Explainer: नेहरू की ऐतिहासिक गलती, अमेरिका का डबल गेम... भारत को क्यों नहीं मिलता UNSC में स्थाई सीट?
India UNSC Elon Musk: दुनिया के सबसे अमीर कारोबारी एलन मस्क ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को अभी तक स्थायी सदस्य ना मिलने को हास्यास्पद बताया है। एलन मस्क ने कहा है, कि दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले देश का यूएनएससी में ना होना बेतुका है और यूएनएससी में सुधार की जरूरत है।
एलन मस्क ने ये बातें, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के उस ट्वीट पर जवाब देते हुए कहा, जिसमें उन्होंने यूएनएससी में एक भी अफ्रीकी देश के नहीं होने को लेकर चिंता जताई थी। एलन मस्क ने कहा, कि भारत को यूएनएससी का स्थायी सदस्य होना चाहिए।

एलन मस्क ने भारत का समर्थन किया है, लिहाजा एक बार फिर दुनिया में भारत को अभी तक शामिल नहीं करने को लेकर बहस शुरू हो गई है। लिहाजा, आइये जानते हैं, कि संयुक्त राष्ट्र कामयाब हो, इसके लिए भारत ने कितना योगदान दिया है और किस तरह से अमेरिका के डबल गेम और चीन के डर की वजह से अभी तक भारत को यूएनएससी की स्थायी सदस्यता देने से दूर रखा गया है।
अमेरिका का डबल गेम
लगभग 13 साल पहले, भारत की अपनी पहली राजकीय यात्रा पर, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारतीय संसद के सामने घोषणा की थी, कि वह उस दिन का इंतजार कर रहे हैं, जब भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनेगा। यह पहली बार था, कि किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने लंबे समय से चली आ रही भारतीय मांग के लिए सार्वजनिक रूप से कोई समर्थन व्यक्त किया था।
अमेरिका के सीधे समर्थन से पहले और बाद में रूस, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया से लेकर फ्रांस तक के देशों ने भी भारत की बोली का समर्थन किया है। हालांकि, ट्रम्प प्रशासन के दौरान इस विषय पर कोई और चर्चा नहीं हुई। नए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अभी तक भारत के समर्थन में कुछ खास योगदान नहीं दिया है।
2021 में अमेरिकी सीनेट की सुनवाई के दौरान जब संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की स्थाई राजदूत लिंडा थॉमस-ग्रीनफ़ील्ड से पूछा गया, कि क्या भारत, जर्मनी और जापान को स्थायी सीटें मिलनी चाहिए? तो उन्होंने पुष्टि की थी, कि "इसके लिए कुछ मजबूत तर्क हैं।" लेकिन, उन्होंने आगे कहा, "मैं यह भी जानती हूं, कि ऐसे अन्य लोग भी हैं, जो अपने क्षेत्र में इस बात से असहमत हैं, कि इन देशों को अपने क्षेत्र का प्रतिनिधि होना चाहिए।"
यानि, अमेरिका खुद भारत के साथ डबल गेम खेलता आया है।
इसके अलावा, अमेरिका की पेशकश ये है, कि भारत को स्थायी सीट तो मिले, लेकिन भारत के पास वीटो पावर का अधिकार ना हो।
पंडित नेहरू की ऐतिहासिक गलती
स्थायी सीट की दिशा में लगातार नाकामी लगने से भारती के लोग निराश हो सकते हैं, लेकिन विडंबना यह है, कि इसके लिए भारत खुद ही जिम्मेदार है। 1950 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने चुपचाप सुरक्षा परिषद में ताइवान की जगह लेने के बारे में भारत को चेतावनी दी थी, लेकिन भारत के प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विरोध किया था।
इसके बजाय, जवाहर लाल नेहरू ने सुझाव दिया था, कि सीट उचित रूप से पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को दी जानी चाहिए। उन्होंने 1955 में भी सोवियत संघ के इसी तरह के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। नेहरू का मानना था, कि भारत का तत्कालीन सहयोगी चीन, अपने आकार और एशिया में उभरती भूमिका को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र में स्थाई सीट का हकदार है।
भारत के नीति-निर्माताओं को लंबे समय से जवाहर लाल नेहरू के इस फैसले पर दुख रहा है, क्योंकि उनके इस फैसले ने जियो-पॉलिटिक्स में भारत को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया है। भारत उस वक्त आसानी से यूएनएससी की स्थायी सदस्यता पा सकता था और चीन यूएनएससी का स्थायी सदस्य नहीं होता।
पिछले कई दशकों के दौरान, विशेषकर जब भारत ने आर्थिक और सैन्य शक्ति अच्छी तरह से हासिल कर ली है, उसने सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट के लिए जोरदार अभियान चलाया है।
भारत ने लगातार कहा है, कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद पुरानी हो चुकी है और इसमें सुधार की आवश्यकता है, और भारत के आकार और इसकी बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा को देखते हुए, भारत को इसमें शामिल किया जाना चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र के लिए भारत का योगदान
भारत ने हमेशा से संयुक्त राष्ट्र को मजबूत करने में अहम योगदान दिया है। 1948 में शांति मिशनों की शुरुआत के बाद से, भारत ने 49 मौकों पर संयुक्त राष्ट्र के लिए सैन्य टुकड़ियां भेजी हैं। भारत के 2 लाख से ज्यादा सैनिक यूनाइटेड नेशंस की तरफ से जंग लड़ चुके हैं।
2007 में लाइबेरिया में पहली पूर्ण महिला शांति सेना तैनात करने का अनूठा गौरव भी भारत हासिल कर चुका है। ये कोई छोटी उपलब्धियां नहीं हैं, और संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों के रूप में सेवा करते हुए देश के 160 से ज्यादा भारतीय सैन्यकर्मी मारे भी गए हैं।
इसके अलावा, कोविड संकट के दौरान भी भारत ने यूएनएससी को भारी संख्या में वैक्सीन और दूसरी मेडिकल जरूरतों की सप्लाई की है। लेकिन, इसके बाद भी यूएनएससी में शामिल वैश्विक शक्तियां नहीं चाहती हैं, कि उनके पास जो ताकत है, उसका बंटवारा हो।
यूएनएससी के भीतर राजनीति
1991-1992 के यूएनएससी कार्यकाल के दौरान संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि चिन्मय आर घरेखान ने अपनी किताब द हॉर्सशू टेबल में लिखा है, कि पांच स्थायी सदस्य चाहेंगे, कि गैर-स्थायी सदस्य "सहयोगी" हों, और उनके रास्ते में कोई बाधा न हो।
घरेखान ने लिखा है, कि ज्यादातर गैर-स्थायी सदस्य पी-5 सदस्यों से प्रभावित होते हैं। "वे स्थायी सदस्यों को नाराज़ नहीं करना चाहते थे, और चाहते थे कि वे उन्हें 'सहयोगी' समझें। यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसा स्थायी सदस्य चाहेंगे कि गैर-स्थायी सदस्य व्यवहार करें। भारतीयों ने अपने काम को अधिक गंभीरता से लिया, और परिणामस्वरूप उन्हें यह लड़ाई अब खुद लड़नी होगी।"
दूसरी तरफ, चीन कभी नहीं चाहेगा, कि भारत को स्थायी सीट मिले और भारत के पास वीटो पावर आए। चीन, अकसर तर्क देता है, कि अगर भारत को स्थायी सीट मिलती है, तो इसका इस्तेमाल भारत यूएनएससी में कश्मीर के मुद्दे को लेकर करेगा। चीन की दलील पाकिस्तान के विचार पर आधारित होती है।
भारत को यूएनएससी में स्थायी सदस्यता तभी मिल सकती है, जब इसमें परिवर्तन हो और ऐसा होना काफी मुश्किल दिख रहा है।
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