आज खानदान और गद्दारी तक पहुंची बात, लेकिन कभी जय वीरू जैसी थी राहुल और सिंधिया की दोस्ती
मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार भले ही थम गया हो, लेकिन गांधी और सिंधिया परिवार के बीच वार-पलटवार का दौर जारी है। प्रियंका गांधी द्वारा दतिया में एक सभा के दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर दिए गए बयान से सियासत गरमा गई है।
प्रियंका गांधी के बयान से ये तो साफ हो गया है कि, ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस में वापसी के सारे रास्ते बंद हो गए हैं। लेकिन याद रहे कि, कभी राजनीति में राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया की दोस्ती की तुलना जय और वीरू जोड़ी से की जाती थी।

सिंधिया और गांधी के परिवार की दोस्ती दो पीढ़ियों से चली आ रही थी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पूर्व केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया की दोस्ती ने देश की राजनीति में अपना परचम फहराया। राजीव गांधी की हत्या और पूर्व केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया की दुर्घटना में मौत के बाद राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया की दोस्ती परवान चढ़ी। दोनों ने ही दून स्कूल से पढ़ाई शुरू की थी। स्कूली दौर में ही दोनों की दोस्ती भी हो गई थी।
यह दोस्ती अक्सर कई मंचों पर देखने को मिली। संसद से सड़क तक, रणनीति से लेकर रैली तक ज्योतिरादित्य हमेशा राहुल गांधी के साये की तरह साथ रहते थे। राहुल संसद में ज्योतिरादित्य की बगल वाली सीट पर ही बैठते थे। ज्योतिरादित्य को गांधी परिवार का राहुल, प्रियंका और वाड्रा के बाद चौथा सदस्य कहा जाता था।
सिंधिया की राजनीति में एंट्री 2002 में हुई। इसके बाद 2004 में ज्योतिरादित्य और राहुल सांसद चुनकर संसद पहुंचे थे। लेकिन इससे पहले 2002 में जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने औपचारिक रूप से कांग्रेस की सदस्यता ली तो सोनिया ने मध्य प्रदेश के सभी बड़े कांग्रेसी नेताओं को अपने घर बुलाकर एक मीटिंग ली थी। मीटिंग में उन्होंने सबको ज्योतिरादित्य की मदद करने के निर्देश दिए थे। इस मीटिंग में दिग्विजय सिंह, श्यामाचरण शुक्ला, अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा, भानुप्रताप सिंह, कमलनाथ और राधाकृष्ण मालवीय शामिल थे।
कहा तो यहां तक जाता है कि, प्रियंका गांधी, राहुल की तरह ज्योतिरादित्य को भी अपने भाई जैसा मानती थीं। कई बार जब ज्योतिरादित्य किसी मुद्दे पर राहुल से सहमत नहीं होते तब प्रियंका बड़ी बहन की भूमिका में आ जातीं और दोनों की सहमति बनाने का रास्ता तैयार करती थीं।
लेकिन राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच की दोस्ती में पड़ी दरार की शुरुआत 2018 में हुई। साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए मध्य प्रदेश में सरकार बनाई थी। कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद मिला तो सिंधिया समर्थक विधायकों को भी मंत्री बनाया गया। जैसे-जैसे दिग्विजय सिंह का कमलनाथ सरकार में दखल बढ़ता गया, सिंधिया के लिए मुश्किलें बढ़ती गईं। सिंधिया को लगा कि, राहुल इस मामले में दखल देंगे, लेकिन उन्हें आश्वासन के सिवाय और कुछ नहीं मिला।
इसके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया लोकसभा चुनाव हारने के बाद राज्यसभा से सांसद बनने की तैयारी कर रहे थे। यहां पर भी उनके सबसे बड़े सियासी दुश्मन माने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने रोड़ा अटका दिया। ज्योतिरादित्य चाहते थे कि, पार्टी नेतृत्व उन्हें फर्स्ट कैंडिडेट घोषित करने की पहल करेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे निराश होकर उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़ने का फैसला कर लिया।












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