तीसरी बार सत्ता संभालकर और ताकतवर हो जाएंगे शी जिनपिंग, भारत के साथ कैसा रहेगा रिश्ता?
माओ जेदोंग के नियम को तोड़कर शी जिनपिंग अब तीसरी बार चीन के राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। भारत के लिए शी जिनपिंग के संभावित तीसरे कार्यकाल के क्या मायने हैं? शी का तीसरा कार्यकाल अभूतपूर्व क्यों होगा?
वर्ष 2012 में चीन (China) की सत्ता पर काबिज होने के 10 साल बाद आज राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) दुनिया के सबसे ताकतवर नेताओं में से एक बन गए हैं। पुराने सारे नियम कायदे को पलटकर अब वे आजीवन सत्ता की कमान अपने हाथ में लेने जा रहे हैं। कुछ वक्त पहले तक ऐसा दावा किया जाता था कि शी जिनपिंग चीन में माओ जेदोंग (Mao Zedong) के बाद सबसे ताकतवर नेता हैं। लेकिन उनके तीसरी बार कमान संभालने के बाद कुछ लोग ऐसा भी दावा कर रहे हैं कि चीनी राष्ट्रपति, चीन निर्माता कहे जाने वाले माओत्से तुंग से भी शक्ति हासिल कर चुके हैं।
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शी जिनपिंग ने तोड़ा माओ जेदोंग का नियम
शी जिनपिंग से पहले माओत्से तुंग जिन्हें माओ जेदोंग भी कहा जाता है, ऐसे नेता थे जिन्होंने आजीवन चीन की सत्ता संभाली थी। साल 1980 के दशक में माओ ने ही अध्यक्ष पद के कार्यकाल पर 2 बार की समयसीमा लागू की थी लेकिन शी जिनपिंग ने माओ के नियम को भी बदलकर रख डाला है। शी जिनपिंग चीन में इतने ताकतवर हो गए हैं कि उनके हाथ से सत्ता लेकर किसी और को सौंप देना फिलहाल असंभव बात लग रही है। बीजिंग में कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं नेशनल कांग्रेस के उद्घाटन के मौके पर शी जिनपिंग ने आगे के वर्षों की आक्रामक रणनीति की तरफ इशारा कर दिया है।

चीन को माओ में ले जा रहे शी जिनपिंग
माओ ने चीन में एक व्यक्ति के शासन का विरोध किया था। एक भाषण में माओ ने कहा, "सत्ता का अति केंद्रीकरण होना अच्छा नहीं है।" अटलांटिक काउंसिल के अनुसार, नेता ने कहा, "यह समाजवादी लोकतंत्र और पार्टी के लोकतांत्रिक केंद्रीयवाद की प्रैक्टिस में बाधा डालता है, समाजवादी निर्माण की प्रगति में बाधा डालता है, और हमें सामूहिक ज्ञान का पूरा फायदा उठाने से रोकता है।" लेकिन शी जिनपिंग चीन में आर्थिक और राजनीतिक निर्णय लेने का 'विकेंद्रीकरण' कर रहे हैं, जिन्हें देंग के तहत विकेंद्रीकृत किया गया था। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, शी की सत्ता का केंद्रीकरण देश को माओ युग में वापस ले जा रहा है।

बरकरार रहेगा चीन का आक्रामक रुख
अब जब यह तय हो गया है कि शी जिनपिंग आजीवन चीन के मुखिया बने रहेंगे तो उनके नेतृत्व में चीन का 'आक्रामक' अंतरराष्ट्रीय रुख के जारी रहने की उम्मीद है। इसकी बानगी रविवार को तब दिख गई जब कांग्रेस की बैठक में गलवान वैली क्लैश की क्लिप दिखाई गई। जून 2020 में पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी की झड़प के बाद भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ गया था। इस झड़प में 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई थी जबकि चीन ने माना था कि उसके 4 सैनिक मारे गए हैं। वहीं, रूसी समाचार एजेंसी TASS के अनुसार इस सैन्य गतिरोध में कम से कम 40 चीनी सैन्यकर्मी मारे गए।

टकराते रहेंगे भारत संग हित
आर्थिक मोर्चे पर भारत की अंतिम प्रगति और 'रणनीतिक धैर्य' चीन द्वारा पेश की गई चुनौती का मुकाबला कर सकता है। भारत और चीन के अलग-अलग फंडामेंटल वैल्यूज हैं, और इसलिए जाहिर है कि नई दिल्ली के हित बीजिंग के हितों के साथ टकराते रहेंगे और आने वाले वक्त में ऐसा हो सकता है कि दोनों देशों के बीच फिर से गलवान घाटी और डोकलाम जैसा दोहराव दिखे। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और वह पहले स्थान पर काबिज अमेरिका को इस स्थान से अपदस्थ करना चाहता है। अमेरिका के साथ अपनी प्रतिस्पर्धा में, चीन को दुनिया को यह दिखाने की जरूरत है कि वह एशिया में उसका ही सिक्का चलता है।
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