Jodhpur Viral Video: मेहरानगढ़ किले पर अब्दुल लतीफ़ के हाथ से खाना खाने रोजाना आते हैं सैकड़ों चील
Eagles at Mehrangarh Fort jodhpur: जगह-राजस्थान में जोधपुर के मेहरानगढ़ किले की बुर्ज। वक्त-अपराह्न 3 बजे के आस-पास। काम-चीलों को खाना खिलाना। वजह-वर्षों पुरानी परम्परा। कुरैशी परिवार में कई दशकों से चली आ रही इस परम्परा को अब अब्दुल लतीफ निभा रहे हैं। अपने हाथों से रोजाना सैकड़ों चीलों को खाना खिला रहे हैं, जो बकरे का मांस होता है। (वीडियो नीचे)
जोधपुर में मांस की दुकान चलाने वाले अब्दुल लतीफ कुरैशी जब मांस लेकर लेकर निकलते हैं तब से ही उनके ऊपर चील मंडराने शुरू कर देते हैं। चीलों का झुंड लतीफ के पीछे-पीछे जोधपुर के मेहरानगढ़ किला पहुंचता है और हवा में उनके द्वारा भोजन उछाले जाने का इंतजार करता है, जिसे चील हवा में लपककर खा लेते हैं।

जोधपुर के ऐतिहासिक किले मेहरानगढ़ पर चील को भोजन करवा रहे अब्दुल लतीफ कुरैशी का वीडियो राजस्थान कैडर के आईपीएस दिनेश एमएन ने सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए लिखा कि 'अब्दुल लतीफ़ क़ुरैशी जोधपुर के मेहरानगढ़ किले में रोजाना दोपहर 3.30 बजे चीलों को खाना खिलाते हैं। मान्यता है कि उनके परिवार द्वारा किया जाने वाला यह 500 साल पुरानी दैनिक परम्परा है। इससे मेहरनागढ़ किला और मारवाड़ अंचल दोनों सुरक्षित रहते हैं।
जोधपुर में चीलों को भोजन करवाने की परम्परा क्या है?
कहा जाता है कि 1459 में राव जोधा ने जोधपुर में मेहरानगढ़ किला बनवाया। मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव रखी जानी थी तब एक चील आकर जहां बैठी वहां मां दुर्गा का मंदिर बनवाया गया। चील को मां नवदुर्गा का रूप माना जाता है। यह भी मान्यता है कि जब तक मेहरानगढ़ किले पर चीलें मंडराती रहेंगी तब तक यह किला किसी का गुलाम नहीं होगा।
उस समय राव जोधा ने चीलों को भोजन करवाने का जिम्मा लतीफ के दादा-परदादा को सौंपा था। अब उसी परम्परा को नई पीढ़ी के लतीफ निभा रहे हैं। खास बात यह है कि रोजाना चीलों को भोजन करवाने के लिए लतीफ किसी से कुछ लेते नहीं। लोग अपनी इच्छा से जरूर कुछ देकर जाते हैं। दूसरी खास बात यह भी है कि लतीफ जब भी किले से मांस के टुकडे़ उछालते हैं तो चील उन्हें हवा में ही खा लेते हैं। कभी नीचे नहीं गिरने दिया।












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