चीन में चमक-दमक के बीच नौजवानों में क्यों घर कर रही है भारी निराशा

चीन में नौजवान पीढ़ी जिस तरह से निराशा और हताशा का सामना कर रही है, उसे देखते हुए अब लाखों लोग प्रतिस्पर्धा की दौड़ से निकलना चाहते हैं.

चीन, नौजवान पीढ़ी
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चीन, नौजवान पीढ़ी

चीन में बात चाहे अच्छे स्कूल में दाखिला लेने की हो या फिर इज्ज़तदार नौकरी की, इंसान पैदा लेते ही एक तरह की रेस में उलझ कर रह जाता है. लेकिन नौजवान पीढ़ी जिस तरह की निराशा और हताशा का सामना कर रही है, उसे देखते हुए अब लाखों लोग इस सिलसिले को तोड़ना चाहते हैं. जब सन के ने साल 2017 में कॉलेज से ग्रैजुएशन की पढ़ाई पूरी की थी तो वे अपने सपने को पूरा करने शंघाई चले आए थे. अच्छा करियर, गाड़ी और यहां तक कि एक घर भी, उनकी पीढ़ी में ये सपना तमाम नौजवानों का होता है. 27 वर्षीय इस युवक ने तब ये उम्मीद नहीं की थी कि उसके सपनों की राह में कई दुश्वारियां हैं. सन के के माता-पिता को सब कुछ शून्य से शुरू करना पड़ा था और वे ये कर पाए थे. शंघाई के पास एक छोटे से शहर में उनके माता-पिता के पास कई प्रॉपर्टीज़ हैं.

साल 2018 में सन के ने अपना रेस्तरां कारोबार शुरू किया. लेकिन जल्द ही उन्हें ये अहसास हुआ कि इस धंधे पर बड़े ब्रैंड्स और डिलिवरी प्लेटफॉर्म्स का दबदबा है और इस कारोबार में उनके आने में देर हो गई है. सन के बताते हैं, "डिलिवरी ऐप्स पर दूसरे आउटलेट्स के साथ प्रतिस्पर्धा करने के क्रम में मेरे बिज़नेस पार्टनर और मुझे अपनी जेब से डिलिवरी फी भरनी पड़ती थी ताकि ग्राहकों को डिस्काउंट दिया जा सके. और इन सब के बीच बड़े ब्रैंड्स ही पैसा बना पा रहे थे."

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चीन की 'हताश और निराश' पीढ़ी

दो साल बिज़नेस करने के बाद सन के को इस कारोबार में 10 लाख यूआन (भारतीय मुद्रा में 1,12,81,759 रुपए) का घाटा हो चुका था. आख़िरकार पिछले साल उन्होंने ये धंधा समेट लिया. सन के का कहना है कि वे 'हताश और निराश' हो गए हैं जैसा कि चीन में उनकी पीढ़ी के दूसरे नौजवानों के साथ हो रहा है. चीनी भाषा में इसके लिए एक शब्द 'नेइजुआन' ख़ास तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. 'नेइजुआन' शब्द का मतलब उस सामाजिक अवधारणा से भी है, जहाँ जनसंख्या वृद्धि से न तो उत्पादकता बढ़ रही हो और न ही नए तौर तरीक़े या नई तकनीक विकसित हो पा रही हो. चीन में आज कल ये शब्द पूरी तरह से 'हताश और निराश' हो चुके नौजवानों के लिए भी किया जाता है.

चीन में ये चलन देश के सबसे अभिजात्य माने जाने वाले यूनिवर्सिटी कैंपसों में पिछले साल उस वक़्त शुरू हुआ जब मेहनत करने के मामले में हद से गुजर जाने वाले छात्रों की तस्वीरें इंटरनेट पर वायरल हो गईं. पिछले साल वायरल हुईं ऐसी ही तस्वीरों में एक टीशिंगहुआ यूनिवर्सिटी के एक छात्र की फोटो थी जिसमें वो साइकिल चलाते वक्त लैपटॉप पर भी काम करते हुए दिख रहा था. इस छात्र को 'टीशिंगहुआ का नेइजुआन किंग' करार दिया गया था.

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'सुनहरे दिन' गुज़र गए

चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीबो पर ये बड़ा ट्रेंड रहा और इससे जुड़े हैशटैग को एक अरब से ज़्यादा बार देखा गया. ये शब्द पिछले साल चीन के दस सबसे प्रचलित शब्दों में भी शुमार हुआ. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर बियाओ शियांग कहते हैं, "चीन के नौजवान लोगों को आज भी ये लगता है कि अगर वे कड़ी मेहनत नहीं करेंगे या प्रतिस्पर्धाओं में हिस्सा नहीं लेंगे तो समाज उन्हें बहिष्कृत कर देगा. लेकिन बार-बार की कोशिशों के बावजूद भी उन्हें कोई कामयाबी मिलती नहीं दिख रही है."

सन के कहते हैं, "हमारे माता-पिता की पीढ़ी को भी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था लेकिन उनके पास अपने अवसर भी थे. सब कुछ नया था. जब तक कि आपके पास नए विचार और उस पर आगे बढ़ने की हिम्मत थी, कामयाबी की भी बहुत संभावना थी."

ऐसा नहीं है कि ये अवधारणा केवल चीन में ही लागू है. ज़्यादातर विकसित देशों में एक पीढ़ी इन्हीं हालात से गुजर कर कामयाबी का जायका चख चुकी है. लेकिन चीन के साथ समस्या ये है कि उसके वे 'सुनहरे दिन' इतनी तेज़ी से गुजर गए कि लोगों के मन में इसकी यादें ताज़ा हैं. इसका मतलब ये हुआ कि सन के जैसे नौजवानों की पीढ़ी अपने माता-पिता की कामयाबी की गवाह रही है. उन्होंने देखा है कि कैसे उनके माता सब कुछ शून्य से शुरू करके कामयाब हुए.

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अमीर लोगों के ख़िलाफ़ निराशा

बर्कले स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया में लेक्चरर डॉक्टर फांग शू कहते हैं, "उनके माता-पिता या पड़ोसी जो हो सकता है कि उम्र में उनसे दस साल ही बड़े हों, इसी कारोबार में कहीं ज़्यादा मुनाफा कमा चुके हों. लेकिन अब वो दरवाज़ा बंद हो चुका है. नई पीढ़ी के सामने अब पहले जैसी संभावनाएं नहीं हैं." अरबपतियों की संख्या के लिहाज से चीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मुल्क है. लेकिन इसके साथ देश में 60 करोड़ लोग ऐसे भी हैं जिनकी मासिक आमदनी सिर्फ 1000 युआन (भारतीय मुद्रा में 11,418 रुपये) है. चीन में गरीबी और अमीरी के बीच जो खाई है, उसकी वजह से नौजवान लोगों में अपने नियोक्ताओं के ख़िलाफ़ असंतोष की भावना बढ़ रही है. नौजवान पीढ़ी को ऐसा लगता है कि उनके संघर्ष को टॉप पर बैठे लोग समझ नहीं पाते हैं.

'हार्पर्स बाज़ार चाइना' की पूर्व संपादक और कारोबारी सु मैंग ने जब ये कहा कि 'नेइजुआन' किसी व्यक्ति के आलसीपन और उसकी तमन्नाओं के बीच का फासला है तो उन्हें कड़े विरोध का सामना करना पड़ा. बाद में उन्होंने माफ़ी मांग ली लेकिन जो नुक़सान होना था, वो हो चुका है. चीन की कारोबारी दुनिया में हफ्ते में छह दिन सुबह नौ बजे से रात बजे तक काम चलता रहता है. इस चलन पर कॉमेंट करते हुए एक यूज़र ने कहा, "अगर बॉस उन लोगों को समझ नहीं सकते जो उनके लिए काम करते हैं तो 996 का वजूद न होता और हताशा और निराशा का माहौल भी नहीं होता." एक अन्य यूजर ने लिखा, "पूंजीपतियों को अपनी जुबान बंद रखनी चाहिए."

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ख़ाली बैठे रहना- एक विकल्प जिसकी इजाज़त नहीं

अरबपति जैक मा ने अतीत में इस '996 संस्कृति' की तारीफ़ करते हुए इसे एक 'वरदान' बताया था. इंटरनेट पर कुछ लोगों ने 'रक्त पिपासु पूंजीवाद' के नायक की हैसियत से उनके पतन के लिए उनकी कंपनी अलीबाबा के ख़िलाफ़ चल रही जांच और उनके इस बयान को ज़िम्मेदार ठहराया. लेकिन इसके साथ ही चीन में एक और चलन देखने में आ रहा है. चुपचाप खाली बैठे रहना जिसे चीनी भाषा मंदारिन में 'टैंग पिंग' कहा जाता है. इस पर बहस की शुरुआत उस वक्त हुई जब इंटरनेट पर एक यूजर ने कहा कि वे पिछले दो साल से कोई काम नहीं कर रहे हैं और वे इसे कोई समस्या नहीं मानते हैं. चीन में कामयाबी को लेकर जो अवधारणा है, इस यूजर के विचार इसके ठीक उलट थे.

इस यूज़र की दलील थी कि समाज के आदर्शों पर चलने की कोई ज़रूरत नहीं है. उन्होंने लिखा, "केवल चुपचाप बैठे रहने से कोई हर चीज़ का मापदंड बन सकता है." और इसी के साथ 'चुपचाप बैठे रहने का सिद्धांत' अस्तित्व में आया. 'टैंग पिंग' के विचार में ज़्यादा काम न करना, ऐसे लक्ष्यों का पीछा करना जिसे हासिल किया जा सके, जैसी बातें शामिल हैं. चीन के कुछ इंटरनेट यूजर इसे एक आध्यात्मिक आंदोलन भी बताते हैं. प्रोफेसर शियांग का कहना है कि ऐसे संकेत ये बताते हैं कि चीन की नौजवान पीढ़ी निरर्थक प्रतिस्पर्धा छोड़ना चाहती है. इससे कामयाबी के पुराने मॉडल पर पुनर्विचार की भी जरूरत महसूस होती है.

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शी जिनपिंग ने क्या कहा था

चीन में नौजवान पीढ़ी के कई लोगों ने इस रेस वाले सिस्टम को छोड़ने की बात कही है लेकिन विशेषज्ञों को आशंका है कि शायद ही बड़ी संख्या में लोग इसे अपनाएं. सरकार की रजामंदी भी इसे नहीं मिलने वाली है क्योंकि ये समाजवादी मूल्यों के ख़िलाफ़ है. साल 2018 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक भाषण में कहा था कि 'नया ज़माना उन लोगों का है, जो कड़ी मेहनत करेंगे' और 'महान प्रयासों से ही ख़ुशियां हासिल' की जा सकेंगी. ऐसा लगता है कि चीन के सरकारी मीडिया को भी 'चुपचाप बैठे रहने का सिद्धांत' पसंद नहीं आया है. सांस्कृतिक मामलों के अख़बार 'गुआंग मिंग' में छपे एक लेख में इस सिद्धांत को देश की अर्थव्यवस्था और समाज के लिए नुक़सानदेह बताया गया है.

'नानफांग डेली' में एक लेखक ने इस चलन को 'ग़ैरवाजिब और शर्मनाक' बताया है. हालांकि डॉक्टर फांग शू का कहना है कि उन्हें नहीं लगता है कि ये चलन इतनी जल्दी ख़त्म हो जाएगा. "दुख की बात है कि अगले पाँच से दस साल तक यही स्थिति रहने वाली है क्योंकि न तो उद्योग जगत में कोई बड़ी तकनीकी क्रांति होने वाली है और न इन नौजवान लोगों के लिए कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ नई संभावना तलाशी जा सके. इसलिए चुपचाप ख़ाली बैठने का चलन बढ़ जाएगा." डॉक्टर फांग शू कहती हैं कि पश्चिमी देशों में नौजवान लोग इस तरह का जीवन चुन सकते हैं लेकिन चीन में ये विकल्प नहीं है.

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