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MP Assembly Election 2023: जबलपुर की 'पूर्व विधानसभा' सीट, वोट ध्रुवीकरण फैक्टर से डिसाइड होते आए नतीजे

MP Assembly Election 2023: मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव की सीरीज में अब बात जबलपुर शहर के 'पूर्व विधानसभा क्षेत्र' की। यह सीट पिछड़ी दलित बस्तियों और मुस्लिम बहुल लोगों के नाम से पहचानी जाती हैं। क्षेत्र में दलित वर्ग के मतदाता और मुस्लिम मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा है।

90 के दशक से यहां वोटों की ध्रुवीकरण का फैक्टर ही चुनाव का नतीजा डिसाइड करता चला आ रहा है। क्षेत्र में कानून व्यवस्था और नशे का व्यापार सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है। आर्थिक दृष्टि से जबलपुर पूर्व विधानसभा क्षेत्र बेहद पिछड़ी विधानसभा है। क्षेत्र में दलित बस्तियों और मस्लिम बहुल बस्तियों की तादाद काफी ज्यादा है।

आजादी के पश्चात सेंट्रल प्राविंस के समय यह सीट जबलपुर नंबर 1 के नाम से जानी जाती थी। बाद में इसका नाम जबलपुर पूर्व हो गया। शुरुआती समय में यह सीट सुरक्षित नहीं थी। इस सीट से कभी कुंजीलाल दुबे निर्वाचित हुए, भनोत परिवार के कृष्ण अवतार भनोत को इसी सीट की जनता ने विधानसभा पहुंचाया। तो कांग्रेस के बड़े नाम केएल दुबे और जगदीश नारायण अवस्थी भी इसी सीट से निर्वाचित हुए। साल 1977 में परिसीमन के चलते यह सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हो गई।

MP Assembly Election 2023 East Assembly Constituency

वैसे तो जबलपुर पूर्व विधानसभा क्षेत्र जिला मुख्यालय, हाईकोर्ट से सटी हुई विधानसभा है और इसमें ही जिला अस्पताल, एसपी दफ्तर, सेंट्रल जेल, पुलिस लाइन का भी हिस्सा है। लेकिन लॉ एंड ऑर्डर इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या है। ऐसा नहीं है कि इस क्षेत्र से युवाओं ने तरक्की नहीं की। खेलों की बात की जाए तो महिला हॉकी में देश का नाम रोशन करने वाली मधु यादव, एशियाड सिल्वर मेडलिस्ट मुस्कान किरार इसी क्षेत्र की निवासी हैं। विधानसभा क्षेत्र की सबसे अच्छी पहचान टाउन हॉल है जहां 1922 में झंडा सत्याग्रह की शुरूआत हुई थी।

विधानसभा क्षेत्र का राजनैतिक मिजाज
जबलपुर पूर्व विधानसभा क्षेत्र का राजनैतिक मिजाज बेहद अक्खड़ और खूनखराबे वाला है। क्षेत्र में विधानसभा चुनाव सबसे ज्यादा संवेदनशील मसला है। क्षेत्र में जिले के सबसे ज्यादा संवेदनशील और अतिसंवेदनशील मतदान केंद्र मौजूद हैं। दलित-मुस्लिम बहुल इस सीट पर मुकाबला हर बार कड़ा होता चला आया है। बाबरी विध्वंस के बाद वोटों का ध्रुवीकरण ही इस क्षेत्र में जीत-हार को तय करता चला आ रहा है। 1990 में कारसेवकों पर गोली चली हो, या फिर 1992 का बाबरी विध्वंस यह इलाका सांप्रदायिक दंगों के कारण अशांत रहा। जिसके चलते यहां वोटो के धु्रवीकरण की राजनीति चरम पर रही।

अंचल सोनकर बतौर बीजेपी प्रत्याशी इस क्षेत्र से लगातार 3 बार निर्वाचित हुए। इस बीच 2006 में परिसीमन के बाद उत्तर मध्य विधानसभा के कई मुस्लिम बहुल वार्ड पूर्व विधानसभा में जुड़ गए। जिसके चलते मुस्लिम मतदाता इस क्षेत्र में निर्णायक स्थिति में आ गए और फिर साल 2008 में कांग्रेस ने छात्र राजनीति से कद्दावर नेता तक का सफर तय करने वाले लखन घनघोरिया को मौका दिया। जिन्होंने परिसीमन के बाद बने समीकरण और दलित वर्ग खासकर सोनकर समाज में अपनी लोकप्रिय छवि के चलते चुनाव जीतकर अंचल सोनकर के एकछत्र राज को न केवल चुनौती दी बल्कि उसे खत्म भी कर दिया।

साल 2013 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर कांटे का मुकाबला देखने को मिला। मतगणना के दौरान दोनों प्रत्याशियों के बीच आगे-पीछे रहने का क्रम चलता रहा और परिणामस्वरूप कांग्रेस के लखन घनघोरिया महज 1155 मतों से हार गए। साल 2018 में विधानसभा चुनाव के दौरान क्षेत्र में अनेक बार बलवा की स्थिति निर्मित हुई। एक बार तो थाना बेलबाग के परिसर और उसके अंदर भी गोलियों की गूंज सुनाई दी। बेहद संवेदनशील हालातों में हुए चुनाव में कांग्रेस के लखन घनघोरिया ने करीब 36 हजार मतों से जीत हासिल की।

एक ही समाज के रहे प्रमुख दल के उम्मीदवार
पिछले 3 चुनाव से दोनों ही प्रमुख दल एक ही समाज से प्रत्याशी उतारते चले आ रहे हैं। जिसके चलते दलित मतदाताओं में खासकर सोनकर समाज क्रमवार ढंग से दोनों प्रत्याशियों को मौका देता चला आ रहा है। पिछले चुनाव में परंपरा के अनुसार मुस्लिम मतदाताओं ने कांग्रेस को बंपर वोट किया वहीं दलित समाज खासकर सोनकर समाज ने लखन घनघोरिया को अपना वोट रूपी आशीर्वाद दिया। 2023 के चुनाव में बीजेपी ने पिछले चुनाव में हारे पूर्व विधायक अंचल सोनकर पर फिर दांव चला हैं। उम्मीदवारों की पहली लिस्ट अंचल का नाम घोषित कर दिया गया। वहीं कांग्रेस से कमलनाथ के करीबी लखन घनघोरिया का टिकट भी फाइनल ही माना जा रहा हैं।

'माय नेम इज लखन'
पिछले 15 साल से पूर्व विधानसभा क्षेत्र में चुनाव और 90 के दशक की सुपरहिट फिल्म रामलखन का चोली दामन का साथ हो गया है। साल 2008 में लखन घनघोरिया की जीत के साथ पूरा क्षेत्र 'माय नेम इज लखन' के गाने से गूंजता रहा। तो साल 2013 में जब अंचल जीते तो उन्होंने 'तेरे लखन ने बड़ा दुख दीना' गीत को मानो कैंपेनिंग सॉन्ग बना लिया। साल 2018 में एक बार फिर 'माय नेम इज लखन' गाना जमकर बजा। अब देखना यह होगा कि साल 2023 के चुनाव में कौन सा गाना बजता है।

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