तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन ने यहां इस्लाम का हवाला क्यों दिया?

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तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन इन दिनों अपनी अर्थव्यवस्था में कई तरह के प्रयोग कर रहे हैं. पहले उन्होंने बढ़ती महंगाई को काबू में करने के लिए ब्याज दरों में कटौती जारी रखी.

इस कटौती को उन्होंने इस्लाम और ख़ुद के मुसलमान होने से भी जोड़ा. दरअसल, ब्याज दरों में कटौती के कारण तुर्की की मुद्रा लीरा डॉलर के मुक़ाबले औंधे मुँह गिरने लगी. एक साल पहले एक डॉलर के लिए 7.5 लीरा देना होता था, पर अब दोगुना देना पड़ रहा है. लीरा में गिरावट के कारण जब अर्दोआन देश में घिरे तो उन्होंने पिछले हफ़्ते रविवार को अपनी नीतियों को इस्लाम से जोड़ दिया.

अर्दोआन ने अपनी आलोचनाओं का जवाब देते हुए रविवार को कहा था, ''वे कह रहे हैं कि हम ब्याज दरों में कटौती कर रहे हैं. मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि मुझसे आप यही उम्मीद कर सकते हैं. एक मुसलमान होने के नाते इस्लामिक क़ानून हमें जो इजाज़त देता है, वही करूंगा. मैं यह करना जारी रखूंगा. इस्लामिक क़ानून यही है.''

तुर्की में नवंबर में वार्षिक महंगाई दर 21 फ़ीसदी पहुँच गई थी. अर्थशास्त्रियों का कहना है कि ये अभी और ऊपर जाएगी. अगले नौ महीनों में महंगाई दर 30 फ़ीसदी तक पहुँचने की आशंका है.

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ब्याज दरों में कटौती और इस्लाम

महंगाई बढ़ने के बावजूद तुर्की के केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में कटौती करना जारी रखा. सामान्य तौर पर होता यह है कि महंगाई बढ़ने पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी की जाती है. इसी साल तुर्की के केंद्रीय बैंक में अर्दोआन ने नए गवर्नर की नियुक्ति की थी क्योंकि तत्कालीन गवर्नर ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर दी थी. तुर्की के केंद्रीय बैंक ने सितंबर से ब्याज दर में पाँच प्रतिशत पॉइंट्स की कटौती की है जबकि इस दौरान महंगाई दर 21 फ़ीसदी तक रही है.

लेकिन इतना कहने भर से लीरा में जारी गिरावट नहीं थमी. लीरा में गिरावट को रोकने के लिए सोमवार को अर्दोआन ने एक और अपारंपरिक आर्थिक नीति की घोषणा की. अर्दोआन ने कहा कि तुर्की के लोग लीरा में गिरावट के कारण अपनी बचत को लेकर चिंता में हैं, ख़ास करके वे लोग जो अपनी बचत लीरा में जमा करते हैं.

अर्दोआन ने कहा कि लीरा में बचत करने वालों को डॉलर की तुलना में उसके मूल्य में गिरावट होने पर नुक़सान की भरपाई सरकार करेगी. तुर्की के राष्ट्रपति की इस घोषणा से लीरा में अचानक 20 फ़ीसदी की मज़बूती आई.

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लीरा पर अर्दोआन की रणनीति

अर्दोआन की इस घोषणा से पहले एक डॉलर की तुलना में लीरा 18.36 पर पहुँच गया था, लेकिन घोषणा के बाद इस हफ़्ते मंगलवार सुबह 11.09 पर आ गया. अर्दोआन की इस घोषणा से लीरा में बचत करने वाले आश्वस्त हुए. टर्किश बैंक असोसिएशन के प्रमुख अल्पास्लान केकार ने टर्किश प्रसारक हाबेरातुर्क से कहा कि सोमवार को लोगों ने एक अरब डॉलर बेचकर लीरा ख़रीद लिए.

लेकिन आर्थिक जानकारों ने अर्दोआन सरकार की इस नीति को टिकाऊ नहीं माना है और बताया कि इससे तुर्की के राजस्व पर बोझ बढ़ेगा. जेएनयू में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं कि अर्दोआन वही कर रहे हैं, जो उन्हें सत्ता से बेदखल होने से बचा सकता है. 2023 में तुर्की में चुनाव है और वे लगातार अलोकप्रिय हो रहे हैं.

प्रोफ़ेसर अरुण कुमार कहते हैं, ''ब्याज दरों में कटौती को इस्लाम से जोड़ना मज़हब के स्तर पर ठीक हो सकता है. इस्लाम में ब्याज लेना हराम है. लेकिन अर्थव्यवस्था धार्मिक नियमों से नहीं चल सकती है. हालांकि अर्दोआन की ब्याज दरों में कटौती करने वाली नीति से महंगाई बढ़ रही है, इससे मैं सहमत नहीं हूँ.

महंगाई पूरी दुनिया में बढ़ी है और इसकी मुख्य वजह सप्लाई चेन का बाधित होना है. अर्दोआन अभी बाहर और अंदर दोनों तरफ़ से घिरे हुए हैं. ब्याज में कटौती का असर लीरा पर ज़रूर पड़ रहा होगा. अर्दोआन को चुनाव इस्लाम के सहारे ही जीतना है तो वे हवाला भी इस्लाम का ही देंगे. लेकिन उनके चुनाव जीतने से तुर्की की अर्थव्यवस्था नहीं सुधर जाएगी.''

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इस्लाम और अर्दोआन

अर्दोआन इस्लामिक प्रतीकों को लेकर बहुत सजग रहे हैं. उनकी पत्नी हिजाब पहनती हैं. तुर्की में हिजाब प्रतिबंधित था. हिजाब के साथ लड़कियाँ यूनिवर्सिटी नहीं जा सकती थीं. अर्दोआन की पत्नी हिजाब के कारण ही किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में नहीं जाती थीं.

2003 में पहली बार तुर्की के प्रधानमंत्री बनने के बाद अर्दोआन ने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा था, ''मैं कुछ भी होने से पहले एक मुसलमान हूँ. एक मुसलमान के तौर पर मैं अपने मज़हब का पालन करता हूं. अल्लाह के प्रति मेरी ज़िम्मेदारी है. उसी के कारण मैं हूँ. मैं कोशिश करता हूँ कि उस ज़िम्मेदारी को पूरा कर सकूँ.''

यहाँ तक कि अर्दोआन ने अपनी बेटियों को इंडियाना यूनिवर्सिटी पढ़ने के लिए भेजा क्योंकि वहाँ वो हिजाब पहन सकती थीं.

कैपिटल इकनॉमिक्स में जैसन तुवी सीनियर अर्थशास्त्री हैं. उन्होंने अर्दोआन की आर्थिक नीतियों पर सीएनएन से कहा, ''बैंक डिपॉजिट को करेंसी रेट से जोड़ना फ़ॉरेन एक्सचेंज व्यवस्था के लिए जोख़िम भरा हो सकता है. यह देश के राजस्व के लिए ख़तरा साबित हो सकता है क्योंकि इससे बिल बढ़ेगा.

लीरा में बचत करने वालों को नुक़सान होने पर अर्दोआन की नीति के तहत भरपाई के लिए भारी रक़म चुकानी होगी और इससे बजट घाटा बढ़ेगा. तुर्की में सार्वजनिक वित्तीय ढाँचा मज़बूत है, इसलिए इसका तत्काल असर नहीं पड़ेगा क्योंकि क़र्ज़ जीडीपी का क़रीब 40 फ़ीसदी है. लेकिन लंबी अवधि के लिए यह नीति ठीक नहीं है.''

तुर्की के वित्त मंत्रालय ने कहा है कि अर्दोआन की नई नीति व्यक्तिगत जमा खाते में लागू होगी और यह तीन से 12 महीने की फ़िक्स्ड अवधि में लागू होगी. अर्दोआन की इस नीति से कमज़ोर होते लीरा के कारण डॉलर और सोना में बचत करने वाले फिर से लीरा की तरफ़ लौट सकते हैं. अर्दोआन का कहना है कि यह उनका नया आर्थिक मॉडल है और इससे निर्यात, निवेश और रोज़गार बढ़ाने में मदद मिलेगी.

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अर्दोआन की विदेश नीति पर सवाल

अर्दोआन तुर्की के भीतर अपनी आर्थिक नीतियों को लेकर सवालों के घेरे में हैं तो तुर्की से बाहर भी अपनी विदेशी नीति के कारण घिरे हुए हैं. इसी साल सितंबर महीने के मध्य में अर्दोआन न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को संबोधित करने गए थे.

उन्हें उम्मीद थी कि आम सभा से अलग अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से भी मुलाक़ात होगी. इससे पहले के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अर्दोआन के अच्छे रिश्ते थे. कहा जाता है कि अर्दोआन तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बैकडोर डील कर लेते थे. वो उम्मीद कर रहे थे कि बाइडन से भी ऐसा करने में उन्हें कामयाबी मिलेगी.

लेकिन व्हाइट हाउस के स्टाफ़ ने बाइडन से मुलाक़ात की संभावनाओं को ख़ारिज कर दिया था. व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने कहा था कि राष्ट्रपति बाइडन न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को संबोधित कर तत्काल वॉशिंगटन लौट जाएंगे. बाइडन की अनदेखी से ख़फ़ा अर्दोआन ने टर्किश हाउस में एक इंटरव्यू दिया और अमेरिका पर निशाना साधते हुए बहुत ही कड़ा बयान दिया.

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अर्दोआन ने अमेरिकी नेटवर्क सीबीएस को दिए इंटरव्यू में कहा था, ''भविष्य में कोई भी व्यक्ति इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता है कि किस तरह का रक्षा सौदा हम किस देश से और किस स्तर का करेंगे.'' तुर्की नेटो का सदस्य है. एक सेक्युलर मुल्क रहा है और यूरोप की तरह लगता है. तुर्की की तमन्ना यूरोपीय यूनियन में शामिल होने की भी रही है. लेकिन अर्दोआन के नेतृत्व वाला तुर्की अब बदल चुका है.

2003 में अर्दोआन प्रधानमंत्री बने थे और फिर 2014 में तुर्की के पहले कार्यकारी राष्ट्रपति बने जिन्हें पॉपुलर वोटों के ज़रिए चुना गया था. अर्दोआन ने तुर्की की पश्चिम परस्त नीतियों को तोड़ा. अभी अर्दोआन के संबंध रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से अच्छे हैं लेकिन सीरिया, लीबिया और अज़रबैजान के कारण टकराव भी है.

तुर्की के पूर्व प्रधानमंत्री और अर्दोआन को विदेश नीति के मामलों सलाह देने वाले अहमत दावुतोगलु ने एशिया निक्केई रिव्यू से कहा है, ''पड़ोसियों के साथ तुर्की की कोई समस्या नहीं थी लेकिन अर्दोआन ने एक भी ऐसा पड़ोसी नहीं छोड़ा है, जिसके साथ अब समस्या ना हो.''

रूस और तुर्की
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वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट फ़ॉर नीयर ईस्ट पॉलिसी में टर्किश रिसर्च प्रोग्राम के निदेशक और अर्दोआन पर किताब लिख चुके सोनर चप्ताय ने ट्वीट कर कहा है कि इराक़, सीरिया और लीबिया में तुर्की के प्रभावी सैन्य अभियान के ज़रिए तुर्की ने राजनीतिक ताक़त दिखाई, लेकिन वह डिप्लोमैटिक पावर बनने में नाकाम रहा.''

तुर्की नेटो का सदस्य है लेकिन अर्दोआन ने रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम 2017 में ख़रीदा. दूसरी तरफ़ अमेरिका ने सीरिया में कुर्दों का समर्थन किया जिसे तुर्की आतंकवादी कहता है और देश के भीतर अलगाववादी कुर्दिशों से जोड़ता है.

कहा जाता है कि जब अर्दोआन पश्चिम से उपेक्षित महसूस करते हैं तो उत्तर में रूस की ओर देखते हैं. सितंबर में बाइडन जब अर्दोआन से नहीं मिले तो टर्किश राष्ट्रपति रूस के सोची में जाकर पुतिन से मिल लिए.

कहा जाता है कि अर्दोआन के नेतृत्व में तुर्की चारों दिशाओं में देखने की कोशिश करता है. पश्चिम में यूरोप, दक्षिण में इस्लामिक दुनिया, पूरब में यूरेशिया और उत्तर में रूस. अमेरिकी सेना के पूर्व अधिकारी रिच ओट्ज़ेन ने एशिया निक्केई रिव्यू से कहा कि जब भी अर्दोआन एक दिशा में ख़तरा महसूस करते हैं तो दूसरी दिशा में मुंह फेर लेते हैं.

(कॉपी - रजनीश कुमार)

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