क्या अफ़ग़ानिस्तान में तैनात होगी भारतीय सेना?

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भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच लंबे समय से दोस्ताना संबंध रहे हैं. भारत सरकार दशकों से चरमपंथ की मार झेल रहे अफ़ग़ानिस्तान में आधारभूत ढांचे को फिर से खड़ा करने में अपनी अहम भूमिका निभा रही है.

लेकिन अक्सर ये माना जाता है कि भारत सरकार अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण में सक्रिय रूप से मदद कर रही है लेकिन अपने सैनिकों को अफ़ग़ानिस्तान में तैनात करने से बचती आ रही है.

बीबीसी ने भारत और अफ़गानिस्तान के रिश्तों और चरमपंथ से जुड़े ऐसे ही सवालों के जवाब अफ़ग़ानिस्तान के चीफ़ एग्ज़ीक्यूटिव अब्दुल्ला अब्दुल्ला से जानने की कोशिश की है.

सवाल - 1 भारत सरकार अफ़ग़ानिस्तान की मदद करती रही है लेकिन अब तक अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सेना भेजने से बचती रही है. क्या भारत सरकार ऐसा करने का फ़ैसला करे तो इससे आपको मदद मिलेगी?

अब्दुल्ला अब्दुल्ला: भारत का सहयोग हमारे लिए कई तरह से मददगार साबित हुआ है. हमारे बीच में कुछ सुरक्षा से जुड़ी हुई साझेदारियां हैं जो जारी रहेंगी. अगर उनकी सेना के यहां उतरने की बात करें तो कभी भी हमारे बीच इस बारे में कोई बात नहीं हुई.

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सवाल - 2 पाकिस्तान में अब एक नई सरकार है. लेकिन नए प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के बारे में उनके आलोचक कहते हैं कि वह तालिबान के प्रति सहानुभूति रखते हैं. ऐसे में उनके सत्ता में आने से अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा?

अब्दुल्ला अब्दुल्ला: प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने क्षेत्र में शांति और स्थिरता कायम करने की बात कही है जिसका हम स्वागत करते हैं. इसमें कोई शक नहीं है कि दोनों देशों के रिश्तों में तमाम चुनौतियां हैं जिनका सामना करने के लिए दोनों ओर से गंभीर सहयोग की ज़रूरत है. इस क्षेत्र में अगर किसी भी सरकार के लिए कोई एक सबक है तो वह ये है कि चरमपंथी तत्व लंबे समय तक किसी के लिए भी हितकारी नहीं हो सकते. वे लोग अपना राज्य चाहते हैं और किसी भी देश के ख़िलाफ़ जाएंगे."

सवाल - 3 अक्सर सुनने में आता है कि अफ़ग़ानिस्तान में अमरीका और तालिबान के बीच में बातचीत हो रही है. लेकिन क्या सच में ऐसा हो रहा है?

अब्दुल्ला अब्दुल्ला: ये सही है कि बातचीत और संपर्क किया गया है लेकिन इसका उद्देश्य तालिबान को अफ़ग़ान सरकार से बात करने के लिए प्रेरित करने के लिए रहा है.

सवाल - 4 अगर ऐसा है तो आपकी सरकार इस बातचीत का हिस्सा क्यों नहीं बनती है?

अब्दुल्ला अब्दुल्ला: अब तक तालिबान ने सीधे बात करने से इनकार कर दिया है. दुर्भाग्य से ये बताता है कि वे अब तक बातचीत को लेकर आश्वस्त नहीं हैं.

सवाल -5 अगर तालिबान आगे आकर बात करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने की इच्छा ज़ाहिर करता है तो आप उनका स्वागत करेंगे?

अब्दुल्ला अब्दुल्ला: क्यों नहीं. अगर वो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के रास्ते पर चलकर अपनी किस्मत आज़माना चाहेंगे तो उन्हें ऐसा करना चाहिए. इसके बाद उन्हें पता चलेगा कि अफ़ग़ानिस्तान में लोकतंत्र की वजह से हमारे लोगों के बीच चरमपंथी विचारों की ज़्यादा जगह नहीं बची है. इसके साथ ही ऐसे विचार हमारी सभ्यता और हमारे इतिहास की वजह से लोगों के साथ मेल नहीं खाते हैं.

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