ये कैसा इलाज कि 7 साल के मासूम को गर्म सलाखों से दागा, हालत बिगड़ी वेंटिलेटर पर मासूम
दुनिया चाँद पर पहुँच चुकी है, लेकिन आज भी देश के ग्रामीण अंचलों में अंधविश्वास अपने पैर पसारे हुए है। चिकित्सा विज्ञान की और इलाज की तमाम तरक्की के बीच लोग अंधविश्वास की वेदी पर चढ़ने एक टांग से खड़े है। How is this treat
रतलाम, 08 जुलाई: इंसान की शारीरिक बीमारियों में अंध-विश्वास की इतनी भयानक बीमारी है, कि अच्छा-ख़ासा इंसान अपनी जान से हाथ धो बैठे। उलटी-दस्त और बुखार से परेशान रतलाम के 7 साल के एक मासूम को गर्म सलाखों (डाम) से दगवा दिया। परिवार ने न तो बच्चे की उम्र का ख्याल रखा और न ही उसकी जिन्दगी की परवाह की। हालात ये बने कि बच्चे की जान पर बन आई है और उसे वेंटिलेटर पर रखा गया है।

‘मौत के मुहं में मासूम’ कौन जिम्मेदार ?
रतलाम का रहने वाला 7 साल का मासूम राजस्थान के अस्पताल में जिन्दगी की जंग लड़ रहा है। हँसते-खेलते मासूम भरत को कुछ दिनों से बुखार आ रहा था है। इसी दौरान उसे उल्टी दस्त की शिकायत भी होने लगी। तबियत में सुधार होता न देख, उसके परिवार के लोगों ने इलाज का वह रास्ता चुना जिसे सुनकर किसी की भी रूहं कांप जाए। घर वाले उसे 70 किलोमीटर दूर राजस्थान के एक गांव ले गए जहाँ अंधविश्वासी परंपरा से इलाज किया जाता है। गर्म सरिए (डाम) से भरत को जगह-जगह दगवा दिया। जिस गांव में इस ढंग से इलाज के नाम पर जुल्म ढाया जा रहा था, वहां अन्य कई लोग भी इलाज के लिए पहुंचे थे। सभी तमाशबीन बने रहे और किसी ने भी रोकने की जहमत नहीं उठाई।

गर्म सलाखें दागते ही बच्चा हुआ बेहोश
परिवार के लोगों ने इस बात की परवाह भी नही कि मासूम को गर्म सरिए दागना कितना खतरनाक साबित हो सकता है। बच्चे की हालत पहले से ही बिगड़ी हुई थी, ऊपर से उस पर अंधविश्वास का जुल्म हुआ। देखते ही देखते हाथ और पैर में डाम दागने से भरत बेहोश हो गया। अचेत अवस्था में उसे राजस्थान के एमसीएच अस्पताल ले जाया गया, जहाँ बच्चे की हालत देख डाक्टरों के भी होश उड़ गए। बच्चे का ऑक्सीजन लेवल कम होने के साथ उसे कई तरह के कॉम्प्लिकेशन उत्पन्न हो गए है, लगातार हालत बिगड़ता देख उसे अब वेंटिलेटर पर रखा गया है।

इलाज के नाम पर अंध-विश्वास
दुनिया चाँद पर पहुँच चुकी है, लेकिन आज भी देश के ग्रामीण अंचलों में अंधविश्वास अपने पैर पसारे हुए है। चिकित्सा विज्ञान की और इलाज की तमाम तरक्की के बीच लोग अंधविश्वास की वेदी पर चढ़ने एक टांग से खड़े है। रतलाम का मामला उसी में से एक उदहारण है। बच्चे को जन्म देने वाले माता-पिता को जरा भी तरस नही आया, कि पहले से बीमार 7 साल के भरत को गर्म सलाखों से दगवाना कितना खतरनाक साबित होगा। इलाज के नाम कही किसी को गर्म सलाखे दागी जा रही है तो कही किसी को झाड़-फूंक से ठीक करने का दावा किया जा रहा है।

ग्रामीण अंचलों में गर्म सरिए (डाम) से इलाज
बुखार या अन्य किसी तरह की बीमरियों से निजात पाने ग्रामीण इलाकों में आज भी ऐसे इलाज की परंपरा प्रचलित है। खासकर आदिवासी अंचल में देशी इलाज के नाम पर यह उपाय किए जाते है। इसके खतरनाक दुष्प्रभाव को लेकर जागरूकता अभियान भी चलाए जाते है। पर सामाजिक कुरूतियों ने आज के इंसान की सोच को जमीन में दफ़न कर दिया है। इससे समझा जा सकता है आज के भौतिकवादी युग में भी अंधविश्वास के जड़े कितनी गहरी है।
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