ताइवान के उप-राष्ट्रपति के अमेरिका दौरे से क्यों भन्नाया है चीन, विलियम लाई की ताकत को समझिए
William Lai US Visit makes China angry: चीन ने एक बार फिर से स्व-शासित द्वीप समूह ताइवान को घेर रखा है और भीषण सैन्य अभ्यास कर रहा है। चीन इस बात से भन्नाय हुआ है, कि आखिर ताइवान के उप-राष्ट्रपति विलियम लाई ने अमेरिका का दौरा क्यों किया है?
विलियम लाई को चीन ने अलगाववादी करार दिया है, जिन्होंने पराग्वे की अपनी यात्रा से लौटते वक्त अमेरिका की भी यात्रा की थी, जिसके बाद ताइवान स्ट्रेट में एक बार फिर से भारी तनाव छिड़ गया है। विलियम लाई दो दिनों तक अमेरिका में रूके, जिससे चीन आगबबूला है।
चीन, ताइवान को अपना ही हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान खुद को एक अलग स्वतंत्र देश मानता है, लिहाजा उसने विलियम लाई को 'परेशानी पैदा करने वाला शख्स' करार दिया है, जो लोकतंत्र के समर्थक हैं। लिहाजा, आइये समझने की कोशिश करते हैं, कि विलियम लाई के अमेरिका दौरे से चीन इतना परेशान क्यों है?

क्यों आगबबूला है चीन?
चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए ताइवान एक बेहद भावनात्मक मुद्दा है।
पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने ताइवान को अपना क्षेत्र होने का दावा किया है, क्योंकि 1949 में माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट ताकतों के साथ गृह युद्ध हारने के बाद पराजित रिपब्लिक ऑफ चाइना सरकार ताइवान द्वीप पर भाग गई थी।
चीन ने इसे ताइपे और वाशिंगटन के बीच "मिलीभगत" के रूप में देखते हुए, बार-बार अमेरिकी अधिकारियों से ताइवान के नेताओं के साथ बातचीत नहीं करने या उन्हें किसी भी आड़ में देश में आने की अनुमति नहीं देने का आह्वान किया है।
बीजिंग ने लोकतांत्रिक, स्वशासित द्वीप पर नियंत्रण पाने के लिए बल के प्रयोग से इनकार नहीं किया है और हाल के वर्षों में ताइवान द्वीप के पास सैन्य गतिविधि बढ़ा रहा है।
साल 2005 में चीन ने एक कानून पारित किया, जिसमें ताइवान पर अधिकार करने के लिए बीजिंग को उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई का कानूनी आधार दिया गया।
चीन विलियम लाई को इतना नापसंद क्यों करता है?
चीन का मानना है, कि विलियम लाई एक अलगाववादी हैं, यह विचार ताइवान की स्वतंत्रता के लिए "एक कार्यकर्ता" होने के बारे में उनकी टिप्पणियों के बाद पैदा हुआ है। विलियन लाई खुद को ताइवान की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाला एक कार्यकर्ता बताते हैं।
जबकि, ताइवान और अमेरिका का कहना है, कि लाई का अमेरिका दौरा नियमित था और चीन के लिए नाराज होने का कोई कारण नहीं है, वहीं बीजिंग का तर्क है, कि लाई की यात्राएं ताइवान के लिए "स्वतंत्रता" की मांग के समर्थन में थीं, और "स्थानीय चुनाव में लाभ प्राप्त करने" के लिए एक "छलावा" थीं। चीन ने इसे बेइमान चाल करार दिया है।
आपको बता दें, कि ताइवान में अगले साल जनवरी में चुनाव होने हैं और विलियम लाई, सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाए गये हैं, जो चुनावी ओपिनियन पोल्स में सबसे आगे चल रहे हैं।

ताइवान-अमेरिका संबंध कैसे हैं?
1979 में, अमेरिका ने ताइपे में सरकार के साथ आधिकारिक संबंध तोड़ दिए और इसके बजाय बीजिंग में सरकार को मान्यता दे दी। उसी समय ताइवान-अमेरिका रक्षा संधि को समाप्त कर दिया गया।
अमेरिका और ताइवान के बीच 1979 के बाद के रिश्ते को ताइवान संबंध अधिनियम द्वारा नियंत्रित किया गया है, जो वाशिंगटन को ताइवान को अपनी रक्षा के साधन प्रदान करने का कानूनी आधार देता है लेकिन यह अनिवार्य नहीं करता है, कि हमला होने पर अमेरिका ताइवान की सहायता निश्चित तौर पर करेगा।
जबकि, अमेरिका ने लंबे समय से "रणनीतिक अस्पष्टता" की नीति का पालन किया है, कि क्या वह चीनी हमले की स्थिति में ताइवान की रक्षा के लिए सैन्य रूप से हस्तक्षेप करेगा या नहीं। वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने यह कहते हुए तनाव बढ़ा दिया है, कि अमेरिका ताइवान की रक्षा के लिए, बल का उपयोग करने के लिए तैयार रहेगा।
अमेरिका ताइवान के लिए हथियारों का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है, और ताइवान की विवादास्पद स्थिति बीजिंग और वाशिंगटन के बीच तनाव का एक निरंतर स्रोत है।
क्या कहता है ताइवान?
ताइवान की सरकार का कहना है, कि चूंकि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना ने कभी भी द्वीप पर शासन नहीं किया है, इसलिए उसे इस पर संप्रभुता का दावा करने, इसके लिए बोलने या विश्व मंच पर इसका प्रतिनिधित्व करने का कोई अधिकार नहीं है, और केवल ताइवान के लोग ही अपना भविष्य तय कर सकते हैं।
ताइवान का आधिकारिक नाम अभी भी चीन गणराज्य है, हालांइन दिनों, सरकार अक्सर इसे चीन गणराज्य (ताइवान) के रूप में शैलीबद्ध करती है।
सिर्फ 13 देश औपचारिक रूप से ताइवान को मान्यता देते हैं, जिनके नाम बेलीज, ग्वाटेमाला, हैती, पैराग्वे, सेंट किट्स और नेविस, सेंट लूसिया, सेंट विंसेंट और ग्रेनेडाइंस, मार्शल द्वीप, नाउरू, पलाऊ, तुवालु, इस्वातिनी और वेटिकन सिटी हैं।
2016 में त्साई इंग-वेन के ताइवान के राष्ट्रपति बनने के बाद नौ देशों ने चीन के साथ गठबंधन कर लिया और बीजिंग ने ताइवान को राजनयिक रूप से अलग-थलग करने के अपने प्रयास बढ़ा दिए हैं।
ताइवान की सरकार का कहना है कि वह एक संप्रभु देश है और उसे एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच संबंध रखने का अधिकार है।
ताइपे और बीजिंग के बीच संबंध कैसे हैं?
बहुत ज्यादा खराब।
चीन, ताइवान की राष्ट्रपति त्साई को एक अलगाववादी नेता के रूप में देखता है और बातचीत के लिए उनके बार-बार के आह्वान को खारिज कर देता है।
राष्ट्रपति त्साई का कहना है, कि वह शांति चाहती हैं लेकिन अगर ताइवान पर हमला हुआ तो उनकी सरकार उसकी रक्षा करेगी।
बीजिंग का कहना है, कि त्साई को यह स्वीकार करना होगा, कि चीन और ताइवान "एक चीन" का हिस्सा हैं।
इसके अलावा, कोई भी पक्ष दूसरे को मान्यता नहीं देता है, और 2016 में त्साई के पहली बार चुनाव जीतने के बाद चीन ने सभी औपचारिक वार्ता तंत्र बंद कर दिए हैं।












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