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दुनिया भर के शेयर बाज़ारों में इतना उछाल क्यों आ रहा है?

स्टॉक एक्सचेंज
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दुनिया भर में करोड़ों लोगों की नौकरियां चली गईं है या उन्हें घर पर रहने की वजह से सरकार को बेरोजगारी भत्ता देना पड़ा है.

लेकिन, पिछले साल 2020 में मार्च में आई गिरावट के बाद से शेयर बाज़ार में उछाल आया है. टेक्नॉलॉजी कंपनी नैसडैक के शेयरों में पिछले साल के आख़िर तक 42 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई थी. ये अमेरिका में सबसे बड़ा उछाल आया था.

साल भर में एसएंडपी500 के शेयर 15 प्रतिशत ऊपर गए. लेकिन, ब्रिटेन का स्टॉक एक्सचेंज इंडेक्स एफटीएसई100 कोरोना महामारी के कारण संघर्ष कर रहीं तेल कंपनियों, बैंक, एयरलाइंस की वजह से इतनी अच्छी स्थिति में नहीं रहा.

पिछले साल की शुरुआत से इसमें 14 प्रतिशत की गिरावट आई लेकिन पिछले कुछ महीनों में इसमें तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है और यूरोपीय संघ के साथ ट्रेड डील होने और वैक्सीन को अनुमति मिलने के बाद इसमें बड़ी तेज़ी देखी गई.

जापान में वैक्सीन बनने के बाद एक बार फिर शेयर बाज़ार ने उछाल देखने को मिला. फार्मास्यूटिकल स्टॉक्स और गेमिंग कंपनियों के शेयर इनमें आगे रहे. हालाँकि शेयर बाज़ार के प्रदर्शन का आकलन इस पूरी प्रक्रिया को नहीं दर्शाता है.

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सस्ता पैसा

मनी मैनेजर स्क्रॉडर्स में यूके इक्विटीज़ की प्रमुख स्यू नॉफका कहती हैं, "एक महत्वपूर्ण बात ये है कि शेयर बाज़ार की कीमतें अभी और इसी वक़्त का मामला नहीं हैं बल्कि शेयर बाज़ार एक कार चलाने जैसा है जिसमें नज़रें दूर के लक्ष्य को देखती हैं ना कि ठीक सामने दिख रहे गड्ढे को."

निवेशक भरोसा कर रहे हैं कि स्वीकृत हो चुकीं या विकसित हो रहीं नई वैक्सीन की सफलता से वृद्धि होगी और बिक्री सामान्य हो पाएगी. निवेशक सस्ते ऋण का इस्तेमाल कर रहे हैं जो कारोबार के लिए एक वरदान है.

केंद्रीय बैंक भी इस सस्ते ऋण के कारोबार में लगे हुए हैं और इसका असर भी दिख रहा है. बैंक ऑफ़ इंग्लैंड ने अकेले सरकार और कॉरपोरेट के 895 बिलियन पाउंड का बॉन्ड खरीदने की योजना बनाई है. पिछले साल मार्च से अब तक अमेरिकी फेड ने तीन खरब डॉलर की संपत्ति खरीदी है.

इन खरीदारियों का मकसद ऋण को और सस्ता करना है. जब ये पैसा बॉन्ड की खरीदारी के रूप में अर्थव्यवस्था में आता है तो यह कहीं और क़ीमतों में इजाफे की वजह बनता है.

नॉफका कहती हैं, "इससे पैसे के मूल्य में गिरावट आई है और ये सस्ता पैसा वित्तीय संपत्ति के मूल्य को बढ़ा देता है. हम दुनिया भर में स्टॉक मार्केट में यही होते हुए देख रहे हैं."

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पांच बड़ी कंपनियां

जब हम बाज़ार के प्रदर्शन को देखते हैं तो आमतौर पर हम कंपनियों के समूहों वाले इंडेक्स को देखते हैं. छोटी कंपनियों के प्रदर्शन की बजाए बड़ी कंपनियों की वृद्धि का इंडेक्स वैल्यू पर बड़ा प्रभाव होता है.

लेकिन, खासतौर पर अमेरिका में बड़ी कंपनियां बहुत बड़ी हो गई हैं. ये साल टेक कंपनियों के लिए अच्छा रहा है. लोगों के दूर-दराज में काम करने के कारण उनकी आय में बढ़ोतरी हुई है.

उदाहरण के लए नैसडैक ने साल की शुरुआत से बहुत बढ़ोतरी देखी है. लेकिन, सिर्फ़ पांच कंपनियों- गूगल के स्वामित्व वाली एल्फाबेट, माइक्रोसाफ्ट, अमेज़न और फेसबुक की कीमत अन्य 95 कंपनियों के पूरे जोड़ के लगभग बराबर है.

स्यू नॉफका कहती हैं, "ऐसे में शेयर बाज़ार इंडेक्स को देखकर लगेगा कि कोरोना वायरस महामारी का अमेरिका अर्थव्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. लेकिन, ऐसा नहीं है. इसलिए ज़रूरी नहीं कि इंडेक्स देखकर आप सभी कंपनियों की स्थिति का सही अंदाज़ा लगा सकते हैं."

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दस साल का ट्रेंड

एक इंडेक्स में कुछ बड़ी कंपनियों का वर्चस्व तथाकथित निष्क्रिय निवेश के उदय से जुड़ा होता है जिसमें पेंशनर्स, मनी मैनेजर्स और सट्टेबाज इंडेक्स को प्रभावित करने वाला सस्त निवेश खरीद सकते हैं.

इसलिए जब निवेशक इन फंड्स को खरीदते हैं तो वो बुनियादी शेयरों को खरीदते हैं और कीमतों में बढ़ोतरी में मदद करते हैं.

यूनिवर्सिटी ऑफ वॉरविक में वित्तीय बाज़ार में एक शोधकर्ता योहानस पेट्रे कहते हैं, "पिछले 10 सालों से आप एक ट्रेंड देख रहे हैं कि पैसों का प्रवाह सक्रिय फंड्स से निष्क्रिय फंड्स की ओर हो रहा है."

कई कंपनियां अपने आकार के कारण इंडेक्स से जुड़ती हैं और अलग होती है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता है. बड़ी कंपनियां शेयर बाज़ार इंडेक्स का हिस्सा नहीं भी हो सकती हैं.

उदाहरण के लिए योहानस पेट्रे कहते हैं कि अनुमान है कि इस महीने एसएंडपी500 इंडेक्स में प्रवेश करने वाली इलेक्ट्रिक कार निर्माता कंपनी टेस्ला ने फंड से शेयरों की खरीद में समस्या होने के कारण शेयरों के लिए अतिरिक्त 100 बिलियन डॉलर की मांग की है.

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घबराहट

ब्रोकरेज फर्म थीमिस ट्रेडिंग में एक साझेदार जो सॉलोज़ी कहते हैं कि ऐसा कहा जा रहा है कि गिरावट के लिए स्थितियां तैयार हैं. कई निवेशक सोचते हैं कि बाज़ार हमेशा ऊपर नहीं चढ़ सकता लेकिन ये कहना मुश्किल है कि उसमें गिरावट कब आएगी.

जो सॉलोज़ी कहते हैं कि वो सीएनएन पर दिया गया एक इंडिकेटर देखते हैं जिसका नाम फीयर एंड ग्रीड इंडेक्स है. एक समय पर वह बेहद ऊंचाई पर था लेकिन अब वो गिर गया है. वह कहते हैं, "जब मैं ये देखता हूं तो लगता है कि लोगों में घबराहट नहीं है."

उन्होंने एक और प्वाइंटर पर नज़र रखी और वो है कि बाज़ार के बढ़ने के मुक़ाबले बाज़ार के गिरने पर लगने वाली शर्तों का अनुपात. साल 2012 के बाद से हाल में बाज़ार के बढ़ने पर लगने वालीं शर्तें उसके गिरने की शर्तों से ज़्यादा थीं.

वो कहते हैं, "एक बड़ी गलती जो लोग कर रहे हैं, वो वही है जिसका विश्लेषण अभी हमने किया है. हम इसके बाद इस निष्कर्ष पर निकलते हैं कि अभी क़ीमत ज्यादा है तो यह वक्त सही है कि हम अपने शेयर निकाल दे. ऐसा करते हुए हम सोचते हैं कि हम बाज़ार से ज्यादा होशियार है लेकिन ऐसा नहीं है. आप होशियार नहीं और ना ही कोई और है."

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नॉफका कहती हैं कि कुछ वजहें होती हैं जिसके चलते बाज़ार खुद अपने आप को चलाता है. बहुत सारे लोग जिनकी नौकरी नहीं गई है, वे अभी कम खर्च कर रहे हैं लेकिन वो बाद में खरीदारी करना चाहेंगे. सरकार पिछले संकट को देखते हुए शायद ही मितव्ययिता का रास्ता अपनाए.

जो सॉलोज़ी कहते हैं कि जब बाज़ार नीचे जाएगा तब यह देखना दिलचस्प होगा कि निवेशक क्या रुख अपनाते हैं खासकर वे नए निवेशक जो नया-नया बाज़ार के उतार-चढ़ाव का अनुभव ले रहे हैं और जल्द से जल्द अपना पैसा फायदे के साथ निकालना चाहते हैं.

ऐसे लोगों की तदाद भले ही कम हो लेकिन वो इस बाज़ार का एक सक्रिय हिस्सा हैं.

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