल्कि डॉक्टरों सहित ऑक्सीजन पाइपलाइनों, तकनीशियनों और पैरामेडिक्स की भी जरूरत है।"

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    एनजीओ सविकास संवाद समिति के सचिन जैन कहते हैं कि मरीजों को हर कदम पर परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उन्‍होंने कहा,"पहले सरकार ने लोगों पर कोरोना टेस्‍ट के लिए दवाब डाला.. 5 दिन लगते थे। उसके बाद रिपोर्ट में 3 दिन...ऐसे में जब मरीज और ज्‍यादा गंभीर होता चला जाता है। ऐसी विकट परिस्थिति में भी राज्य सरकार ने एक साल में, केवल 600 आईसीयू बेड जोड़े हैं।"

    भोपाल के एक मेडिकल एक्सपर्ट अनंत भान का कहना है कि ऑक्सीजन की मारामारी से मालूम होता है..या तो लोग कोरोना टेस्‍ट कराने से डरते हैं और केवल तभी बाहर आते हैं जब गंभीर लक्षण दिखते हैं और या उनके पास कोरोना टेस्‍ट करवाने के लिए पर्याप्त पहुंच नहीं है।

    बुधवार को प्रदेश में कोरोना के 92,773 मामले थे। वहीं, कोरोना की पॉजिटिवटी रेट 21.7% दर्ज की गई। इससे पहले मंगलवार को पता चला कि प्रदेश में 9,360 आईसीयू और एचडीयू बेड का लगभग 94% और इसके 23,164 ऑक्सीजन से सुसज्जित बेड का 86% बुक हो चुका था। जबकि, इसके लगभग एक चौथाई मामलों में ही ऑक्सीजन बेड की आवश्यकता होती है। उधर, सरकारी अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी के चलते मौतों में तेजी आई है। मसलन.. शहडोल भी टॉप-6 में शामिल हो गया, देश भर में इस तरह की पहली रिपोर्ट दर्ज की गई।

    हाल ही सामने आए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक‍, 55,085 रोगियों को लगभग 70,000 कॉल किए गए थे। जो शहर कोरोना से सर्वाधिक प्रभावित हैं... उनमें इंदौर, भोपाल, जबलपुर, उज्जैन और ग्वालियर शामिल हैं। जहां राज्य के 44.64% मामले हैं। इन शहरों में भी कई सरकारी अस्पतालों में ऑक्सीजन से लैस बिस्तर उपलब्ध नहीं हैं।

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