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Jharkhand Chunav: 'हिंदुओं का अगर ध्रुवीकरण हो रहा है...',कांग्रेस,JMM की राजनीति पर क्या बोले बाबूलाल मरांडी?

Jharkhand Chunav 2024: झारखंड विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए चुनाव प्रचार थम चुका है। पहले दौर की वोटिंग 13 नवंबर को होगी और दूसरे चरण के लिए 20 नवंबर को वोट डाले जाएंगे। इस दौरान झारखंड के पहले मुख्यमंत्री और प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने प्रदेश में पार्टी की चुनावी रणनीति को लेकर काफी कुछ कहा है और साथ ही सत्ताधारी जेएमएम-कांग्रेस पर भी सीधा निशाना साधा है।

मरांडी ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में झारखंड चुनाव के सिलसिले में काफी मुद्दों पर बात की है और राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी का पक्ष रखा है। झारखंड में अभी जेएमएम के हेमंत सोरेन की अगुवाई वाली इंडिया ब्लॉक की सरकार है और बीजेपी राज्य में सत्ता में वापसी के लिए संघर्ष कर रही है।

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70 साल से अधिक किसने ध्रुवीकरण की राजनीति की?
कांग्रेस और जेएमएम जैसी पार्टियों के नेता लगातार बीजेपी पर विभाजनकारी राजनीति का आरोप लगा रहे हैं। खासकर पार्टी नेताओं की ओर से 'बटेंगे तो कटेंगे' वाले नारे को लेकर इसे निशाना बनाया जा रहा है। इसपर मरांडी ने कहा है, 'भारत की आजादी के 70 साल से अधिक समय तक किसने ध्रुवीकरण की राजनीति की है? अगर हिंदुओं का ध्रुवीकरण हो रहा है, तो किस बात की समस्या है?

हिंदुओं को गोलबंद करने से 'आपको' दिक्कत है- बाबूलाल मरांडी
उन्होंने आगे कहा, 'आप (कांग्रेस और उसके सहयोगी) मुसलमानों का वोट ले रहे हैं, उन्हें बीजेपी के खिलाफ डरा रहे हैं। आप अभी भी ऐसा करते हैं। अगर बीजेपी हिंदू वोट को गोलबंद करने की कोशिश करती है तो आपको दिक्कत है। हमें देश को बचाना है। जब हम देश को एकजुट रखने की कोशिश करते हैं तो आपको इतनी तकलीफ क्यों होती है?'

'आदिवासी नेता को सामान्य सीट से लड़ाने का कांग्रेस में साहस नहीं'
भाजपा नेता का आरोप है कि लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने उसके खिलाफ संविधान और आरक्षण को लेकर दुष्प्रचार किया, जिसकी वजह से उसे दलित और आदिवासी वोटों का नुकसान हुआ। लेकिन, अब पार्टी के नेता को लगता है कि झारखंड में वह स्थिति नहीं रह गई है। बाबूलाल मरांडी का कहना है, 'एक आदिवासी नेता को गैर-आरक्षित सीट से चुनाव लड़ाने का कांग्रेस में कहां साहस है? सिर्फ बीजेपी ही आदिवासियों का सम्मान कर सकती है।'

'भ्रामक प्रचार का समय बीत गया, अब प्रभावी नहीं'
उन्होंने यह भी कहा, 'पार्टी ने छत्तीसगढ़ और ओडिशा में आदिवासी मुख्यमंत्री बनाए हैं। क्या कांग्रेस ऐसा करने की हिम्मत करेगी? भ्रामक प्रचार का अपना एक वक्त था और अब यह प्रभावी नहीं है। हमें पूरा भरोसा है कि हमने उसका निपटारा कर लिया है।'

एक बड़े आदिवासी नेता होकर भी अनारक्षित सीट से चुनाव लड़ने के सवाल पर उनका कहना है, 'क्या यह अपराध है? बीजेपी ही एक ऐसी पार्टी है, जिसमें सामान्य सीट से आदिवासी नेता को चुनाव लड़ाने का दम है। मैं ही नहीं, सीता सोरेन भी गैर-आदिवासी सीट से चुनाव लड़ रही हैं।'

भाजपा नेता का कहना है, 'बीजेपी जाति-आधारित पार्टी नहीं है और यह राज्य के किसी भी हिस्से से अपने नेताओं को खड़ा करती है, जहां वह जीत सकती है। हेमंत सोरेन को अपनी पत्नी को गैर-आदिवासी सीट से चुनाव लड़ाने से पहले समझौता करना पड़ा। उन्हें सीट खाली कराने के लिए सीटिंग एमएलए को राज्यसभा में भेजना पड़ा।'

आदिवासी वोट के लिए बीजेपी ने किया क्या जुगाड़?
पिछले लोकसभा चुनाव और 2019 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को झारखंड के आदिवासी-बहुल सीटों पर भारी नुकसान झेलना पड़ा। कोल्हान बेल्ट से पार्टी बिल्कुल साफ हो गई और संथाल परगना इलाके में भी पार्टी का प्रदर्शन बहुत ही बेकार रहा।

लेकिन, इस बार पार्टी ने आदिवासी वोट बैंक की बेरुखी को दूर करने के लिए तमाम प्रयास किए हैं, जिनमें बाबूलाल मरांडी, चंपाई सोरेन और सीता सोरेन जैसे आदिवासी नेताओं को पार्टी में लाना भी शामिल है।

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