जंगल की आग से चौपट हो रहा है 36 साल का काम, ओजोन परत को लेकर वैज्ञानिकों ने फिर चेताया
1987 में खतरनाक क्लोरोफ्लोरो कार्बन को रोकने के लिए एक वैश्विक समझौता हुआ था। उसका काफी फायदा हुआ। लेकिन अब जंगलों की आग के धुएं से ओजोन परत खत्म होना शुरू हो गया है।

सूरज से कई ऐसे रेडिएशन निकलते हैं जो जीव-जंतुओं और वनस्पतियों के लिए बहुत ही खतरनाक हैं। प्रकृति ने उससे हमारी रक्षा के लिए वायुमंडल में एक ओजोन परत की व्यवस्था कर खी है, जो प्राकृतिक फिल्टर का काम करता है। मानवीय गलतियों की वजह से चार दशक पहले यह प्राकृतिक फिल्टर ही तबाह होना शुरू गया था। लेकिन, 36 साल पहले पूरी दुनिया ने ओजोन परत के संरक्षण का संकल्प लिया और अप्रत्याशित सफलता भी मिलने लगी। यह प्राकृतिक फिल्टर फिर से अपनी पुरानी और मूल रूप में वापस लौटने लगी थी। लेकिन, वैज्ञानिकों ने अब पाया है कि कुछ वर्षों में जंगलों की आग से उठने वाले धुएं की चपेट में आकर ओजोन परत में फिर से सुराख होना शुरू हो गया है। एक तरह से इंसान की 36 साल की तपस्या पर पानी फिर गया है!

ओजोन परत में फिर से सुराख शुरू- शोध
ओजोन परत के संरक्षण के लिए दुनिया ने साल 1987 से ही बहुत संघर्ष किया है। इसका असर भी हुआ और यह पूरी तरह से रिकवर होने की स्थिति में आने लगी थी। लेकिन, साइंस अलर्ट डॉट कॉम की एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल के समय में जंगलों में लगी आग से यह रिकवरी कम होने लगी है और यहां तक कि फिर से ओजोन परत के बिखरने या पतले होने की आशंका पैदा हो गई है। गौरतलब है कि हमारे वायु मंडल के समताप मंडल का यह ऐसा महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो सूर्य से आने वाले खतरनाक विकिरण को हम तक पहुंचने से रोक देता है या यूं कहें कि सूर्य के प्रकाश को फिल्टर करके हम तक पहुंचने देने में मदद करता है।

1987 से हुई कोशिशों से काफी सफलता मिली थी
ओजोन परत पृथ्वी पर मौजूद सभी वनस्पतियों और जीवों के स्वास्थ्य के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। लेकिन, क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) या सिंथेटिक प्रदूषकों की वजह से पहले इसे काफी नुकसान पहुंचा था और अंटार्कटिका के ऊपर इस परत में बड़ी सुराख हो गई थी। 1987 में क्लोरोफ्लोरोकार्बन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध के लिए ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय समझौता हुआ, जिसके चलते धीरे-धीरे ओजोन परत में हुई सुराख भरने लगी थी। सबसे पहले ओजोन परत में इस छेद का पता 1982 में लगा था, लेकिन 2019 में यह सबसे छोटा हो चुका था। क्लोरोफ्लोरोकार्बन के इस्तेमाल को रोक कर ओजोन परत को हो रहे नुकसान की भरपाई को दुनिया अपनी बहुत बड़ी कामयाबी के तौर पर देखने लगी थी। यह बहुत बड़ी मानवीय सेवा थी। लेकिन, वैज्ञानिकों का अब कहना है कि समस्या अभी खत्म नहीं हुई है।

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जंगलों की आग का धुआं मचा रहा है कोहराम
वैज्ञानिकों ने अब पाया है कि अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में फिर से दरार पैदा होने लगी है और यह चौड़ी होती जा रही है। यह स्थिति ऑस्ट्रेलिया में लगी उस विनाशकारी आग के बाद पैदा हुई है, जिसमें 6 करोड़ एकड़ में वनस्पति जलकर राख हो गई थी। संयोग देखिए कि ऑस्ट्रेलिया में आग की हालिया घटनाओं पर हुए एक नए शोध से पता चला है कि उस धुएं में जो कण पाए गए हैं, वे समताप मंडल में मौजूद ओजोन की परत को साल भर तक के लिए नष्ट कर सकते हैं। पुराने होने पर वे कण और भी विनाशकारी साबित हो सकते हैं।

25 लाख वर्ग किलोमीटर में सुराख
अनुमान के अनुसार ऑस्ट्रेलिया में लगी आग की वजह से साल 2019-2020 में 10 लाख टन धुआं वायुमंडल में फैल गया। जब सिर्फ अगस्त 2020 तक का ही डेटा लिया गया था तो वैज्ञानिकों ने पाया कि ओजोन की सुराख तेजी से बढ़ने लगी है। शोधकर्ताओं का अब अनुमान है कि सितंबर आते-आते धुएं के कण की वजह से मोटे तर पर ओजोन परत की सुराख 25 लाख वर्ग किलोमीटर जितनी विशाल हो गई होगी। एक साल पहले के मुकाबले यह 10 फीसदी ज्यादा बड़ा है। ओजोन की कमी पर दशकों से काम कर रही एमआईटी की पर्यावरण विज्ञानी सुसान सोलोमोन ने कहा है, '2020 में ऑस्ट्रेलिया की आग विज्ञान समुदाय के लिए वास्तव में एक वेक-अप कॉल की तरह था।'

सीएफसी का स्थान जंगलों की आग ने ले लिया है!
सिर्फ पिछले दो दशकों में ही दोनों गोलार्धों में मानवीय इतिहास के चार सबसे भयानक जंगलों की आग की घटनाएं हुई हैं। रूस में साइबेरियाई टैगा की आग अब तक की सबसे बड़ी दर्ज की गई है, जो 2003 में लगी थी। जबकि, ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी हालिया आग दूसरे स्थान के करीब है। दोनों ही प्राकृतिक आपदाओं ने आखिरकार ओजोन की परत को पतला किया और अभी तक यह भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि जंगलों की आग से निकलने वाला धुआं किस हद तक इसे नुकसान पहुंचा सकता है। सोलोमोन पहले सीएफसी पर काम कर रही थीं और अब जंगलों की आग से निकलने वाले धुएं पर अध्ययन में जुट गई हैं। यह शोध नेचर में प्रकाशित हुआ है।












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