Ram Mandir: नर्मदा के तट पर बसा राम दरबार, अयोध्या राम मंदिर की तरह वास्तु शास्त्र पर आधारित
Ram Mandir: उत्तर प्रदेश के सरयू तट पर भगवान श्रीराम का मंदिर है। उसी तर्ज पर मध्य प्रदेश के नर्मदा तट पर दो शताब्दी पूर्व निर्मित भगवान श्रीराम मंदिर में संपूर्ण श्रीराम दरबार की मूर्तियां विराजमान हैं। वास्तुशास्त्र के आधार पर निर्मित इस प्राचीन मंदिर का निर्माण विश्व प्रसिद्ध सेठानी घाट के निर्माण के समय ही होना बताया जाता है।
200 वर्ष पूर्व सेठानी जानकी बाई के द्वारा सेठानी घाट के साथ ही श्रीराम मंदिर का निर्माण किया गया है। मंदिर का संचालन शहर के समाजसेवी शर्मा परिवार के द्वारा किया जाता है। मंदिर में सभी धार्मिक आयोजन विधि विधान से होते हैं। यहीं पर शहर की प्राचीन 18 दिन होने वाली रामलीला की रिहर्सल भी होता है।

राम मंदिर की विशेषता यह है कि 108 खंभो पर बना है मंदिर इस विशाल मंदिर का निर्माण शास्त्रोक्त विधि के अनुसार किया गया है। मंदिर में 84 खंभे बढ़े और 24 छोटे हैं। इस प्रकार 108 खंभे हैं। काफी बढ़ा प्रांगण है। अयोध्या के श्रीराम मंदिर की तरह ही उत्तरायण श्रीराममंदिर पूरी तरह वास्तुशास्त्र पर आधारित है।
अयोध्या में श्रीराम मंदिर सरयू तट पर है। जहां प्रतिमाओं का मुंह सरयू मैया की ओर है। यहां पर भी उसी तर्ज पर श्रीराम मंदिर बनाया गया है। सभी प्रतिमाओं का मुंह नर्मदा जी की ओर है। प्रतिमाओं के सामने से नर्मदा जी के दर्शन होते हैं।
मंदिर के प्रमुख व्यवस्थापक पं गिरजा शंकर शर्मा और मंदिर के पुजारी पं शिशिर तिवारी ने बताया कि मंदिर के गर्भग्रह में संपूर्ण श्रीराम दरबार की 21 प्रतिमाएं विराजमान हैं। जो मंदिर के निर्माण के समय प्राण प्रतिष्ठा किए जाने के समय से स्थापित हैंं। पं शर्मा ने बताया कि कुछ समय पूर्व विचार हुआ था कि अन्य मंदिरों की तरह यहां पर भी प्रतिमाएं बदल दी जाएं लेकिन फिर सोचा कि प्राचीन प्रतिमाएं ही रहना चाहिए।
पुजारी की पांचवी पीढ़ी पुजारी तिवारी ने बताया कि वर्तमान में यह हमारी पांचवी पीढ़ी है। सबसे पहले हमारे दादा स्व. पं रामनारायण तिवारी,उनके बाद पिता स्व. वैद्य रमाकांत तिवारी और अब हम पं शरद तिवारी, पं शिशिर तिवारी श्री राम दरबार की पूजा कर रहे हैं। अब उनके बेटे भी पूजन में हिस्सा लेते हैं।
श्रीराम मंदिर संकीर्तन वृंद के द्वारा बीते कई वर्षों से हर शनिवार को यहां पर रामचरित मानस का पाठ होता है। कोरोना संक्रमण को ध्यान मेें रखते हुए अब कुछ सदस्य ही इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं।












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