हफ्ते में 4 दिन काम, फायदा या नुकसान? इस देश में दुनिया का सबसे बड़ा ट्रायल खत्म, जानिए क्या निकला नतीजा?
World's largest 4-day workweek trial Result: एक हफ्ते में कितने दिन काम होना चाहिए और कितने दिनों की छुट्टी मिलनी चाहिए, इसपर दुनियाभर में अलग अलग विचार रखे जाते हैं। मौजूदा समय में हफ्ते में पांच और 6 दिन काम करने का कल्चर चल रहा है, लेकिन कई देशों में इस बात पर विचार हो रहा है, कि अगर हफ्ते में चार दिन काम हो और तीन दिनों की छुट्टी मिले, तो उत्पादक क्षमता बढ़ सकती है।
यूनाइटेड किंगडम में हफ्ते में चार दिनों की छुट्टी को लेकर दुनिया का सबसे बड़ा ट्रायल किया गया है और अब उसका नतीजा सामने आ गया है, जिसके परिणाम आश्चर्यजनक आए हैं।

रिसर्च में क्या खुलासा हुआ?
रिसर्च के मुताबिक, सबसे हैरानी वाला खुलासा ये हुआ है, जिन कंपनियों ने या कारोबारियों ने अपने संस्थान में चार दिन काम लागू किया था और अपने कर्मचारियों को हफ्ते में तीन दिनों की छुट्टी दी थी, उनमें से ज्यादातर लोगों ने इस नियम को स्थाई बना दिया है।
इन कारोबारियों और कंपनियों की तरफ से मिले रिव्यू में पता चला है, कि कर्मचारियों ने इस दौरान काफी कम तनाव में काम किया है, वो नौकरी करते वक्त काफी ज्यादा खुश थे और उन्होंने कंपनियों के लिए काफी बेहतरीन काम किया है, जिससे कंपनी के राजस्व में अच्छा खासा इजाफा हुआ है। कर्मचारियों का कहना है, कि कंपनी उनके लिए स्वर्ग बन चुकी है।
किस तरह से किया गया रिसर्च?
इस रिसर्च में पता चला है, कि यूके में 61 संगठनों के कर्मचारियों ने जून से दिसंबर 2022 तक छह महीने के लिए लागू किए गये इस रिसर्च के दौरान 100 प्रतिशत योगदान दिया है, जिससे कंपनी के राजस्व में इजाफा हुआ है।
रिसर्च के बाद जो रिसर्च पेपर जारी किया है, उसमें कहा गया है, कि इसमें शामिल कम से कम 54 (89 प्रतिशत) कंपनियां एक साल बाद भी इस नीति का उपयोग कर रही हैं, और 31 (51 प्रतिशत) कंपनियों ने इस बदलाव को अब स्थायी तौर पर लागू कर दिया है, जबकि अभी तक दो कंपनियों की तरफ से नतीजे जारी नहीं किए गये हैं।
रिसर्च लिखने वाले रिसर्चर्स का कहना है, कि इस स्टडी से पता चलता है, कि हफ्ते में चार दिन काम और तीन दिन आराम सिर्फ अफवाह नहीं है, बल्कि यूके की ज्यादातर कंपनियां अब इस मॉडल को लागू करने जा रही हैं।
यूके स्थिति थिंक टैंक ऑटोनॉमी, जो एक गैर-लाभकारी संस्था है, उसने कैम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड और बोस्टन कॉलेज के रिसर्चर्स के सहयोग से साल 2022 में इस मॉडल को लागू किया था और बुधवार को इसके नतीजे जारी किए गये हैं।
कर्मचारियों पर पड़ा अच्छा प्रभाव
स्टडी में पता चला है, हफ्ते में चार दिन काम और तीन दिन आराम का कर्मचारियों से लेकर कंपनियां तक को काफी फायदा हुआ है।
इस मॉडल से कर्मचारियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा पॉजिटिव असर बड़ा, उनके थकान में काफी कमी आई, उनका लाइफस्टाइल काफी संतुलित हुआ, लिहाजा ज्यादातर कंपनियों ने इस मॉडल को अभी भी जारी रखा है।
बोस्टन कॉलेज में समाजशास्त्र के प्रोफेसर जूलियट शोर ने कहा, कि "सबसे खास बात यह है, कि छह महीनों में मजबूत नतीजे आना, सिर्फ अल्पकालिक प्रभाव नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नतीजों को दर्शाता है। ये प्रभाव वास्तविक और लंबे समय तक चलने वाले हैं।"
सर्वेक्षण में पाया गया, कि आधे से ज्यादा (55 प्रतिशत) प्रोजेक्ट मैनेजर सीईओ ने कहा, कि उनके संगठन को चार-दिवसीय कार्य से लाभ हुआ है - जिसमें कर्मचारी अपने 80 प्रतिशत समय में ही अपने आउटपुट का 100 प्रतिशत काम करते हैं।
82 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा, कि इसका कर्मचारियों की भलाई पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है, 50 प्रतिशत ने पाया कि इससे नये कर्मचारियों की भर्ती कम हो गई है, क्योंकि कर्मचारियों ने नौकरी छोड़ना बंद कर दिया है, और 32 प्रतिशत ने कहा, कि इससे नौकरी की भर्ती में सुधार हुआ है। 46 प्रतिशत ने संकेत दिया, कि कामकाजी परिस्थितियों और उत्पादकता में सुधार हुआ है।
किस तरह लागू किया गया था मॉडल?
2022 में शुरू किए गये इस मॉडल में 61 कंपनियों ने हिस्सा लिया था, जिनमें मार्केटिंग, एडवरटाइजिंग, प्रोफेशनल सर्विसेज कंपनियां और नॉन-प्रॉफिट सेक्टर की कंपनियां शामिल थीं। इसके अलावा, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, रिटेल, हेल्थकेयर, आर्ट और एंटरटेनमेंट सेक्टर को भी शामिल किया गया था।
इस मॉडल के तहत हफ्ते में 31.6 घंटे काम के घंटे रखे गये थे और औसतन कंपनियां ने 6.6 काम के घंटे घटा दिए थे। इसके तहत कंपनियों ने अलग अलग तरह से छुट्टियां दी, जैसे कुछ कंपनियों ने एक साथ तीन छुट्टियां दीं, जबकि कई कंपनियों ने हफ्ते के अलग अलग दिन छुट्टी दिए।
हालांकि, कई कंपनियों को इस दौरान दिक्कतों का भी सामना करना पड़ा और क्लाइंट और स्टेकहॉल्डर्स के साथ संपर्क करने में दिक्कतें आईं, जहां हफ्ते में चार दिनों की छुट्टी का मॉडल नहीं था। वहीं, जिन कंपनियों में इस मॉडल को सही तरीके से लागू नहीं किया गया, वहां के कर्मचारियों में गुस्सा और मिस मैनेजमेंट भी देखने को मिला।
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