Baramulla: पिता जेल में, बेटों ने की भावुक अपील, 'तिहाड़ का बदला, वोट से', हार गए उमर अब्दुल्ला
जम्मू कश्मीर की बारामूला सीट पर इंजीनियर रशीद ने बड़ी जीत दर्ज करते हुए प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को हरा दिया है। इंजीनियर रशीद ने यह चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ा।
इंजीनियर रशीद की बात करें तो उन्हें टेरर फंडिंग से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में पांच साल तक तिहाड़ जेल में रहना पड़ा। उनके ऊपर जम्मू कश्मीर विधानसभा के भीतर भाजपा के नेताओं ने हमला तक किया, उन्हें अलगाववादियों की आवाज कहा गया।

इन सब के बाद भी उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और प्रदेश के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला को दो लाख से अधिक वोटों के अंतर से हरा दिया। रशीद का मुकाबला एनसी के उमर अब्दुल्ला और पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के सज्जाद लोन से था।
बेटों ने संभाला मोर्चा
जेल में रहते हुए रशीद के लिए चुनाव प्रचार उनके 23 साल के बेटे अबरार रशीद,और 21 साल के बेटे असरार रशीद ने किया। चुनाव प्रचार में इन लोगों ने आर्टिकल 370, विकास, रोजी-रोटी, बिजली या पानी का मु्द्दा नहीं उठाया।
अबरार ने लोगों ने लोगों से भावुक अपील की, उन्होंने लोगों से वोट मांगा ताकि उसके पिता जेल से बाहर आ सके। उन्होंने दमन और पिता की गिरफ्तारी के विरोध में लोगों से वोट मांगा।
चुनाव प्रचार में सिर्फ 21300 किया खर्च
अबरार ने कहा कि मैंने 9 दिन चुनाव प्रचार किया और इस दौरान हर रोज मेरा 1500-2000 रुपया पेट्रोल पर खर्च होता था। मैंने चुनाव प्रचार पर 21300 रुपए पेट्रोल पर खर्च हुआ। यह पैसा मेरे दादा जी ने अपनी पेंशन से दिया था। मैं इसकी रसीद भी दिखा जा सकता हूं, इसके अलावा मैंने एक भी पैसा अपने चुनाव प्रचार पर खर्च नहीं किया है।
अबरार ने जब तिहाड़ का बदला नारा दिया तो भीड़ ने उनका साथ वोट से कहकर दिया। रशीद का चुनाव प्रचार मुख्य रूप से लोगों की भावनाओं को अपनी ओर करने पर केंद्रित रहा। वहीं दूसरी पार्टियां यहां आर्टिकल 370 को खत्म किए जाने के नाम पर वोट मांग रही थीं।
जो लोग वोट डालने का बहिष्कार करते थे, उन लोगों ने भी रशीद के पक्ष में वोट दिया। अबरार ने चुनाव प्रचार के दौरान लोगों को संबोधित करते हुए कहा मुझे पता है कि आप लोग वोट डालने के खिलाफ हैं, लेकिन मुझसे वादा कीजिए, आप वोट डालने जाएंगे।
लोगों में यह सोच थी की सज्जाद लोन भाजपा के छद्म उम्मीदवार हैं, जबकि पीडीपी और एनसी पूर्व में भाजपा के साथ रह चुके हैं, जिसका इन दोनों दलों को नुकसान हुआ।
जब 20 मई को बारामूल में वोटिंग हुई तो यहां 58 फीसदी लोगों ने मतदान किया। यह 2019 में 35 फीसदी की तुलना में कहीं अधिक था। रशीद की राजनीति की शुरुआत 2008 में हुई।
वह हमेशा से अलगाववादियों का साथ और लोकतंत्र में भरोसा की राजनीति को बढ़ाते नजर आए। यही वजह है कि वह मुख्यधारा के नेताओं और अलगाववादी नेताओं से अलग रहे।
एक तरफ जहां उमर अब्दुल्ला को शर्मनाक हार मिली तो दूसरी तरफ सज्जाद लोन जिन्हें कुपवाड़ा जिले में लोकप्रिय नेता माना जा रहा था, उनकी राजनीति पर सवाल खड़ा हो रहा है। इन दोनों ही नेताओं की जगह को भरने का काम रशीद ने किया है।
रशीद उस वक्त सुर्खियों में आए जब उन्होंने पूर्व हुर्रियत नेता और लोन के पिता अब्दुल गनी लोन का साथ पकड़ा। 2000 में उन्होंने सेना द्वारा लैंगेट में जबरन मजदूरी के खिलाफ आवाज उठाई। अब्दुल गनी की हत्या के बाद रशीद ने उनके बेटे सज्जाद का साथ दिया, माना जा रहा था कि दोनों 2008 में साथ राजनीति में आएंगे।
लेकिन सज्जाद ने अमरनाथ जमीन विवाद को लेकर प्रदर्शन के बाद अपना मन बदल लिया और रशीद ने अपना रास्ता अलग कर लिया और निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला लिया। रशीद की व्यक्तिगत लोकप्रियता का उन्हें लाभ जरूर हुआ लेकिन सज्जा के साथ उनके संबंध कटु हो गए।
2014 के चुनाव में रशीद फिर से जीते। लेकिन 2019 में आर्टिकल 370 को खत्म कर दिया गया और रशीद को एनआईए ने समन किया। जिसके बाद उन्हें मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ्तार कर लिया गया। मंगलवार को उमर ने कहा कि रशीद के जेल से बाहर आने के कोई संकेत नहीं हैं, उनकी जीत के बाद भी स्थिति बदलती नजर नहीं आ रही है।
उमर ने उन्हें सोशल मीडिया पर बधाई देते हुए कहा कि मुझे नहीं लगता है कि उनकी जीत के बाद भी वह जेल से बाहर आएंगे, ना ही नॉर्थ कश्मीर के लोगों को संसद में प्रतिनिधित्व मिलेगा, जोकि मिलना चाहिए और यह उनका अधिकार है। लेकिन लोगों ने अपनी इच्छा जाहिर कर दी है, लोकतंत्र में यह काफी मायने रखता है।












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