Jammu Kashmir Chunav: श्रीनगर में पुडुचेरी वाली तैयारी! 5 मनोनीत सदस्यों पर क्यों फ्रंट फुट पर खेल रही BJP?
Jammu Kashmir Chunav result: केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के लिए हुए विधानसभा चुनावों के जो तमाम एग्जिट पोल आए हैं, उसमें त्रिशंकु विधानसभा के आसार हैं। इस वजह से सभी दल अपनी-अपनी गोटियां सेट करने में लगी हैं। मुख्य मुकाबला नेशनल कांफ्रेंस की अगुवाई वाले गठबंधन और बीजेपी के बीच है। ऐसे में 5 मनोनीत सदस्यों की नियुक्ति पर उपराज्यपाल के अधिकारों पर बहस छिड़ गई है, लेकिन बीजेपी उत्साहित लग रही है।
फारूक अब्दुल्ला की अगुवाई वाली नेशनल कांफ्रेंस और उसकी सहयोगी कांग्रेस को यह डर सता रहा है कि अगर एग्जिट पोल के अनुमान सही साबित हुए और त्रिशंकु जनादेश आया तो लेफ्टिनेंट जनरल के माध्यम से बीजेपी खेला कर सकती है।

उपराज्यपाल के हाथ नतीजों के बाद वाला हथियार!
एनसी और कांग्रेस नेताओं की धड़कनें तब से और बढ़ गई हैं, जबसे जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा श्रीनगर से दिल्ली के लिए रवाना हुए हैं। माना जा रहा है कि वहां वे मंगलवार (8 अक्टूबर, 2024) को चुनाव नतीजे आने के बाद राज्य में पैदा होने वाले राजनीतिक हालातों पर केंद्र सरकार के नेताओं से चर्चा करेंगे।
मनोनीत सदस्यों पर क्या है कानूनी प्रावधान?
दरअसल, जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 और 2023 में इसमें हुए संशोधन के बाद यह व्यवस्था है कि वहां लेफ्टिनेंट गवर्नर दो महिलाओं, दो कश्मीरी विस्थापितों और एक पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) के शरणार्थी को विधानसभा के सदस्य के तौर पर मनोनीत कर सकते हैं।
मनोनीत सदस्यों के पास क्या होंगे अधिकार?
इन पांच सदस्यों को नवनिर्वाचित सदन की पहली बैठक से पहले मनोनीत किया जाना है और बहुमत परीक्षण के दौरान ये सदस्य भी विधानसभा के अन्य निर्वाचित सदस्यों की तरह ही मतदान में हिस्सा ले सकते हैं।
इन 5 सदस्यों के मनोनयन के साथ ही सदन के सदस्यों की संख्या 95 हो जाएगी और बहुमत का आंकड़ा 48 तक पहुंच जाएगा। अगर एक्जिट पोल के अनुमानों को देखें तो कोई भी पार्टी अपने दम पर इस जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच रही है।
एनसी-कांग्रेस और बीजेपी में एलजी के अधिकारों पर हो रही है बहस
क्योंकि, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने नियुक्त किया है, इस वजह से नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस को उनके विशेषाधिकार को लेकर डर है।
उनकी दलील है कि वे सिर्फ मुख्यमंत्री की सलाह पर ही अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिसे बीजेपी पूरी तरह से नकार रही है और दावा कर रही है कि इसपर फैसला लेने का एलजी का विशेषाधिकार है।
पुडुचेरी वाले मॉडल की वजह से विपक्ष हो रहा परेशान!
मनोनीत सदस्यों का प्रावधान जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 और 2023 में इसमें हुए संशोधन में इसकी धारा 15 में मौजूद है। दरअसल, जम्मू और कश्मीर के लिए जो विधानसभा की व्यवस्था है, वह केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के मॉडल पर ही आधारित है, जिसमें मनोनीत एमएलए के भी वही अधिकार होते हैं, जो निर्वाचित सदस्यों के होते हैं, जिसमें मतदान का अधिकार भी शामिल है।
जब किरण बेदी पुडुचेरी की उपराज्यपाल थीं तो उन्होंने वहां की विधानसभा में 2 सदस्यों को मनोनीत किया था। इसके लिए उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार की सलाह नहीं ली थी। एलजी के इस फैसले के खिलाफ कांग्रेस सरकार ने अपने वकीलों को अदालतों में उतार दिया था।
कांग्रेस सरकार ने पहले मद्रास हाई कोर्ट में फिर सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि उपराज्यपाल ने इसपर मुख्यमंत्री की सलाह नहीं ली है। लेकिन, 2017-18 में पहले मद्रास हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट ने एलजी बेदी के फैसले को सही ठहराया और उसमें किसी भी तरह से कानूनी अधिकारों का उल्लंघन नहीं पाया।
5 एमएलए को मनोनीत करने का हम विरोध करते हैं- कांग्रेस
जबसे जम्मू और कश्मीर में 5 मनोनीत सदस्यों की चर्चा शुरू हुई है, विपक्षी खेमा टेंशन में नजर आ रहा है। जम्मू कश्मीर में कांग्रेस के उपाध्यक्ष रविंदर शर्मा ने कहा है, 'सरकार बनने से पहले एलजी की ओर से 5 एमएलए को मनोनीत करने का हम विरोध करते हैं। ऐसा कोई भी कदम लोकतंत्र, जनादेश और संविधान के मौलिक सिद्धांतों पर हमला है।'
5 मनोनीत सदस्यों पर क्यों फ्रंट फुट पर खेल रही BJP?
लेकिन, बीजेपी संवैधानिक प्रावधानों की वजह से निश्चिंत लग रही है। पूर्व उपमुख्यमंत्री और पार्टी नेता कविंदर गुप्ता ने कहा है, 'ये सदस्य नियमों के तहत मनोनीत किए जाएंगे। एलजी के पास अपने विवेक से मनोनयन का अधिकार है और वे नियमों के आधार पर ही करेंगे।'
एक मीडिया रिपोर्ट में जम्मू और कश्मीर के पूर्व कानून सचिव मोहम्मद अशरफ मीर के हवाले से बताया गया है कि लेफ्टिनेंट गवर्नर सरकार गठन से पहले पांच सदस्यों को मनोनीत कर सकते हैं। इसी वजह से बीजेपी फ्रंट फुट पर खेलती नजर आ रही है और विपक्ष उपराज्यपाल के विशेषाधिकार पर सवाल उठाने की कोशिश में है।












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