India-China: पीएम मोदी ने तीसरी बार राष्ट्रपति बनने वाले शी जिनपिंग को अभी तक बधाई क्यों नहीं दी है?
भारत सरकार ने बीजिंग के साथ संबंधों को सुधारने के लिए और तनाव में नरमी लाने के लिए साल 2018 में एक एडवाइजरी जारी की थी, जिसमें दलाई लामा के कार्यक्रम में शामिल नहीं होने के लिए कहा गया था।
Narendra Modi Xi jinping: शी जिनपिंग को चीन का लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति बने हुए अब चार दिनों का वक्त बीत चुका है, लेकिन दुनिया के बड़े नेताओं की तरफ से अभी तक शी जिनपिंग को बधाई संदेश नहीं भेजा गया है। अभी तक प्रमुख देशों में सिर्फ रूस, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया ने ही चीनी राष्ट्रपति को बधाई दी है, लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी शी जिनपिंग को अभी तक बधाई संदेश नहीं भेजा है, जिसके बाद सवाल उठ रहे हैं, कि आखिर भारतीय प्रधानमंत्री ने शी जिनपिंग को शुभकामनाएं क्यों नहीं दी है और इसके पीछे भारत की रणनीति क्या है?

पीएम मोदी ने नहीं दी बधाई
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को तीसरे कार्यकाल के लिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता के रूप में फिर से चुने जाने पर बधाई नहीं दी है। अप्रैल-मई 2020 से पूर्वी लद्दाख में भारतीय सेना और चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिकों के बीच हुई झड़प के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने चीनी राष्ट्रपति से पूरी तरह से दूरी बना रखी है और पिछले दिनों उज्बेकिस्तान में खत्म हुए एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान भी पीएम मोदी ने शी जिनपिंग के साथ ना ही कोई औपचारिक द्विपक्षीय बैठक की और ना ही दोनों नेताओं का एक साथ कोई फोटो ही आया। यानि, पिछले ढाई सालों में दोनों नेताओं के बीच की 'दोस्ती' अब खत्म हो गई है। शी जिनपिंग को रविवार को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं केंद्रीय समिति के महासचिव के रूप में फिर से निर्वाचित किया गया है, लेकिन पीएम मोदी ने गुरुवार तक सार्वजनिक रूप से उन्हें बधाई नहीं दी है।

2017 में दी थी बधाई
पीएम मोदी ने इससे पहले जब 2017 में शी जिनपिंग लगातार दूसरी बार चीन के राष्ट्रपति चुने गये थे, उस वक्त उन्होंने बधाई दी थी। पीएम मोदी ने उस वक्त शी जिनपिंग को बधाई देते हुए कहा था, कि, "राष्ट्रपति शी को सीपीसी महासचिव के रूप में फिर से चुने जाने पर बधाई। हम एक साथ मिलकर भारत-चीन संबंधों को एक साथ आगे बढ़ाने के लिए तत्पर हैं।" पीएम मोदी ने 26 अक्टूबर 2017 को ट्विटर और चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीबो पर अंग्रेजी और चीन की प्रमुख मंदारिन भाषा में पोस्ट कर उन्हें बधाई दी थी। पीएम मोदी ने उस वक्त जो बधाई संदेश भेजा था, उस वक्त भी भारत और चीन के बीच के संबंध काफी नीचले स्तर तक पहुंच चुके थे और पीएम मोदी के बधाई संदेश को लेकर कहा गया, कि नई दिल्ली ने बीजिंग के साथ अपने संबंधों को सुधारने की दिशा में एक पहल की है। उस वक्त भी भारतीय सेना और चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के बीच 72 दिनों तक जून 2017 से अगस्त 2017 के बीच भूटान के डोकलाम पठान पर गतिरोध चला था और बाद में दोनों देशों की सेना को पीछे हटना पड़ा था। वहीं, पीएम मोदी और शी जिनपिंग ने सितंबर 2017 में चीन के जियामेन में 9वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से इतर द्विपक्षीय बैठक की। यानि, रिश्ते सुधारने की दिशा में भारत की तरफ से कई कदम उठाए गये, लेकिन एलएसी पर चीनी आक्रामकता ने भारत को ये संदेश दे दिया है, कि चीन के साथ दोस्ती करके सीमा विवाद का हल नहीं किया जा सकता है।

भारत सरकार की कोशिशें
भारत सरकार ने बीजिंग के साथ संबंधों को सुधारने के लिए और तनाव में नरमी लाने के लिए साल 2018 में एक एडवाइजरी जारी की थी, जिसमें मोदी सरकार ने राज्य सरकारों के साथ साथ केन्द्र सरकार के वरिष्ठ नेताओं और सरकारी पदाधिकारियों को निर्देश दिया, कि वो तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के कार्यक्रमों से दूर रहे हैं। मोदी सरकार की ये गाइडलाइंस तिब्बत को लेकर चीन की संवेदनशीलता को आहत करने से बचने के लिए उठाया गया ये कदम था। इसके साथ ही पीएम मोदी ने 19 मार्च 2018 को फिर से चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीबो पर एक संदेश पोस्ट किया था, जिसमें शी जिनपिंग को नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ऑफ चाइना द्वारा दूसरे कार्यकाल के लिए देश के राष्ट्रपति के रूप में चुने जाने के बाद बधाई दी गई। उसमें उन्होंने कहा था कि, "मैं भारत-चीन संबंधों के विकास को बढ़ावा देने के लिए आपके साथ काम करने के लिए उत्सुक हूं।" इसके बाद दोनों नेताओं ने अप्रैल 2018 के मध्य में चीन के वुहान शहर में अनौपचारिक शिखर वार्ता की थी। वहीं, इस बैठक के बाद तीसरे देशों में बहुपक्षीय और बहुपक्षीय कार्यक्रमों के दौरान द्विपक्षीय बैठकों की एक श्रृंखला भी आयोजित की गई थी। उन्होंने अक्टूबर 2019 में चेन्नई के पास मामल्लापुरम में दूसरा अनौपचारिक शिखर सम्मेलन भी आयोजित किया।

मोदी सरकार की हर कोशिश नाकाम
मोदी सरकार बातचीत के जरिए चीन के साथ शांति संबंध स्थापित करना चाह रही थी, जबकि आलोचकों का कहना था, कि पीएम मोदी चीन को लेकर वही गलती कर रहे हैं, जैसी गलती पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने की थी, जिसका खामियाजा 1962 की लड़ाई के साथ भारत को भुगतना पड़ा था। वहीं, इस बार भी मोदी सरकार को उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब पूर्वी लद्दाख में अप्रैल-मई 2020 में गतिरोध शुरू होने के बाद नई दिल्ली और बीजिंग के बीच संबंधों में गिरावट आ गई। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने पूर्वी लद्दाख में दोनों देशों के बीच विवादित सीमा के साथ बड़ी संख्या में सैनिकों को इकट्ठा किया और सीमा रेखा के पास यथास्थिति को बदलने की कोशिश की। चीनी सैनिकों ने भारतीय जमीन पर कब्जा करने की कोशिश की, जिसके बाद भारतीय सैनिकों ने भी आक्रामकता दिखाई, जिससे गतिरोध पैदा हुआ। ये गतिरोध 15 जून 2020 को चरम पर पहुंच गया था, जब गालवान घाटी में दोनों पक्षों के सैनिक आपस में भिड़ गए थे। भारतीय सेना ने अपने 20 जवानों को खो दिया था, वहीं चीन को हुए नुकसान की अभी तक स्पष्ट रिपोर्ट नहीं है। इस गतिरोध के बाद भारत ने सौ से ज्यादा चीनी एप्स को प्रतिबंधित कर दिया और पीएम मोदी ने भी चीनी सोशल मीडिया वीबो पर अपना अकाउंट बंद कर दिया।

उज्बेकिस्तान में भी किया किनारा
इसके साथ ही पीएम मोदी और शी जिनपिंग जब एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान उज्बेकिस्तान के समरकंद पहुंचे, उस दौरान भी दोनों नेता चंद फीट के फासले पर एक दूसरे के साथ खड़े थे, लेकिन पीएम मोदी ने शी जिनपिंग से बातचीत की कोई पहल नहीं की। दोनों नेताओं ने हाथ मिलाना तो दूर, ऐसा वर्ताव किया, जैसे उन्होंने एक दूसरे को देखा भी नहीं हो। यानि, पीएम मोदी ने चीन को लेकर अपनी नीति में परिवर्तन कर लिया है और शायद अब भारत अब ये जान गया है, कि बातचीत के जरिए चीन के साथ शांति संभव नहीं है, लिहाजा ऐसा हो सकता है, कि मोदी सरकार चीन को लेकर किसी और रणनीति पर काम कर रही हो। वहीं, भारत के नीति निर्धारकों को अब इस बात का भी अहसास हो चुका है, की शी जिनपिंग चीन की अंदरूनी राजनीति में अत्यंत ताकतवर हो चुके हैं और लंबे अर्से तक उनका सत्ता में बना रहना संभव है, लिहाजा अब चीन को लेकर दूसरे तरह की नीति बनाकर ही चलना शायद भारत के लिए फायदेमंद होगा।












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