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Chip War: क्या भारत दुनिया के लिए सेमीकंडक्टर की फैक्ट्री बन पाएगा? सबसे बड़े युद्ध की कितनी तैयारी?

भारत को पता है, कि आने वाला जमाना सेमिकंडक्टर का है, लिहाजा मोदी सरकार ने पिछले साल चिप इंडस्ट्री के लिए 10 अरब डॉलर के प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की थी, लेकिन, क्या इतना भर करने से काम हो गया है?
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नई दिल्ली,अक्टूबर 02: तेल की खोज के साथ ही अरब देशों की किस्मत हमेशा के लिए बदल गई और देखते ही देखते अरब देशों का वर्चस्व दुनिया पर दिखने लगा, लेकिन युग बदला और नये युग का 'नया तेल' चिप है। चिप के लिए दुनिया के अघोषित युद्ध में शामिल हो चुकी है और अगर चीन आज ताइवान पर हमला कर देता है, तो दुनिया के पास इतनी क्षमता नहीं है, कि वो अपनी जरूरत के मुताबिक चिप का उत्पादन कर सके। वहीं, अगर चीन के हाथ में ताइवान चला जाता है, तो फिर चीन के हाथ में दुनिया का रिमोट कंट्रोल चला जाएगा। यानि, आने वाली दुनिया का लगाम उसी के हाथ में होगा, जिसके पास सेमीकंडक्टर यानि चिप उत्पादन की क्षमता है। लिहाजा, सवाल ये उठ रहे हैं, कि भविष्य बदलने वाली इस लड़ाई में भारत कहां खड़ा है? क्या भारत इस नई लड़ाई की तैयारी कर रहा है और क्या भारत चीन और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों को चिप वार में चुनौती देने की क्षमता रखता है? आईये जानते हैं, आज की तारीख में चिप को लेकर शुरू हुई इस लड़ाई में भारत की क्षमता क्या है?

अभी ताइवान ही है एकमात्र खिलाड़ी

अभी ताइवान ही है एकमात्र खिलाड़ी

मौजूदा वक्त में दुनियाभर में सेमीकंडक्टर की जितनी डिमांड है, उसका 60 प्रतिशत उत्पादन अकेले ताइवान करता है और ताइवान की TSMC कंपनी दुनिया की कुल जरूरत का अकेले 50 प्रतिशत चिप का उत्पादन करती है, जिससे दुनियाभर के इंडस्ट्रीज को काम करने की ऊर्जा मिलती है। लेकिन, ताइवान की TSMC के प्रमुख मार्क लियू ने हाल ही में सीएनएन को दिए गये एक इंटरव्यू में कहा कि, 'चिप युद्ध में कोई विजेता नहीं होने वाला है'। ये बयान उन्होंने उस सवाल पर दिया, जिसमें उनसे पूछा गया था, चीन और अमेरिका के बीच चीप युद्ध शुरू हो चुका है और इसमें किसे बढ़त मिलेगी? लेकिन, पिछले 6 महीने में अमेरिका ने अपनी चिप इंडस्ट्री के विस्तार के लिए जो आक्रामकता दिखाई है, उसने चीन को परेशान कर दिया है। अमेरिका ने चोरी के आरोप में कई चीनी कंपनियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया है, जिसकी वजह से चीन की चिप इंडस्ट्री औंधे मुंह गिर गई है, लिहाजा शी जिनपिंग ने चिप मार्केट की देखरेख करने वाले कई अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है।

चीन को अमेरिका ने कैसे दिया झटका?

चीन को अमेरिका ने कैसे दिया झटका?

अमेरिका ने पिछले महीने चिप्स एंड साइंस (CHIPS) एक्ट को पास किया है और चिप इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए 53 अरब डॉलर को प्रोत्साहन राशि दी है, क्योंकि अमेरिका के लिए ये काफी चिंता की बात थी, कि 1990 में जिस अमेरिका का सेमिकंडक्टर निर्माम 37 प्रतिशत था, वो 2022 में घटकर 12 प्रतिशत हो गया, जबकि सेमिकंडक्टर को लेकर जंग का आगाज भी हो चुका था। इस पैकेज का मुख्य उद्येश्य उन अमेरिकन कंपनियों की मदद करना है, जो चीन की चिप इंडस्ट्री में निवेश करने वाले थे। इस पैकेज के जरिए अमेरिका ने अपने मल्टी नेशनल कंपनियों को चीन में निवेश करने से प्रतिबंधित कर दिया। इंटेल और माइक्रोन जैसी कंपनियों को पहले ही अमेरिका चीन में निवेश करने से प्रतिबंधित कर चुका है,जबकि ताइवान की TSMC कंपनी ने अमेरिका के एरिजोना में 12 अरब डॉलर की लागत से चिप कारखाना खोलने की बात कही है। अमेरिका की देखादेखी अब यूरोप ने भी चिप्स एक्ट को और मजबूत कर रहा है, ताकि चीन को फायदा नहीं मिल सके।

भारत सरकार क्या कर रही है?

भारत सरकार क्या कर रही है?

भारत को पता है, कि आने वाला जमाना सेमिकंडक्टर का है, लिहाजा मोदी सरकार ने पिछले साल चिप इंडस्ट्री के लिए 10 अरब डॉलर के प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की थी, लेकिन अभी तक दुनिया के अग्रणी चिप निर्माताओं ने भारत में निवेश करने को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि, भारत सरकार का प्रोत्साहन पैकेज 'काफी महंगा' और जोखिम भरा हुआ है, लिहाजा चिप इंडस्ट्री के अनुभवी खिलाड़ी अपना हाथ नहीं जलाना चाहते हैं। वहीं, ब्लूमबर्ग के स्तंभकार टिम कपलान ने कहा कि, "अगर भारत के गुजरात राज्य में मतदाता और करदाता इस ऐतिहासिक निवेश को लेकर उत्साहित हैं, तो उन्हें विस्कॉन्सिन के हालिया इतिहास को पढ़ना चाहिए।" टिम कपलान निश्चित तौर पर वेदांत-फॉक्सकॉन कंसोर्टियम की गुजरात में सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले-पैनल क्षेत्रों में 19 अरब डॉलर से ज्यादा के निवेश की योजना का उल्लेख कर रहे थे। 2017 में अमेरका ने कहा था कि, फॉक्सकॉन टेक्नोलॉजी ग्रुप अमेरिका में 10 अरब डॉलर का निवेश करेगा और 13,000 कर्मचारियों को काम पर रखेगा। लेकिन, "विस्कॉन्सिन अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुंच पाया", यानि कंपनी ने कोई निवेश नहीं किया, तो फिर रोजगार की बात ही कहां से उठती है और और टिम कपलान ने आशंका जताई है, कि गुजरात में निवेश भी मुश्किल लगता है।

भारत सरकार की क्या है दलील?

भारत सरकार की क्या है दलील?

हालांकि, भारत सरकार अपने पैकेज के पीछे काफी मजबूती से खड़ी है। भारत सरकार के आईटी मिनिस्टर अश्विनी वैष्णव ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि, "हम 10 साल पहले इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में कुछ भी नहीं थे, लेकिन भारत आज (इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में) 75 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है।' उन्होंने कहा कि, "स्पष्ट रूप से, (हम) 2025 तक 250 अरब डॉलर या करीब 300 अरब डॉलर के बाजार तक पहुंच सकते हैं"। उन्होंने कहा कि, भारत की पहले जो तस्वीर हुआ करती थी, नौकरशाही की वजग से अन्य वजहों से, अब वह सब खत्म हो गया है। इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में अब हम चैंपियन हैं।" उन्होंने कहा कि, सरकार ने अपने संयंत्रों को स्थापित करने के लिए बुनियादी ढांचे, अल्ट्रा-शुद्ध पानी, बिजली के लिए हितधारकों को आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा कि, अगर आप पहले चिप फैक्ट्री स्थापित भी करते, तो फिर उन चिप्स का इस्तेमाल कहां करते, हमारे पास इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग नहीं था, लेकिन आज हमारे पास एक अच्छा पारिस्थितिकी तंत्र है, जो इन सभी चिप्स का उपभोग कर सकता है।"

भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स मार्केट

भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स मार्केट

भारत वर्तमान में लगभग 75 अरब डॉलर मूल्य के इलेक्ट्रॉनिक्स का निर्माण करता है। भारत के सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट से जुड़े एक सरकारी अधिकारी ने ईटी को बताया कि, इसमें से इस्तेमाल होने वाले सेमीकंडक्टर्स की कीमत करीब 20 फीसदी यानि करीब 15 अरब डॉलर है, जो आयात करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि, "हमारा लक्ष्य 2025-26 तक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में 300 अरब डॉलर तक पहुंचने का लक्ष्य है तो, 2030 तक हमारा इलेक्ट्रॉनिक बाजार 600 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यदि आप 600 अरब डॉलर के 20% की गणना करते हैं, तो यह 120 अरब डॉलर होगा। इसलिए, हमारा अनुमान है कि 2030 तक सेमीकंडक्टर्स पर आयात लागत 110 अरब डॉलर होगी।" उन्होंने कहा कि, यहां तक कि अगर एक बड़ी सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन फैक्ट्री जल्द ही चालू हो जाती है, तो भारत को 2030 तक अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ऐसे कम से कम 40 फैक्ट्रियों की जरूरत होगी। अधिकारी ने कहा कि, हमारे लिए उच्च आयात बिल एक चिंता का विषय है, वहीं सरकार भू-राजनीतिक तनावों से भी सावधान है, जिसे वह भारत के लिए एक खतरे के साथ-साथ एक अवसर के रूप में भी मानती है।

भारत के सामने बड़ी चुनौतियां

भारत के सामने बड़ी चुनौतियां

सिंगापुर स्थित IGSS वेंचर्स के संस्थापक राज कुमार, जो देश में सेमीकंडक्टर फैब के लिए आवेदकों में से एक हैं, उन्होंने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि, "अमेरिका से व्यापार युद्ध ने चीन पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए हैं, लिहाजा इसका चीन पर काफी खराब असर पड़ा है, वो भी तब, जब चीन पिछले 365 सालों से सेमिकंडक्टर इंडस्ट्री में अरबों डॉलर का निवेश करता आया है, लेकिन, अगर भारत को भी इसी तरह की चुनौती का सामना करना पड़ता है, तो फिर भारत का विकास ही पटरी पर रूक जाएगा। और चीन के विपरीत, जो पहले से हुई प्रगति से प्रभावित है, भारत गंभीर संकट में फंस सकता है।" मौजूदा वक्त में लगभग 60% चिप्स चीन ही आयात कर लेता है, क्योंकि यह दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्यूफैक्चरिंग सेंटर है, हालांकि यह भविष्य में बदल सकता है। कुमार ने कहा कि, "वैश्विक व्यापार युद्ध के कारण, अब बाकी दुनिया किसी ऐसे उपयुक्त क्षेत्र की तलाश में हैं, जहां सेमिकंडक्टर के साथ साथ इलेक्ट्रॉनिक्स सामानों का उत्पादन किया जा सके। लिहाजा, ये भारत के लिए एक उपयुक्त मौका भी है, वहीं, ताइवान वर्तमान में वैश्विक अर्धचालक चिप्स इंडस्ट्री का 60% से ज्यादा उत्पादन करता है और यदि यह ग्रेटर चीन का हिस्सा बन जाता है तो यह आपूर्ति खतरे में पड़ सकती है।

क्या भारत बन पाएगा नया मार्केट लीडर?

क्या भारत बन पाएगा नया मार्केट लीडर?

सेमिकंडक्टर का निर्माण एक काफी मुश्किलों से भरा इंडस्ट्री है, जहां फैक्ट्री सेटअप के लिए करोड़ों डॉलर एडवांस में खर्च करने पड़ते हैं। आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी हाल ही में कहा था कि, भारत का हार्डवेयर के साथ निर्धारण, संपत्ति के निर्माण के साथ था, इसकी ताकत इसकी कुशल जनशक्ति में है। उन्होंने कहा कि, "कोई भी चिप फैक्ट्री, जो विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी होने जा रही है, उसे 10-20 अरब डॉलर की जरूरत होगी और उसी हिसाब से हमें इंजीनियरों की भी जरूरत होगी, तो फिर ये सोचना होगा, कि भारत के कितने विश्वविद्यालय ऐसे छात्रों को तैयार करने के लिए तैयार होंगे, जहां से शीर्ष श्रेणी के शीर्ष इंजीनियर्स निकलकर सामने आएं। और इस बारे में सोचें कि चिप के निर्माण से पहले कितना सॉफ्टवेयर, कितना चिप डिजाइन कर सकते हैं।" हालांकि, भारतीय मंत्री वैष्णव ने ईटी को दिए अपने इंटरव्यू में इसका विरोध किया था। उन्होंने कहा कि, "आज, यह (चिप) तेल की तरह है। अगर आपके पास डीजल और पेट्रोल नहीं है, तो क्या हम अर्थव्यवस्था चला सकते हैं? अगर हमारे पास बिजली संयंत्र नहीं है, तो क्या हम अर्थव्यवस्था चला सकते हैं? यह एक डिजिटल अर्थव्यवस्था में एक बुनियादी घटक है। यदि आपके पास अर्धचालक नहीं हैं, तो आप कैसे जीवित रहेंगे?"

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English summary
Chip War: Will India be able to become a semiconductor factory for the world? How much preparation for the biggest war?
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