अनुकूल मौसम की तलाश में कश्मीरी मधुमक्खी पालकों की यात्रा
नई दिल्ली, 04 अक्टूबर। जैसे-जैसे सर्दियों के महीने नजदीक आ रहे हैं आबिद हुसैन जैसे कश्मीरी मधुमक्खी पालक गर्म मौसम, अधिक शहद और मोटी कमाई की तलाश में वादी से निकलकर वार्षिक प्रवास की तैयारी कर रहे हैं.

हुसैन अपने हाथों और चेहरे को मधुमक्खी के डंक से बचाने के लिए सुरक्षात्मक गियर का इस्तेमाल करते हैं. वे हिमालयी क्षेत्र से सैकड़ों किलोमीटर दूर राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके में मधुमक्खियों को भेजने के लिए तैयारी कर रहे हैं. हुसैन कहते हैं, "सर्दियों में कश्मीर में प्रकृति समेत सब कुछ ठप हो जाता है." हुसैन यहां से करीब 750 किलोमीटर दूर राजस्थान के श्रीगंगानगर के सरसों के खेतों में मधुमक्खियों को ले जाएंगे.
उनके दर्जनों साथी मधुमक्खी पालक भी इसी तरह से शरद ऋतु में यात्रा करते हैं. वे पहाड़ी रास्तों से होते हुए मैदानी इलाकों के गर्म क्षेत्र में जाते हैं.
शहद के उत्पादन का काम करने वाले किसान 1980 के दशक से इस तरह की यात्रा कर रहे हैं, जब एक कीट रोग ने स्थानीय मधुमक्खियों की आबादी को लगभग मिटा दिया. इसके बाद यहां यूरोपीय प्रजाति की मधुमक्खी को पालने का चलन बढ़ा जो कि हिमालयी ठंड के प्रति अधिक संवेदनशील है.
अब करोड़ों मधुमक्खियां हर साल कश्मीर के समृद्ध कृषि फसलों से रस लेती हैं और इससे मधुमक्खी पालकों को बेहतर कारोबार मिल पाता है. श्रीगंगानगर में रहने के दौरान मधुमक्खी के प्रत्येक छत्ते से करीब 9 हजार रुपये का शहद हुसैन को मिल पाता है.
कठोर मौसम का असर
सरसों के खेत में मधुमक्खियां फूलों से रस लेकर शहद बनाती हैं और इसी के साथ वे पॉलिनेशन यानी परागण का काम भी करती हैं. इसी कारण सरसों के किसान उनके आने से खुश रहते हैं.
कश्मीर के कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर परवेज अहमद सोफी कहते हैं कि मधुमक्खी पालकों के लिए वार्षिक यात्रा उनके अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण है. वे कहते हैं, "प्रवासन मधुमक्खियों को कठोर मौसम से बचाता है, उन्हें कॉलोनियों को दोबारा बनाने और शहद का उत्पादन करने में मदद करता है." वे कहते हैं इसके बिना मधुमक्खी पालकों के पास साल में केवल दो फसलें होती हैं, अगर वे राजस्थान की यात्रा करते हैं तो चार फसलें होती हैं.
फरवरी में तापमान बढ़ने के साथ हुसैन उत्तर की ओर अपनी वापसी शुरू करेंगे. वे वापसी में पाकिस्तान की सीमा के पास प्राचीन शहर पठानकोट में दो महीने के लिए भी रुकेंगे.
अप्रैल के शुरूआत में वे लीची पर फूल आने का यहीं इंतजार करेंगे और उसके बाद वे एक और फसल के बाद घर वापसी करेंगे. लेकिन कश्मीर घाटी में अधिकारियों का कहना है कि इस क्षेत्र का तापमान बढ़ रहा है, जबकि भयंकर सर्दियों के तूफान इसके वन्यजीवों के लिए खतरा बने हुए हैं.
पिछले साल लगभग 750 टन शहद का उत्पादन किया गया था. विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में और अधिक उत्पादन हो सकता है. हाल के सालों में तूफान, गर्म सर्दी और अप्रत्याशित बारिश ने उत्पादन को प्रभावित किया है.
एए/सीके (एएफपी)
Source: DW
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