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रोहिंग्या शरणार्थी मामला, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद गरमाई बहस, संस्कृति बचाओ मंच ने की ये मांग

MP News: सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद रोहिंग्या मुसलमानों के अवैध प्रवास को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई है। संस्कृति बचाओ मंच ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का स्वागत करते हुए केंद्र और राज्य सरकारों से इसके अक्षरशः पालन की मांग की है।

मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर तिवारी ने रोहिंग्या समुदाय को देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए "गंभीर खतरा" बताते हुए तत्काल निर्वासन की कार्रवाई शुरू करने की अपील की है।

Rohingya refugee case debate heated up after Supreme Court order Sanskriti Bachao Manch demand

सुप्रीम कोर्ट का रुख, मानवीयता नहीं, सुरक्षा सर्वोपरि

सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 में एक अहम याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि भारत सरकार के पास अवैध विदेशी नागरिकों के निर्वासन का पूरा अधिकार है, विशेषकर जब मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ा हो। कोर्ट ने "काल्पनिक दावों और मानवीय तर्कों" के आधार पर निर्वासन पर रोक लगाने की मांग खारिज कर दी।

तीन सदस्यीय पीठ-जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह-ने यह कहते हुए याचिका रद्द कर दी कि "कानून के शासन" को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता और निर्वासन की प्रक्रिया को तेज करने का निर्देश दिया।

संस्कृति बचाओ मंच की चेतावनी, जन आंदोलन की तैयारी

रोटक में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंच के अध्यक्ष चंद्रशेखर तिवारी ने कड़े शब्दों में कहा: "रोहिंग्या घुसपैठियों ने न केवल हमारी अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है, बल्कि आतंकी गतिविधियों और तस्करी जैसे गंभीर अपराधों में भी इनकी संलिप्तता पाई गई है। यह निर्णय देश की संप्रभुता की रक्षा की दिशा में मील का पत्थर है।" उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि सरकार इस निर्णय पर तेजी से कार्रवाई नहीं करती, तो मंच जन आंदोलन शुरू करेगा।

हरियाणा, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर में बढ़ती मौजूदगी पर चिंता

मंच ने हरियाणा, दिल्ली और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में रोहिंग्या मुसलमानों की बढ़ती संख्या को लेकर चिंता जताई है। चंद्रशेखर तिवारी ने कहा कि नूंह, फरीदाबाद, गुरुग्राम जैसे क्षेत्र अब इस अवैध घुसपैठ का केंद्र बन चुके हैं, जहां स्थानीय युवाओं के रोजगार और संसाधनों पर दबाव बढ़ा है। कुछ रोहिंग्याओं के पास आधार कार्ड, राशन कार्ड और सरकारी योजनाओं का लाभ भी दर्ज हुआ है, जिससे प्रशासनिक लापरवाही उजागर होती है।

Rohingya Refugee case: कौन हैं रोहिंग्या और क्यों है विवाद?

रोहिंग्या मुसलमान मूल रूप से म्यांमार के रखाइन प्रांत के निवासी हैं, जहां वे नागरिक अधिकारों से वंचित और दशकों से हिंसा के शिकार रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र ने इन्हें "दुनिया का सबसे उत्पीड़ित अल्पसंख्यक समुदाय" कहा है। म्यांमार की कार्रवाई से भागकर लाखों रोहिंग्या बांग्लादेश, भारत और अन्य देशों में शरण लेने लगे।

भारत में इनकी संख्या 40,000 से अधिक बताई जाती है, जो जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और पश्चिम बंगाल में फैले हुए हैं। चूंकि भारत ने 1951 के संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी सम्मेलन पर हस्ताक्षर नहीं किया है, इसलिए भारत पर शरण देने की बाध्यता नहीं है।

Rohingya Refugee case: सरकारी कार्रवाई तेज, लेकिन बाधाएं बरकरार

हरियाणा सरकार ने जनवरी 2025 तक सभी रोहिंग्या शरणार्थियों की पहचान और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी करने का लक्ष्य तय किया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी 2024 में कहा था कि शिक्षा और अन्य संवैधानिक अधिकार केवल भारतीय नागरिकों के लिए हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

खुफिया एजेंसियों ने बार-बार चेतावनी दी है कि कुछ रोहिंग्या युवक आपराधिक और देशविरोधी गतिविधियों में शामिल हैं, जिनके तार तस्करी, आतंकवाद और कट्टरपंथी संगठनों से जुड़े हो सकते हैं।

मानवाधिकार बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा, टकराव की रेखा

जहां सरकार और सुप्रीम कोर्ट का रुख सुरक्षा के पक्ष में है, वहीं कुछ मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने रोहिंग्याओं को "निर्दोष शरणार्थी" बताते हुए जबरन म्यांमार भेजे जाने को "गैर-वापसी के सिद्धांत" (Non-Refoulement) के खिलाफ बताया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि भारतीय संप्रभुता और सुरक्षा सर्वोपरि है, और संयुक्त राष्ट्र की सिफारिशें भारत के कानूनों पर प्राथमिकता नहीं पा सकतीं।

क्या है आगे की राह?

संस्कृति बचाओ मंच ने सरकार से निर्वासन प्रक्रिया को पारदर्शी और तीव्र बनाने की अपील की है। मंच ने संकेत दिया है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं होती, तो जन समर्थन जुटाकर आंदोलन खड़ा किया जाएगा।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है - क्या भारत मानवीयता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बना पाएगा? सुप्रीम कोर्ट का फैसला स्पष्ट है, लेकिन उसकी जमीन पर क्रियान्वयन की गति और नीयत ही अब असली कसौटी साबित होगी।

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