चीन से गलबहियां करने वाला रूस क्यों नहीं छोड़ रहा भारत का साथ? जानिए पुतिन की विदेश नीति की मजबूरी
India Russia China: रूस ने इंडियन आर्मी को पिछले दिनों IGLA-S मैन पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम (MANPADS) के पहले बैच की आपूर्ति कर दी है, जिसे भारत चीन से लगती सीमाओं पर तैनात करेगा। इस हथियार की आपूर्ति ने उन धारणाओं पर विराम लगा दिया है, जिनमें कहा गया है, कि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की विदेश नीति में चीन हावी है और मॉस्को, अब दिल्ली का हाथ छोड़ सकता है।
इसके अलावा, कई ऐसी रिपोर्ट्स में दावा किया गया है, कि चूंकी अब भारत भी संयुक्त राज्य अमेरिका के खेमे में जा चुका है और दोनों देशों के बीच कई तरह के रणनीतिक संबंध भी बन चुके हैं, लिहाजा अब भारत और रूस एक गुट में नहीं रहे हैं।

चीन के बाद भी रूस के लिए भारत अहम क्यों?
लेकिन, शायद अब ऐसी धारणाओं को सिरे से खारिज करने की जरूरत है, क्योंकि रूस ने ऐसे कई संकेतों में साफ कर दिया है, कि चीन के साथ भले ही उसकी नजदीकी काफी बढ़ चुकी हो, लेकिन वो किसी भी हाल में भारत के हितों को नुकसान पहुंचाने का इरादा नहीं रखता है। अब तक, मॉस्को ने ऐसा कोई व्यवहार नहीं किया है, जिससे लगे कि वह उस चीन की ओर झुक रहा है, जिसमें भारत और चीन दोनों शामिल हों।
सबसे महत्वपूर्ण बात ये है, कि भारत के साथ रक्षा संबंधों को लेकर रूस ने कोई शर्त नहीं रखी है, जैसा की पश्चिमी देश किसी भी रक्षा समझौते से पहले रखते हैं। पश्चिमी देशों से हथियार खरीदते वक्त पहले से ही शर्त रखा जाता है, कि किन देशों के खिलाफ उन हथियारों का इस्तेमाल नहीं हो सकता है।
लेकिन, चीन से बढ़ती नज़दीकियों के बावजूद रूस ने कभी नहीं कहा, कि उसके दिए गए हथियारों का इस्तेमाल चीन के खिलाफ नहीं किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, भारत ने रूस से जो MANPADS मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदा है, वो 120 लॉन्चरों और 400 मिसाइलों का एक बड़ा सौदा है। और ये डिफेंस सिस्टम भारतीय सेना की बहुत कम दूरी की वायु रक्षा (VSHORAD) क्षमताओं को बढ़ाती हैं, खासकर चीन से लगती सीमाओं पर ये हथियार काफी ज्यादा प्रभावी है, क्योंकि इन क्षेत्रों में दुश्मन के टारगेट काफी कम दूरी पर होते हैं।
भारत और रूस ने 14 नवंबर 2023 को इस हथियार के लिए समझौता किया था और सिर्फ 4 महीने में ही रूस ने इन हथियारों की डिलीवरी भारत को दे दी है। इसके अलावा, इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत, आगे इस मिसाइल सिस्टम का निर्माण भारत में ही किया जाएगा।
इसके अलावा, भारत ने रूस से ही S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम भी खरीदा है, जिसे उसने चीन और पाकिस्तान से लगती सीमाओं पर तैनात किया है।
इसमें कोई शक नहीं है, कि भारत और रूस दशकों से डिफेंस पार्टनर रहे हैं और रूस ने ही भारत को 60 प्रतिशत से ज्यादा सैन्य हार्डवेयर की आपूर्ति की है और ये भी सच है, कि भारत अब हथियार खरीदने के लिए अन्य देशों की तरफ भी हाथ बढ़ा रहा है, लेकिन इसके बाद भी रूस, भारत की डिफेंस स्ट्रैटजी का सम्मान करता है।
लेकिन, इसके बाद भी भारत, रूसी लाइसेंस के तहत SU30 MKI लड़ाकू विमान और T90 टैंक का उत्पादन कर रहा है। वहीं, भारत-रूस संयुक्त उद्यम ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलों और AK203 राइफलों का सह-उत्पादन कर रहे हैं। रूसी कंपनियां अब भारत के महत्वाकांक्षी मेक इन इंडिया कार्यक्रम में भाग लेने की इच्छुक हैं, जिसका उद्देश्य स्वदेशी रूप से सैन्य हार्डवेयर के उत्पादन को बढ़ाना है।
संवेदनशील टेक्नोलॉजी भी भारत को दे रहा रूस
इतना ही नहीं, फ्रांस के अलावा रूस ही ऐसा देश है, जो खुलकर भारत को संवेदनशील टेक्नोलॉजी देने के लिए तैयार होता रहा है, जबकि अमेरिका हमेशा से टेक्नोलॉजी देने को लेकर कतराता रहा है।
ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली इस प्रकार के सहयोग का एक ज्वलंत उदाहरण है। रूस अपनी परमाणु पनडुब्बियां भारत को पट्टे पर देता है। इसके अलावा, रूस ने एक प्रमुख अंतरिक्ष शक्ति बनने की दिशा में भारत के साथ निःसंकोच सहयोग किया है।
हालांकि, अब भारत ने फ्रांस, इजराइल और जर्मनी जैसे देशों के साथ रणनीतिक साझेदारियां कर रहा है और INS विक्रमादित्य एयरक्राफ्ट कैरियर में भी हथियारों की लैस करने में भारत और रूस के बीच सहयोग नहीं हो पाया है। लेकिन, इसके बाद भी कई और डिफेंस प्रोजेक्ट पर दोनो देशों के बीच बातचीत चल रही है।
कैसे मजबूत हो रहे हैं भारत और रूस के संबंध?
भारत और रूस ने 2021 में संयुक्त सैन्य अभ्यास, एडवांस डिफेंस के सह-विकास सहित मिलिट्री टू मिलिट्री-तकनीकी सहयोग के मुद्दों की निगरानी के लिए दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों की अध्यक्षता में एक संस्थागत संरचना के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। ये समझौता 2031 तक के लिए किया गया था।
इसके अलावा, यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद भी भारत और रूस करे बीच का कारोबार काफी तेजी से बढ़ा है और संभावना है, कि 2023-24 में दोतरफा द्विपक्षीय व्यापार 50 बिलियन अमेरिकी डॉलर को पार कर जाएगा।
यूक्रेन संघर्ष शुरू होने के बाद भारत ने सबसे ज्यादा कच्चे तेल का आयात रूस से किया है।
जबकि, रूस भारत में छह परमाणु ऊर्जा संयंत्र बना रहा है, जिनमें से दो पहले ही चालू हो चुके हैं, और अन्य दो पूरे होने वाले हैं।
वहीं, रूस मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम गगनयान पर भी भारत के साथ सहयोग कर रहा है। भारत और रूस दोनों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्वांटम कंप्यूटिंग में भी प्रमुख कार्यक्रम शुरू किए हैं। इसके अलावा, भारत ने साइबेरिया और यहां तक कि उत्तरी रूस में रूस के हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में भारी निवेश किया है।
वहीं, भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर हाल के महीनों में लगातार कहा है, कि भारत-रूस संबंधों के इतिहास को कभी भी कम नहीं किया जा सकता है, और मॉस्को आने वाले कई वर्षों तक दिल्ली के भारत के सबसे मूल्यवान सहयोगियों में से एक बना रहेगा।
रूस, विशाल प्राकृतिक संसाधनों, तकनीकी क्षमताओं और व्यापार संभावनाओं से संपन्न देश है। यह अभी भी संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य शक्ति है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, कि रूस, शायद, भारत को अपनी विदेश नीति और रणनीतिक गणना में संयुक्त राज्य अमेरिका या दुनिया के अन्य शक्ति केंद्रों की तुलना में ज्यादा प्राथमिकता देता है।
यह रूस ही है, जिसने बेझिझक भारत में परमाणु ऊर्जा स्टेशन स्थापित किए हैं, जो कि नागरिक परमाणु समझौते के समापन के बाद भी संयुक्त राज्य अमेरिका के बारे में नहीं कहा जा सकता है। और यह रूस ही है, जिसने भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के लिए सबसे मुखर समर्थन प्रदान किया है।

चीन को कंट्रोल करने के लिए रूस को भारत की जरूरत!
पिछले साल मार्च में प्रकाशित अपने "विदेश नीति सिद्धांत" में, रूस ने यह साफ कर दिया था, कि वह भारत के साथ "विशेष रूप से विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी बनाना जारी रखेगा"।
इसके अलावा, रूसी सिद्धांत ने चीन के साथ-साथ भारत की भी समान जोर से बात की। जबकि रूस ने बताया है, कि "रूस का लक्ष्य पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के साथ व्यापक साझेदारी और रणनीतिक सहयोग को और मजबूत करना है," जिसमें इस बात पर भी प्रकाश डाला है, कि कैसे "रूस भारत गणराज्य के साथ एक विशेष विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी का निर्माण जारी रखेगा।"
कई रूसी विश्लेषकों को डर है, कि साइबेरिया और इसके सुदूर पूर्व में जल्द ही प्रवासी चीनी मजदूरों का कब्जा हो जाएगा। यह डर वास्तविक है, क्योंकि चीनी इतिहास से परिचित कोई भी व्यक्ति यह स्वीकार करेगा, कि पूरे एशिया में चीनी क्षेत्रीय दावे अक्सर उसके प्रवासियों के आने के साथ शुरू होते हैं।
इसके अलावा, चीन-रूस संबंधों का इतिहास भी कोई अच्छा नहीं रहा है और अतीत को देखते हुए, रूस भविष्य में भी आंख मूंदकर चीन पर यकीन नहीं कर सकता है।
रूस ने इससे पहले तीन बार चीन के साथ गठबंधन किया है और तीनों बार रूस को मुंह की खानी पड़ी थी।
रूस ने किंग राजवंश (1894), चीन गणराज्य (1945) और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (1950) के दौरान चीन के साथ संबंध बनाए, लेकिन तीनों पर बार रूस को धोखा मिला। फरवरी 1950 में मित्रता, गठबंधन और पारस्परिक सहायता होने के बाद भी, चीन-सोवियत संधि-रूस को 1969 में चीन के साथ युद्ध लड़ने से नहीं रोक सकी।
यह सच है कि यूक्रेन में युद्ध ने रूस को चीन के करीब ला दिया है, जिसका मुख्य कारण पश्चिमी प्रतिबंध हैं। लेकिन, इसके बाद भी रूस चीन को लेकर सतर्क है और वो हरगिज नहीं चाहेगा, कि वो चीन का छोटा भाई बनकर रहे। लिहाजा, भारत उसके लिए महत्वपूर्ण भागीदार है, जो चीन को कंट्रोल पर रख सकता है।
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