MP assembly election 2023: जबलपुर की उत्तर मध्य विधानसभा, सवर्णों के कंधो पर टिका जीत-हार का फैसला
MP assembly election 2023: मध्य प्रदेश के जबलपुर के शहरी विधानसभा क्षेत्रों में से एक उत्तर मध्य विधानसभा क्षेत्र भी हैं। सवर्ण बहुल इस सीट में (सबसे ज्यादा ब्राम्हण), परिसीमन से पूर्व मुस्लिम वोटों की तादाद ज्यादा थी और वे निर्णायक भी थे। लेकिन वर्तमान में जैन वोट इस सीट पर निर्णायक स्थिति में हैं। इसके अलावा सामाजिक समीकरण ओबीसी की ओर झुका हुआ प्रतीत होता है।
उत्तर मध्य विधानसभा शहर की पुरानी बसाहटों में से एक है। यहां नौकरीपेशा और कामगार वर्ग की अपेक्षा व्यापारी वर्ग की बहुतायत है। व्यापारी वर्ग में भी मझौले व्यापारी बहुसंख्यक तादाद में हैं। शहर की सबसे बड़ी कृषि उपज मंडी, फल-फूल की मंडी से लेकर, मुख्य कपड़ा बाजार स्थित हैं।
| मतदान का प्रतिशत |
| सबसे ज्यादा | सबसे कम |
| 2013 | 1990 और 1999 |
मध्यप्रदेश गठन के बाद यह विधानसभा जबलपुर मध्य विधानसभा थी। जिसमें शुरूआत से ही जबलपुर के सेठ गोविंददास परिवार का वर्चस्व रहा। कालांतर में इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी और फिर बीजेपी का इस सीट पर दबदबा रहा है। इमरजेंसी के बाद हुए चुनावों में जनसंघ की ओर से जयश्री बैनर्जी ने कांग्रेस और सेठ परिवार के परिवारवाद को शिकस्त देते हुए इस सीट को निकाला। साल 1980 में कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों को मद्देनजर रखते हुए यहां से एक पैराशूट प्रत्याशी उतारा। छिंदवाड़ा के हाजी इनायत अली यहां से विधायक चुने गए।

जातिगत समीकरणों की हवा
साल 1985 में कांग्रेस के ललित श्रीवास्तव को नवोदित पार्टी बीजेपी से ओंकार प्रसाद तिवारी (ओंकार महाराज) ने करारी शिकस्त दी। जिसके बाद से यह विधानसभा क्षेत्र बीजेपी का अभेद गढ़ माना जाने लगा। जबलपुर मध्य विधानसभा क्षेत्र का राजनैतिक मिजाज इसके जातिगत समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। वहीं समय-समय पर इस क्षेत्र की जनता ने राष्ट्रीय और प्रादेशिक मुद्दों पर भी वोट डाले।
संप्रदाय और वोटों का धु्रवीकरण
1977 में इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव हों, 1993 में बाबरी विध्वंस के बाद का चुनाव या फिर 2003 में दिग्विजय शासनकाल के विरोध का चुनाव यहां की जनता ने स्थानीय समस्याओं और विकास के बजाय समसामयिक मुद्दों पर वोट डाले। बाकी के चुनावों में स्थानीय विकास, जाति-संप्रदाय और वोटों का धु्रवीकरण ही चुनाव में हावी रहा। महिला उम्मीदवारों की बात की जाए तो इस सीट से जनसंघ से जयश्री बैनर्जी ने जीत हासिल की तो वहीं ओंकार महाराज के अवसान के बाद हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी अनारो देवी का नकार भी दिया।
जबलपुर मध्य विधानसभा को अभी तक सवर्ण समाज से ही विधायक प्राप्त हुए। केवल एक उपचुनाव में नरेश सराफ ओबीसी वर्ग से इस क्षेत्र के विधायक बने। साल 2003 से लेकर 2018 तक इस क्षेत्र को शरद जैन के रूप में प्रतिनिधित्व मिला तो वहीं वर्तमान में विधायक विनय सक्सेना भी सवर्ण समाज से ताल्लुक रखते हैं।
अब तक दो बड़े उलटफेर
इस विधानसभा क्षेत्र में बड़ी उलटफेर महज दो चुनावों में देखी गई। कौन सी बड़ी थी और कौन सी छोटी यह कहना तो मुश्किल होगा। लेकिन साल 1985 जब इंदिरा गांधी की असमय मृत्यु की सहानुभूति का आलम पूरे देश में था, केंद्र में कांग्रेस राजीव गांधी के नेतृत्व में 415 सीटों के साथ काबिज थी। उस वक्त हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने यहां से ललित श्रीवास्तव को टिकट दिया, इससे पहले कांग्रेस पैराशूट प्रत्याशी हाजी इनायत अली के यहां से जीतने के बाद अति आत्मविश्वास से भरी हुई थी। देश में जनसंघ बीजेपी के रूप में उदित हो चुका था। उस वक्त बीजेपी ने ठेठ देसी प्रत्याशी ओंकार प्रसाद तिवारी पर अपना दांव खेला। राष्ट्रीय परिदृश्य के उलट ओंकार महाराज ने यहां से अच्छी तरह से जमी हुई कांग्रेस को बिखेरकर रख दिया और बीजेपी को अच्छी खासी जीत दिलाई। जिसके बाद यह क्षेत्र बीजेपी के गढ़ में तब्दील हो गया और ओंकार महाराज कद्दावर नेता के रूप में उभरे।
इस सीट में दूसरा उलटफेर हालिया साल 2018 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। जब बीजेपी के खास वोटरों से भरी इस विधानसभा सीट से एक बागी प्रत्याशी धीरज पटेरिया ने बगावत स्वरूप चुनाव मैदान में ताल ठोंक दी। जिसके चलते बीजेपी के इस अभेद किले में कांग्रेस के विनय सक्सेना सेंधमारी करने में सफल हुए और जैन वोटरों की बहुलता वाली इस सीट से पूर्व राज्यमंत्री शरद जैन महज 525 वोटों से हार गए। बीजेपी से बागी प्रत्याशी धीरज पटैरिया ने 29 हजार से ज्यादा मत हासिल किए और अपने गुब्बारे की हवा से बीजेपी की हवा टाइट कर दी।
साल 2018 के चुनाव में वैसे तो कांग्रेस की हालत बेहद पतली थी लेकिन बीजेपी की ओर से लगातार नाकाम रहने का आरोप झेल रहे पूर्व स्वास्थ्य राज्यमंत्री शरद जैन को एक बार पुनः मौका दिए जाने से जनता में नाराजगी थी। तत्कालीन समय में फैले लंगड़ा बुखार ने पूरे शहर को अपने चपेट में ले रखा था, उस वक्त स्वास्थ्य विभाग के लचर रवैए ने शरद जैन की मुसीबतें बढ़ाईं। तो रही कसर बीजेपी के बागी प्रत्याशी धीरज पटैरिया ने चुनाव मैदान में उतरकर पूरी कर दी और उनका पूरा खेल बिगाड़ दिया। विनय सक्सेना महज 525 वोटों से यह सीट निकालने में कामयाब रहे थे।












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