यूपी के "टीपू" बने "सुल्तान", 2017 में बनेगी नयी पहचान
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति कुछ वर्ष पहले मायावती और मुलायम सिंह यादव के इर्द-गिर्द घूमती थी। लेकिन 2012 में अखिलेश यादव की लोकप्रियता को देखते हुए मुलायम सिंह ने उन्हें प्रदेश की कमान सौंपी। लेकिन कई बार ऐसे मौके आये, जब पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के हठ के आगे टीपू (अखिलेश यादव का घर का नाम) को झुकना पड़ा। कई बार ना चाहते हुए भी टीपू को बाकियों की हां में हां मिलानी पड़ी। लेकिन अब ऐसा नहीं है, क्योंकि यूपी के "टीपू" अब "सुल्तान" बन गये हैं। और अटल फैसले लेने लगे हैं।
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यूपी में चार वर्ष के कार्यकाल में जिस तरह से अखिलेश यादव ने प्रदेश की कमान संभाली वह उनकी अलग छवि स्थापित करती है। कई मुद्दों पर अखिलेश यादव ने पार्टी लाइन से अलग जाकर अपनी राय रखी और अपने पिता के विकल्प के तौर पर मुख्यमंत्री की भूमिका को निभाने से इनकार किया। कई बड़े फैसलों पर उन्होंने अपनी ना सिर्फ राय रखी बल्कि उसे क्रियांन्वयित भी किया। यह साफ दर्शा रहा है कि अब सपा के नये "सुल्तान" अलग तरह से पार्टी को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
मंच से अतीक अहमद को भला-बुरा कहा
समाजवादी पार्टी की छवि गुंडा तत्वों को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश में जानी जाती है। अखिलेश इस बात से वाकिफ भी थे, लिहाजा उन्होंने पार्टी को इस छवि से बाहर निकालने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। इस कड़ी में अखिलेश ने पहला बड़ा रुख उस वक्त दिखाया जब दबंग अतीक अहमद कुछ वर्ष पहले उनके साथ मंच साझा कर रहे थे। लेकिन उस वक्त अखिलेश यादव ने उन्हें मंच से ना सिर्फ बाहर का रास्ता दिखाया बल्कि यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी में इस तरह के तत्व स्वीकार नहीं किये जायेंगे।
अंसारी जैसे दबंगो को दिखाया बाहर का रास्ता
ताजा मामला हैं कौमी एकता दल के दबंग नेता मुख्तार अंसारी का। इस बार अखिलेश इतने बगावती हुए कि उन्होंने अपने पूरे परिवार के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। सपा में कौमी एकता दल के विलय के बाद अखिलेश ने इसके पीछे मास्टर माइंड बलराम यादव को मंत्रीमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके लिए ना सिर्फ उन्होंने अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव बल्कि अपने पिता मुलायम सिंह यादव से भी दो-दो हाथ किये।
रामपाल यादव को भी दी थी सुधर जाने की सलाह
हाल ही में सपा विधायक रामपाल यादव को अखिलेश यादव ने सख्त तेवर में सुधर जाने को कहा था। दरअसल रामपाल ने एलडीए के अधिकारी से अभद्रता की थी जिसके बाद अखिलेश यादव ने सीधे शब्दों में उन्हें सुधर जाने को कहा था। उन्होंने साफ किया था कि कानून व्यवस्था के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाएगा।
अखिलेश यादव के कड़े रुख के आगे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को झुकना पड़ा और कौमी एकता दल के विलय को रद्द किया गया। इसके साथ ही अखिलेश ने खुले मंच पर यह कहा कि अंसारी जैसे तत्वों के लिए पार्टी के दरवाजे हमेशा के लिए बंद है।
कानून व्यवस्था के लिए खुद आगे आये
अखिलेश यादव प्रदेश की कानून व्यवस्था को लेकर सजग है कई मामलों में खुद में उन्होंने पुलिस को मैसेज और फोन करके अपराधियों को पकड़ने के लिए कहा। हाल ही में देहरादून के पंचायत सदस्य की गाड़ी के भीतर अवैध हथियार को पकड़ने के लिए खुद अखिलेश यादव ने पुलिस को फोन करके पकड़वाया। यही नहीं व्हाट्सप पर मिलने वाले मैसेज का भी अखिलेश संज्ञान ले रहे हैं और उन्होंने कई मौकों पर पुलिस को फोन करके इन मामलों में कार्यवाही की।
दरअसल इस प्रकरण के पीछे सपा की राजनीति को समझने की जरूरत है। मुलायम सिंह यादव और अन्य शीर्ष नेता इस बात को समझते हैं कि प्रदेश में अखिलेश यादव के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है। ऐसे में अखिलेश की राय को दरकिनार करना पार्टी के लिए महंगा साबित हो सकता है। बहरहाल अखिलेश का अलग व्यक्तित्व पार्टी के लिए आगामी विधान सभा चुनावों में अहम साबित हो सकता और पार्टी की स्थिति फिलहाल अन्य पार्टियों की तुलना में काफी मजबूत लगती है।












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