Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

हीरे धरती के गर्भ में तैयार हुए या उनकी बारिश हुई?

हीरे की यह तस्वीर प्रतीकात्मक है

नई दिल्ली, 06 सितंबर। वैज्ञानिकों का कहना है कि पूरे ब्रह्मांड में हीरों की बरसात हो सकती है. सामान्य प्लास्टिक का इस्तेमाल कर उन्होंने एक अनोखी बारिश की प्रक्रिया को दिखाया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक यही प्रक्रिया अरुण और वरूण ग्रह के अंदर बहुत गहराई में भी होने की संभावना है.

वैज्ञानिक सिद्धांतों के मुताबिक अत्यधिक दबाव और तापमान बर्फ की सतह के हजारों किलोमीटर नीचे भूगर्भ में हाइड्रोजन और कार्बन को ठोस हीरे में बदल देता है. अब नई रिसर्च ने इसमें ऑक्सीजन को भी शामिल किया है और रिसर्चरों का कहना है कि "हीरों की बरसात" जितना सोचा गया था उससे कहीं ज्यादा आम बात हो सकती है. हमारे सौरमंडल के बाहर वरूण (नेपच्यून) और अरुण(यूरेनस) जैसे बर्फ से ढके बहुत सारे ग्रह हैं. इसका मतलब है कि हीरों की बरसात पूरे ब्रह्मांड में हुई हो ऐसा भी हो सकता है.

यह भी पढ़ेंः लुलो रोज़: इतना बड़ा गुलाबी हीरा 300 सालों में नहीं मिला

जर्मनी के एचजेडडीआर रिसर्च लैब में भौतिकशास्त्री डॉमिनिक क्राउस इस रिसर्च रिपोर्ट के लेखकों में हैं. उनका कहना है कि पृथ्वी पर आमतौर पर होने वाली बारिश और हीरे की बारिश में काफी अंतर है. माना जाता है कि ग्रहों की सतह के खूब भीतर "गर्म और काफी गाढ़ा तरल" मौजूद है. यहीं पर हीरे बनते हैं और पृथ्वी के आकार वाले चट्टानी कोर यानी करीब 10,000 किलोमीटर की गहराई में चले जाते हैं.

क्राउस ने बताया कि ये गिरते हुए हीरे मोटी परत का निर्माण कर सकते हैं जिनका विस्तार, "सैकड़ों किलोमीटर या उससे भी ज्यादा हो सकता है." क्राउस का कहना है कि ये हीरे किसी अंगूठी में जड़े जाने वाले नगीने जैसे चमकदार या तीखे कोणों वाले शायद नहीं होंगे लेकिन पृथ्वी पर जिन ताकतों से हीरे बनते हैं उसी से होकर ये भी गुजरे हैं.

नैनोडायमंड का निर्माण

इस प्रक्रिया की नकल तैयार करने के लिए रिसर्च टीम ने आसानी से उपलब्ध स्रोत यानी पीईटी प्लास्टिक से कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का एक मिश्रण तैयार किया. पीईटी प्लास्टिक वही है जो आजकल ज्यादातर खाने की पैकिंग और बोतलों में इस्तेमाल होता है. क्राउस ने बताया कि रिसर्चरों ने बिल्कुल साफ पीईटी प्लास्टिक का इस्तेमाल किया लेकिन "सैद्धांतिक रूप से यह प्रयोग कोका-कोला की बोतलों के साथ किया जा सकता है."

कैलिफॉर्निया की एसएलएसी नेशनल एक्सीलरेटर लैबोरेट्री में रिसर्च टीम ने एक उच्च क्षमता वाले ऑप्टिकल लेजर को प्लास्टिक पर डाला. क्राउस ने बताया, "बहुत छोटी मगर खूब चमकदार एक्स रे किरणों" ने नैनोडायमंड की प्रक्रिया को देखना संभव किया, छोटे छोटे हीरे के कण बने जिन्हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता." नैनोडायमंड एक माइक्रोमीटर से छोटे आकार के हीरों को कहते हैं.

क्राउस ने यह भी कहा, "उन ग्रहों (अरुण और वरूण) पर जो भारी मात्रा में ऑक्सीजन मौजूद है उसने कार्बन से हाइड्रोजन के परमाणुओं को सोख कर अलग करने में मदद की, तो वास्तव में ऐसे हीरों का बनना आसान है." यह प्रयोग नैनोडायमंड बनाने के एक नये तरीके की ओर ले जा सकता है. ऐसे हीरे आज कल दवाओं की डिलीवरी से लेकर, मेडिकल सेंसर, बिना चीर फाड़ की सर्जरी और क्वॉन्टम इलेक्ट्रॉनिक्स में खूब इस्तेमाल हो रहे हैं.

रिसर्च रिपोर्ट के सह लेखक बेंजामिन ओफोरिओकाइ ने बताया, "फिलहालनैनोडायमंड बनाने के लिये कार्बन या डायमंड का ढेर लेकर इसे विस्फोटकों से तोड़ा जाता है. लेजर प्रोडक्शन एक स्वच्छ और आसानी से नियंत्रित प्रक्रिया के जरिये नैनोडायमंड तैयार कर सकता है."

अरुण और वरुण

हीरे की बारिश के बारे में रिसर्च अब भी काल्पनिक ही है क्योंकि अरुण और वरूण के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. हमारे सौरमंडल में ये दोनों ग्रह पृथ्वी से काफी दूर हैं. अब तक सिर्फ एक ही यान है जो इन विशाल बर्फीले ग्रहों के पास से गुजरा था.

1980 में नासा के वॉयजर 2 ने यह काम किया था और उस दौरान जो आंकड़े जमा हुए आज तक वही इस्तेमाल हो रहे हैं. हालांकि नासा के एक समूह ने इन ग्रहों के लिए नये मिशन की संभावना जतायी है जो अगले दशक में कभी शुरू हो सकती है. क्राउस का कहना है कि "वह शानदार होगा." क्राउस को और अधिक आंकड़ों का इंतजार है भले ही इसमें 10-20 साल लग जाएं.

एनआर/वीके (एएफपी)

Source: DW

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+