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MP News: जानिए गरबा उत्सव में शामिल होने वाले गैर हिंदू व मुस्लिम युवकों को कैसे मिली जमानत, 7 दिन जेल में रहे

MP News: नवरात्र के मौके पर गुना शहर के एक निजी गार्डन में आयोजित गरबा कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे विशेष समुदाय के तीन युवकों को सोमवार को जमानत मिल गई। ये सभी युवक पिछले सात दिनों से जेल में बंद थे। उन्हें 6 अक्टूबर को हिंदूवादी संगठनों के विरोध के बाद गिरफ्तार किया गया था।

पूरा विवाद 6 अक्टूबर को तब शुरू हुआ जब गुना के एक निजी गार्डन में एक क्लब द्वारा गरबा कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। कार्यक्रम के दौरान हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ता वहां पहुंचे और आरोप लगाया कि गरबा में गैर हिंदुओं को प्रवेश दिया गया है। इसके बाद उन्होंने आयोजकों के खिलाफ नारेबाजी की।

Know how the non-Hindu and Muslim youths who participated in the Garba festival in Guna got bail

जब आयोजनकर्ताओं ने स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया, तो हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम में प्रवेश किया और पांच युवकों को पकड़ लिया, जिनमें से तीन विशेष समुदाय के थे। दो अन्य युवक नाबालिग थे, जिन्हें कोतवाली पुलिस ने छोड़ दिया।

गिरफ्तारी और विरोध

गिरफ्तार किए गए तीन युवकों पर शांति भंग के आरोप लगाए गए और उन्हें उसी दिन जेल भेज दिया गया। उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान हिंदूवादी संगठनों ने विरोध किया, जिसमें एक दर्जन से ज्यादा वकील खड़े हुए।

जमानत का फैसला

हालांकि, अंततः न्यायालय ने तीनों युवकों को जमानत देने का निर्णय लिया। युवकों के दोस्तों और परिवार के सदस्यों ने राहत की सांस ली है, जबकि इस मामले ने धार्मिक संगठनों और सामाजिक समरसता पर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। इन युवकों में लक्की अली, अरशद खां, और मोहसिन शामिल हैं, जो सभी 19 साल के हैं और गुना के निवासी हैं। इन्हें पुलिस ने शांति भंग के आरोप में जेल भेज दिया था।

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जमानत के विरोध में वकील

जमानत के विरोध में बार एसोसिएशन गुना के अध्यक्ष अरविंद रघुवंशी, सचिव नृपाल सिंह यादव और अन्य वकील 7 अक्टूबर को एसडीएम कोर्ट में उपस्थित हुए। उन्होंने जमानत याचिका पर आपत्ति जताई, जिसके बाद एसडीएम कोर्ट ने आरोपियों को जेल भेजने का आदेश दिया। इस दौरान आयोजकों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की गई थी।

जमानत की सुनवाई

सात दिन बाद, सोमवार को आरोपियों की जमानत याचिका पर सुनवाई हुई। एडवोकेट मुनेश रघुवंशी ने दो युवकों का प्रतिनिधित्व करते हुए कहा कि कार्यक्रम शांतिपूर्ण चल रहा था और हिंदू जागरण मंच के सदस्य बिना किसी कारण के वहां आए थे। उन्होंने तर्क दिया कि पुलिस को बुलाकर झूठा मामला दर्ज कराया गया है और आरोपी पहले कभी किसी अपराध में शामिल नहीं रहे हैं।

तीसरे युवक लकी अली के लिए एडवोकेट अवधेश माहेश्वरी और कपिल सोनी ने अदालत में दलील दी कि उन्हें आयोजकों ने आधार कार्ड से पास जारी कर हाथ पर सील लगाकर कार्यक्रम में प्रवेश दिया था।

न्यायालय का निर्णय

एसडीएम कोर्ट ने सभी दलीलें सुनने के बाद सोमवार को तीनों युवकों को जमानत देने का फैसला किया। इस फैसले के बाद युवकों के परिवार और मित्रों ने राहत की सांस ली, जबकि यह घटना सामाजिक सामंजस्य और धार्मिक सहिष्णुता पर गहरा सवाल उठाती है।

सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण

एडवोकेट आलम ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने जमानत के मामलों में निर्णय लेने के संबंध में स्पष्ट निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा, "जब मामले की सुनवाई जमानत की अर्जी पर हो, तो कोर्ट को संकोच के साथ फैसला नहीं लेना चाहिए। अभियोजन पक्ष के आरोप भले ही गंभीर हों, लेकिन अदालत की जिम्मेदारी है कि वह कानून के अनुसार निर्णय ले।"

जमानत का अधिकार

वकील ने यह भी उल्लेख किया कि "कोर्ट ने कहा है कि जमानत नियम है और जेल अपवाद।" इसका अर्थ है कि सामान्यतः आरोपी को जमानत दी जानी चाहिए, जब तक कि विशेष परिस्थितियाँ न हों। यदि अदालत जमानत अर्जी को खारिज करती है, तो यह आर्टिकल-21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है।

मौलिक अधिकारों का महत्व

आर्टिकल-21 के तहत हर नागरिक को जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। अगर कोई आरोपी जमानत का हकदार है और उसे फिर भी जमानत नहीं मिलती, तो यह स्पष्ट रूप से उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

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