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सबकी उन्नति में ही अपनी उन्नति समझनी चाहिए', स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती पर बोले सीएम मोहन यादव

स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उन्हें नमन किया। सीएम मोहन यादव ने एक ट्वीट शेयर करते हुए उन्हें याद करते हुए उन्होंने लिखा, "प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट नहीं होना चाहिए, अपितु सबकी उन्नति में ही अपनी उन्नति समझनी चाहिए।'- महर्षि दयानंद सरस्वती।

आर्य समाज के संस्थापक व सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जनजागृति लाने वाले महान समाज सुधारक, स्वामी दयानंद सरस्वती की जयंती पर कोटि-कोटि नमन करता हूँ। भारत के उज्ज्वल भविष्य का सपना देखने वाले एवं राष्ट्र प्रेम की भावना से ओतप्रोत स्वामी द्वारा समाज के उत्थान की दिशा में किए गए कार्य चिरस्मरणीय हैं।

मोहन यादव

कौन है स्वामी दयानंद सरस्वती?

स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फ़रवरी 1824 हुआ। स्वामी दयानंद सरस्वती आधुनिक भारत के चिंतक तथा आर्य समाज के संस्थापक थे। उनके बचपन का नाम मूलशंकर था। उनके पिता का नाम करसनजी लालजी तिवारी था और माता का नाम अमृता बाई था। उनके पिता एक कर कलेक्टर होने के साथ ब्राह्मण कुल के समृद्ध और प्रभावशाली व्यक्ति थे। उन्होंने वेदों के प्रचार-प्रसार के लिए मुंबई में आर्यसमाज की स्थापना की।

'वेदों की और लौटो' यही उनका दिया हुआ प्रमुख नारा है। उन्होंने कर्म सिद्धांत, पुर्नजन्म और सन्यास को पने दर्शन के स्तम्भ बनाये। आगे चलकर विद्वान बनने के लिए वे संस्कृत, वेद एवं शास्त्रों व अन्य धार्मिक पुस्तकों के अध्यन में लग गए। महृषि के साथ-साथ उनका जीवन चरित भी अत्यंत परेरेणास्पद है। महृषि पर अनेकों व्यक्तियों ने जीवन चरित लिखा है, जिनमें पंडित लेखराम, सत्यानंद आदि प्रमुख है। पंडित लेखराम का का अनुशंधान खासकर पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान तक ही सिमित रहा। बंगाल के सज्जन बाबू श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय स्वयं बंगाली नहीं थे, लेकिन उन्होंने 15-16 वर्षो तक उनकी जीवन की सारी सामग्री एकत्र किया और फिर उनके जीवन के बारे मेंअपनी लिखी हुई पुस्तक में बताया।

स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी जीवन काल में बहुत सी धार्मिक पुस्तके लिखी है। उन्होंने प्रारम्भ में तो संस्कृत में ही पुस्तके लिखी है, लेकिन समय के साथ -साथ उन्होंने हिंदी में भी बहुत सारी पुस्तके लिखी है। हिंदी को उन्होंने आर्यभाषा का नाम दिया था। यदि दयानंद सरस्वती के ग्रंथो व विचारो पर चला जाये तो राष्ट्र फिर से विश्वगुरु वैभवशाली,शक्तिशाली, संपन्नशाली, सदाचारी और महान बन जाये। स्वामी दयानंद सरस्वती जी का देहांत सन् 1883 को दीपावली के दिन संध्या के समय हुआ था।

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