Gujarat और Himachal में पूर्व मुख्यमंत्री और मंत्रियों के टिकट कटने से राजस्थान में बढ़ी बैचेनी, जानिए वजह
Gujarat Assembly Election 2022 और Himachal Pradesh Assembly Election 2022 में भाजपा ने जिस तरीके से पूर्व मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और विधायकों के टिकट काटे हैं। उससे राजस्थान के नेताओं में बेचैनी हो गई है। भाजपा ने दोनों प्रदेश में विधानसभा चुनाव में 50 वर्ष से ज्यादा उम्र के नेताओं को टिकट कम दिए हैं। इससे राजस्थान के नेताओं की धड़कन तेज हो गई है। राजस्थान में ज्यादातर नेता 50 वर्ष से अधिक उम्र के हैं। ऐसे में भाजपा गुजरात और हिमाचल प्रदेश में जीत हासिल करने में कामयाब रहती है तो राजस्थान के नेताओं की मुश्किलें बढ़ जाएगी। वरिष्ठ पत्रकार और राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मामलों के जानकार अजय सेतिया कहते हैं भाजपा इस फार्मूले को अपनाती रही है और आगे भी अपनाएगी। इस फार्मूले से पार्टी को सफलता भी मिली है। बीजेपी का मानना है कि एंटी इंकम्बेंसी सरकार के खिलाफ होती है। विधायक के खिलाफ नहीं। वे कहते हैं बीजेपी ऐसे ही टिकट नहीं काटेगी। जिस नेता का क्षेत्र, समाज और जाति में प्रभाव हो। उसका टिकट नहीं काटा जा सकता। भाजपा हाईकमान की कोशिश रहती है कि 70 साल से अधिक आयु के लोगों को टिकट नहीं दे। लेकिन अगर कोई राजनेता समाज और क्षेत्र में प्रभाव रखता है तो उस पर कोई फार्मूला लागू नहीं होता है।

गुजरात में भाजपा ने किया युवा उम्मीदवारों पर फोकस
बीजेपी ने गुजरात चुनाव में पार्टी की ओर से जारी की गई पहली सूची में बड़ा बदलाव किया है। पार्टी ने इस सूची में युवा उम्मीदवारों पर ज्यादा फोकस किया है। 50 से ज्यादा उम्र के नेताओं को टिकट कम दिए गए हैं। पार्टी एक्टिव लोगों पर दांव लगाना चाहती है। बीजेपी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में औसत उम्र 50 वर्ष रखी थी। अब इसे घटाकर 50 वर्ष कर दिया गया है। राजस्थान में अगर भाजपा इस फार्मूले को लागू करती है तो कई नेताओं की राजनीति संकट में आ जाएगी। राजस्थान में ऐसे कई नेता है जो पिछले 5-6 बार से विधायक हैं। लेकिन उनकी उम्र 60 से ऊपर हो चुकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि वे चुनाव कैसे लड़ पाएंगे। वरिष्ठ पत्रकार नीलम मुंजाल कहती हैं बीजेपी युवाओं को तरजीह दे रही है अच्छी बात है। भाजपा हमेशा युवाओं को मौका देने की बात करती आई है। पार्टी में वरिष्ठ तम लोगों की मौजूदगी के बावजूद नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने से पार्टी की नई सोच सामने आई थी। भाजपा में नए लोगों को मौका देने की परंपरा रही है। राजस्थान में भी इसका असर दिखेगा। वे कहती हैं राजस्थान में भाजपा के कई नेताओं ने खुद को और पार्टी को धरातल पर मजबूत बना रखा है। इसका सीधा फायदा भाजपा को भी मिलता रहा है। नए लोगों में अनुभव की कमी हो सकती है। हालांकि युवा राजनीति में आगे आने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। लेकिन राजस्थान में बीजेपी को रिस्क नहीं ले सकती। क्योंकि कांग्रेस हर हाल में सरकार रिपीट करने के प्रयास कर रही है। पार्टी की कोई भी चूक उन्हीं पर भारी पड़ सकती है। भाजपा का मुकाबला राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट जैसे कद्दावर नेताओं से है। ऐसे में भाजपा अनुभवी नेताओं की अनदेखी नहीं कर सकती। मुंजाल कहती है कोई एकाध अपवाद सामने आ सकते हैं। बहुत पुराने लोगों को पार्टी कम तरजीह दे सकती हैं। लेकिन अनदेखी नहीं कर सकती।

भाजपा ने काटे दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के टिकट
बीजेपी ने गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपानी और हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का विधानसभा चुनाव का टिकट काट दिया। ऐसे में सवाल उठता है कि पार्टी आने वाले समय में राजस्थान में भी कोई ऐसा कदम उठाएगी। गुजरात चुनाव में भाजपा द्वारा जारी स्टार प्रचारकों की सूची में राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को जगह नहीं दी गई है। भाजपा के इस नए प्रयोग से राजस्थान के नेताओं में बेचैनी हैं। प्रदेश के सियासी गलियारों में नई बहस छिड़ गई है।

राजस्थान के ज्यादातर नेता है 50 से अधिक उम्र के
बीजेपी हिमाचल प्रदेश और गुजरात में सफलता प्राप्त कर लेती है तो वह राजस्थान में भी नए प्रयोग करेगी। ऐसे में भाजपा के यह फार्मूले का राजस्थान में लागू होते हैं तो प्रदेश के नेताओं के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। प्रदेश में भाजपा के ज्यादातर मौजूदा विधायक 50 से ज्यादा की उम्र के हैं। वही शीर्षस्थ नेताओं में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, अर्जुन मेघवाल, नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया, उपनेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़, वासुदेव देवनानी, मदन दिलावर, जोगेश्वर गर्ग सहित अनेक नेता ऐसे हैं। जिनकी उम्र 50 वर्ष से भी कहीं ज्यादा है। सवाल उठता है तो क्या पार्टी उन्हें चुनाव नहीं लड़ाएगी। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक प्रहलाद गुंजल कहते हैं गुजरात और राजस्थान की राजनीति में बड़ा फर्क है। गुजरात में संगठन की निचले स्तर तक मजबूत पकड़ है। संगठन जिसको चाहे लड़ा सकता हैं और जितवा सकता है। वहां संगठन चुनाव लड़ता है। वे कहते हैं राजस्थान में बरसों से परम्परा है। संगठन के साथ ही व्यक्ति की अपनी पहचान और आधार होता है। इसी से संगठन और धरातल पर काम होता है। इसी आधार पर पार्टी, संगठन और जनता विचार करती है। ऐसे में उन लोगों की अनदेखी नहीं की जा सकती जो धरातल पर मजबूत हैं।










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