MP ecletion rusult 2023 के बाद पूरे चुनाव की उतार-चढ़ाव भरी 10 बड़ी बातें, Congress का दम घुटा और BJP की हुई जीत
MP ecletion rusult 2023: मध्य प्रदेश की नई हवा में अब भगवा लहरा रहा हैं। सियासत की बिसात में प्यादों से लेकर घोड़े को तक धराशाही करने का ऐसा तूफ़ान जिसकी बारे में कांग्रेस ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। लेकिन अब 'बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ।
कांग्रेस में जो हार हार गए या जीत फिर किसी तरह जीत गए, उनको रह-रहकर पूरा चुनाव याद रहा होगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि सामने सजी रखी सत्ता की तस्तरी उठा नहीं सकें। चुनाव से पहले और चुनाव के वक्त जिस राह पर चलते कांग्रेस के भीतर जीत की उम्मीद का सूरज चमक रहा था, नतीजे आने पर अंधकार छा गया।
ऐसे में मध्य प्रदेश चुनाव परिणाम के बाद आपको भी उन बातों को जानना बेहद जरुरी हैं, जो बीजेपी की प्रचंड जीत की वजह बनी और कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा। अब पूरे पांच साल विपक्ष में बैठकर कांग्रेस के पास मजबूत बनने का भरपूर मौका हैं।

2023 विधानसभा चुनाव की 10 वो बड़ी बातें जो आपको जानना बेहद जरुरी हैं-
- मध्य प्रदेश में कांग्रेस की चुनावी तैयारियों के कैम्पेन की शुरुआत जून 2023 में हुई, जब पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी 12 जून को जबलपुर पहुँची। प्रियंका ने अपनी रैली में कमलनाथ के द्वारा पहले ही बताई जा चुकी 5 गारंटियां दी। भाई राहुल गांधी की तरह चुनाव में वो भी जातिगत जनगणना के मुद्दे को बम मानकर चल रही थी।
- इलेक्शन को लेकर प्रियंका की MP में एंट्री के ठीक एक महीने बाद 12 जुलाई को बीजेपी के अमित शाह ने एमपी में कदम रख, स्थानीय संगठन को जुट जाने का इशारा कर दिया। भोपाल दफ्तर में नेताओं को विजय संकप अभियान शुरू करने कहा। इसी के आस-पास शाह की प्रदेश में सक्रियता बढ़ी और जनसभाओं में मोदी सरकार की ताकत, डबल इंजन सरकार के कसीदे पढ़ने शुरू हुए। जो साइकोलॉजिकली प्रभाव डालने वाला माना जा सकता हैं। इसके इतर कांग्रेस के दिग्गज सिर्फ और सिर्फ कमलनाथ का चेहरा ही आगे करते रहे।
- बूथ लेबल तक बीजेपी का पहले से ही 51% वोट शेयर का टार्गेट पूरा करने प्रोसेस जारी था। शाह की बार-बार मप्र में बैठकों का दौर जारी था। उधर इंडिया गठबंधन का रायता फैलाए कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व दूसरे दलों के जोड़-तोड़ में ही मशगूल रहा। भगवान भरोसे एमपी के कांग्रेस संगठन में मैदानी रणनीति नजर नहीं आई, जिस तरह बीजेपी के शाह-नड्डा एक्टिव थे।
- अगस्त आया, तो चुनाव घोषणा के पहले बीजेपी ने कांग्रेस विधायकों की मजबूत सीटों पर अपने प्रत्याशियों के चेहरे चुनना शुरू कर दिए। 17 अगस्त को 39 उम्मीदवारों की बीजेपी ने पहली सूची जारी कर एमपी के नेताओं को भी संदेश दे दिया कि अभी से सब जुट जाओ। चुनाव कार्यक्रम जब घोषित होगा, होता रहेगा। कांग्रेस ने शायद इस घड़ी को भी नहीं पहचाना।
- प्रदेश की आधी आबादी यानि महिलाओं के लिए मास्टर स्ट्रोक लगा चुके सीएम शिवराज ने रक्षाबंधन पर अपने वादे के मुताबिक हितग्राही महिलाओं के खाते में किश्त की तारीख के पहले ढाई-ढाई सौ रुपये एडवांस में जमा कर दिए। कांग्रेस इसके जबाव में सिर्फ अपनी पांच गारंटियां ही गिनाते रही।
- चुनावी तैयारियों के एक तरह से कमांडर बने अमित शाह ने एमपी आते-जाते रहे। हर चीज भांपते रहे। पार्टी ने यहां दो केन्द्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव और अश्विनी वैष्णव को पूरे चुनाव का जिम्मा सौंप दिया। एक तरह दोनों मंत्री मध्य प्रदेश में पूरे चुनाव में अपना डेरा जमाए रहे। हर संभाग-जिले में बैठके ली। शाह भी बैठकों में स्पष्ट और सख्त संदेश देते रहे कि जीत के सिवाय कुछ और मंजूर नहीं। कांग्रेस खेमे में सिवाय कमलनाथ और दिग्विजय के अलावा दूसरा कोई नेता नहीं दिखा, जो मतदाताओं के साथ चुनाव जिताने वाले कार्यकर्ताओं की नब्ज टटोल पाता।
- बीजेपी की पहली सूची जारी होने के बाद कांग्रेस में कमलनाथ सिर्फ दिल्ली दौड़ ही लग रही थी। सितंबर आया तो महीने के आखिरी में बीजेपी ने अपनी दूसरी सरप्राइजिंग उम्मीदवारों से भरी सूची जारी कर बड़ा धमाका किया। जिसमें तीन केन्द्रीय मंत्रियों समेत 7 सांसदों के नाम थे। कांग्रेस को यहां भी फुर्सत नहीं मिली कि इन सांसदों के ताकत वाले क्षेत्रों में जहां प्रभाव है, वहां मजबूत घेराबंदी की जा सकें।
- चुनाव प्रोग्राम की घोषणा हुई तो कांग्रेस की तरफ से पहले ही कमलनाथ सीएम फेस के रूप में प्रोजेक्ट थे। लेकिन एंटीइंकंबेंसी से गुजर रही बीजेपी यह कहने से बचती रही कि इस बार फिर सीएम फेस शिवराज सिंह चौहान ही होंगे। शिवराज के चेहरे से ऊबे लोगों को फिर वोट का करने आधार भी मिला। वहीं जनता के बीच जाकर शिवराज पूछते फिरे कि उन्हें चुनाव लड़ना चाहिए या नहीं? इस रणनीति से शिवराज के नाम भोपाल-मालवा रीजन में भरपूर सिम्पथी वोट मिले। क्योकि सामने लाड़ली बहना भी थी।
- चुनाव के वक्त जहां एक तरफ नड्डा-शाह और कई दिग्गज बीजेपी के लिए कमान संभाले थ, तो वही पीएम मोदी ने 14 धुआंधार प्रचार-सभाएं की। सीएम शिवराज सिंह खुद हर रोज तीन से चार जगहों पर सभा करने जाते थे। इधर कांग्रेस के पक्ष में राहुल-प्रियंका और खड़गे आए तो लेकिन मोदी के मुकाबले रैलियों की संख्या कम रही।
- बीजेपी में हिंदुत्व कार्ड हावी रहा। चाहे जनवरी में राम-मंदिर लोकार्पण का न्यौता या फिर बहाने-बहाने से हिन्दू राष्ट्र बनाने का इशारा। पर्दे के पीछे इस चुनाव में वोटिंग वाले दिन तक माइक्रोमैनेजमेंट का हिस्सा बना संघ भी जुटा रहा। कांग्रेस खेमे मे नेता टिकट वितरण के सवालों को लेकर ही उलझी रही। चुनाव लड़ने वाले नेताओं ने सिर्फ अपने दम पर ही चुनाव लड़ा। अब परिणाम सभी के सामने हैं।












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