अब पंडित धीरेंद्र शास्त्री का क्या होगा? जानिए 20 मई को क्यों होना है कोर्ट में पेश — ‘देशद्रोही’ का बयान
Dhirendra Shastri News:क्या आस्था के नाम पर सब कुछ कहा जा सकता है? क्या धार्मिक मंच से दिए गए हर बयान को 'धर्म की रक्षा' कहकर छूट मिलनी चाहिए? और सबसे अहम - क्या किसी को सिर्फ इसलिए 'देशद्रोही' कह देना जायज है क्योंकि वह महाकुंभ नहीं गया? इन सवालों के केंद्र में हैं - बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, जिन्हें अब अदालत में अपने बयान का जवाब देना होगा।
मध्य प्रदेश के शहडोल जिला न्यायालय ने बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर और विवादों के पर्याय पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को नोटिस जारी कर सनसनी मचा दी है। उन्हें 20 मई 2025 को सुबह 11 बजे कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया गया है। मामला उनके उस बयान से जुड़ा है, जो उन्होंने 27 जनवरी 2025 को प्रयागराज महाकुंभ के दौरान दिया था।

शास्त्री ने कहा था, "महाकुंभ में हर व्यक्ति को आना चाहिए। जो नहीं आएगा, वह पछताएगा और देशद्रोही कहलाएगा।" इस बयान ने न केवल धार्मिक भावनाओं को भड़काया, बल्कि संविधान और धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े किए।
विवाद का कारण: एक वाक्य, कई सवाल
मामला जुड़ा है 27 जनवरी 2025 को दिए गए उस बयान से, जब पंडित शास्त्री ने एक धर्मसभा में कहा था: "महाकुंभ में हर व्यक्ति को आना चाहिए। जो नहीं आएगा, वह पछताएगा और देशद्रोही कहलाएगा।" इस एक वाक्य ने धर्म, राष्ट्र और संविधान के बीच बहस छेड़ दी है।
कानून का दरवाज़ा खटखटाया गया: धर्म की आड़ में देशद्रोह का तमगा?
इस बयान को लेकर शहडोल के वरिष्ठ अधिवक्ता संदीप कुमार तिवारी ने सबसे पहले 4 फरवरी को पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, तो उन्होंने 3 मार्च 2025 को न्यायालय की शरण ली और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद दायर किया।
उनका तर्क साफ है:
"क्या एक सैनिक, डॉक्टर, पुलिसकर्मी, या कोई अन्य नागरिक जो अपने कर्तव्य में व्यस्त है और कुंभ में नहीं जा सका, उसे देशद्रोही कहा जा सकता है?" तिवारी का कहना है कि संविधान हमें धर्मनिरपेक्षता की गारंटी देता है। ऐसे में धार्मिक आयोजन को 'देशभक्ति' की कसौटी पर परखना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।
Court summons Dhirendra Shastri: बयान जिसने आग में घी डाला
धीरेंद्र शास्त्री विवादों से अछूते नहीं रहे हैं। इसी साल उनके एक अन्य बयान ने भी काफी चर्चा बटोरी थी, जिसमें उन्होंने कहा: "लव जिहाद का मूल कारण यह है कि हम अपनी बेटियों को सही संस्कार नहीं दे पा रहे। बेटियों को अंग्रेज़ी पढ़ाओ, लेकिन इतना आत्मबल और संस्कार दो कि वे किसी ग़लत विचारधारा में न उलझें।"
उन्होंने हिंदू समाज से अपील की कि: "अपने बच्चों को इतना कट्टर बनाओ कि वे किसी दूसरे मज़हब के चक्कर में न पड़ें।" इस बयान को लेकर कई सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों ने तीखी प्रतिक्रिया दी, इसे धार्मिक ध्रुवीकरण और सांप्रदायिक विभाजन को हवा देने वाला बताया।
बीजेपी की चुप्पी, विपक्ष का हमला
शास्त्री का बयान और कोर्ट का नोटिस मध्यप्रदेश में सियासी तापमान बढ़ा रहा है। बीजेपी, जो शास्त्री के समर्थन में अक्सर खड़ी दिखती है, इस बार चुप है। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव, जो हाल ही में जबलपुर में शास्त्री से मिले थे, ने कोई टिप्पणी नहीं की। यह चुप्पी सियासी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है, क्योंकि शास्त्री का बयान बीजेपी के हिंदुत्ववादी वोट बैंक को मजबूत करता है, लेकिन 'देशद्रोही' टिप्पणी उसे मुश्किल में भी डाल सकती है।
विपक्ष, खासकर कांग्रेस, ने इसे बीजेपी पर हमले का मौका बनाया। कांग्रेस नेता उमंग सिंघार ने कहा, "शास्त्री का बयान संविधान का अपमान है। बीजेपी की चुप्पी दिखाती है कि वे धार्मिक उन्माद को बढ़ावा दे रहे हैं।"
Court summons Dhirendra Shastri: 20 मई, क्या होगा इस दिन?
20 मई को पंडित धीरेंद्र शास्त्री को प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट सीताशरण यादव की अदालत में पेश होना है। यह केवल एक तारीख नहीं - यह धार्मिक बयानों और संवैधानिक दायरे की टकराहट का प्रतीक बन गई है। इस दिन तय होगा कि क्या शास्त्री को अदालत में स्पष्टीकरण देना पड़ेगा, या मामला केवल प्रक्रियात्मक औपचारिकता तक सीमित रहेगा।
सोशल मीडिया पर बंटे लोग: आस्था बनाम संविधान, सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर लोगों के बीच साफ़ बंटवारा देखने को मिल रहा है:
एक वर्ग कहता है कि धीरेंद्र शास्त्री "सनातन धर्म के रक्षक" हैं और उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। दूसरा वर्ग कहता है कि धार्मिक नेता संविधान से ऊपर नहीं हो सकते और 'देशद्रोही' जैसा शब्द हवा में उछालना खतरनाक मिसाल बन सकता है।
विश्लेषण: धर्म की सीमाएं और संविधान का संकल्प
पंडित धीरेंद्र शास्त्री का व्यक्तित्व करिश्माई और प्रभावशाली है, यह बात किसी से छिपी नहीं। उनके प्रवचन, "दिव्य दरबार", और चमत्कारों की कथाएँ करोड़ों लोगों को आकर्षित करती हैं। लेकिन जब कोई धार्मिक नेता सार्वजनिक मंच से कहता है कि जो महाकुंभ में नहीं गया, वह देशद्रोही है, तो यह केवल एक बयान नहीं रह जाता - यह समाज में 'कौन देशभक्त और कौन नहीं' तय करने का नया मापदंड बन जाता है।
इसलिए अदालत में सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि धर्म और संविधान की परिभाषाओं के बीच संतुलन का परीक्षण होने वाला है।
सवाल सिर्फ कानून का नहीं, चेतना का भी है
- 20 मई को अदालत में जो होगा, वह तो कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन असली सवाल है -
- क्या धर्म के मंच से "देशद्रोह" जैसे संवेदनशील शब्दों का इस्तेमाल स्वीकार्य है?
- क्या हर नागरिक की देशभक्ति, उसकी धार्मिक आस्था से मापी जाएगी?
- और क्या ऐसे बयान आने वाले समय में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का औजार बनेंगे?
इन सवालों के जवाब सिर्फ अदालत नहीं, बल्कि हम सब को भी देने होंगे।
रिपोर्ट: [LN मालवीय]
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