आईये समझ लें यूपी में जातीय समीकरण का पूरा ताना-बाना

लखनऊ। यूपी चुनाव में जातीय समीकरण शुरु से ही अहम भूमिका निभाता आया है, ऐसे में सभी पार्टियां अपनी चुनावी रणनीति जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए ही बनाती हैं। सियासी दलों के विकास के तमाम दावे उस वक्त खोखले हो जाते हैं जब वह प्रदेश में टिकटों के बंटवारे का समय आता है।

दल-बदल के बीच टिकटों की बगावत को रोकने के लिए भाजपा का मेगा प्लान

Complete analysis of caste politics in UP assembly election 2017

दलित, अगड़ी जाति का तय करेगी रुख

यूपी में 25 फीसदी वोट बैंक मुख्य रूप से दलितों का है। इसके बाद अगड़ी जाति का वोट बैंक जोकि तमाम जातियों में बंटा है वह भी प्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका निभाता है। इसमें मुख्य रूप से ब्राह्मण, ठाकुर आते हैं जिनके वोटों पर सभी धर्मों की नज़र रहती है। इसके अलावा पिछड़ी जातियों का वोट बैंक भी प्रदेश के चुनाव में अहम भूमिका निभाता है।एक तरफ जहां दलितों का वोट बैंक 25 फीसदी है तो ब्राह्मणों का वोट बैंक 8 फीसदी, 5 फीसदी ठाकुर व अन्य अगड़ी जाति 3 फीसदी है। ऐसे अगड़ी जाति का कुल वोट बैंक तकरीबन 16 फीसदी है।

पिछड़ी जातियों के वोट बैंक में लगेगी सेंध

वहीं पिछड़ी जाति के वोट बैंक पर नज़र डालें तो यह कुल 35 फीसदी है, जिसमें 13 फीसदी यादव, 12 फीसदी कुर्मी और 10 फीसदी अन्य जातियों के लोग आते हैं। इन सभी जातियों पर तमाम दलों का अलग-अलग वोट बैंक है। एक तरफ जहां सपा को पिछड़ी जाति का अगुवा, तो बसपा को दलित वोट बैंक का प्रतिनिधि तो भाजपा को अगड़ी जाति का पैरोकार माना जाता है।

दूसरी पार्टियों के नेता भाजपा के लिए यूपी में बड़ी चुनौती

किधर जायेगा यूपी का मुसलमान

वहीं जातीय समीकरण के अलावा प्रदेश में 18 फीसदी मुस्लिम व 5 फीसद जाट वोट बैंक भी प्रदेश की राजनीति में काफी अहम भूमिका निभाता है, जिनपर तमाम दलों की नजर रहती है। मुस्लिम वोटों पर भी हाल के सालों में सपा की पैठ रही है। लेकिन जिस तरह से ओवैसी की पार्टी ने प्रदेश में सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है उसने सपा की मुश्किलों को बढ़ा दिया है।

सियासी दलों ने शुरु कर दिया है सियासी घमासान

तमाम राजनैतिक दल अपने मुख्य वोट बैंक के इतर दूसरे वोट बैंक में सेंधमारी की पूरी कोशिश में जुटे हैं। इसी कड़ी में जहां भाजपा केशव प्रसाद मौर्या व स्वामी प्रसाद मौर्या को दलितों के वोट बैंक को अपनी ओर करने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ मायावती रोहित बेमुला के मामले मामले, गुजरात के उना कांड के मुद्दे को उठाकर दलितों के वोट बैंक में अपने पास से दूर जाने की पूरी कोशिश कर रही हैं।

सपा मुस्लिम व यादव वोट बैंक में दूसरे दलों की सेंधमारी को रोकने के लिए तमाम ऐसे बयान और घोषणायें कर रही है जिससे की मुसलमानों का दूसरी पार्टी की ओर मोह ना हो। वहीं कांग्रेस ने शीला दीक्षित को ब्राह्मणों के वोट बैंक को प्रदेश में साधने के लिए मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया है।

30 फीसदी का आंकड़ा सत्ता की चाभी

लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि यूपी में जिस भी पार्टी को 30 फीसदी वोट मिलता है वह प्रदेश में सरकार बनाने में सफल होती है। ऐसे में छोटे-छोटे समीकरण भी पार्टियों के लिए काफी अहम हैं और वह इन जातीय समीकरणों को नजरअंदाज नहीं कर सकती है।

किसी भी दल को नजरअंदाज करना मुश्किल

बहरहाल आगामी चुनाव में यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि सपा सरकार किस तरह से लॉ एंड ऑर्डर के मुद्दे को पार पाती है। यह देखना भी काफी अहम होगा कि क्या 2012 की तरह भाजपा एक बार फिर से यूपी में मोदी लहर का फायदा उठा पायेगी या मायावती हाथी पर सवार होकर तमाम दलों के मंसूबों पर पानी फेर देगी। लेकिन इन सब के बीच जिस तरह से कांग्रेस यूपी में अपनी पूरी ताकत झोंक रही है वह भी तमाम सियासी दलों के लिए काफी अहम होगा।

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