मसूद अज़हर के मसले पर चीन नरम क्यों पड़ा?

मसूद अज़हर

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने बुधवार को पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख अज़हर मसूद को वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया.

ये मुमकिन हो सका क्योंकि पाकिस्तान के सबसे बड़े समर्थक और इस मामले में हर बार वीटो लगा देने वाले चीन ने अपने रुख़ में बदलाव किया.

इससे पहले जब भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने पर चर्चा हुई, तो चीन ने अपनी वीटो पॉवर का इस्तेमाल कर ऐसा होने से रोक दिया.

क़रीब 10 साल से चीन का यही रुख़ रहा. इस दौरान उसने हमेशा यही कहा कि इस मामले में जल्दबाज़ी नहीं की जानी चाहिए; और ऐसे फैसले तभी प्रभावी हो सकते हैं, जब वक़्त और सब्र के साथ काम लिया जाए और सभी सदस्यों में सहमति बने.

भारत ने मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने का प्रस्ताव सबसे पहले 2009 में मुंबई में हुए 26/11 हमलों के बाद रखा था.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रस्ताव का समर्थन करने का वादा करते रहे हैं.

मसूद अज़हर

मसूद के लिए अकेले खड़ा रहा चीन

अस्थाई स्दस्यों में से भी ज़्यादातर ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया. लेकिन पाकिस्तान स्थित ख़राब ट्रेक रिकॉर्ड वाले इस चरमपंथी को बचाने के लिए चीन अकेला खड़ा रहा, जिसकी वजह से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद मसूद को वैश्विक आतंकवादी घोषित नहीं कर पाता था.

लेकिन फ्रांस जैसी महाशक्तियों ने चीन को अलग-थलग करते हुए मसूद अज़हर को अपने राष्ट्रीय स्तर पर वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया.

भारत में फ़रवरी में हुए पुलवामा हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र की प्रतिबंध समिति की मार्च में हुई बैठक में फ्रांस, ब्रिटेन और अमरीका ने मिलकर ये प्रस्ताव फिर से रखा ,लेकिन चीन ने आख़िरी समय पर एक बार फिर इसपर 'तकनीकी रोक' लगा दी और ये मुद्दा एक बार फिर छह महीने के लिए ठंडे बस्ते में चला गया.

ये चौथी बार था जब चीन ने 'तकनीकी रोक' लगाई थी और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्रतिबंध समिति से इस मसले पर और चर्चा करने के लिए कहा था.

हालांकि इसके कुछ ही दिनों के बाद चीन के विदेश मंत्री और भारत में उनके राजदूत इस मुद्दे का समाधान निकालने की बात की और छह महीने के अंदर ही चीन ने इस प्रस्ताव पर सहमति दे दी.

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मसूद अज़हर

लेकिन चीन का ये हृदय परिवर्तन कैसे हुआ?

इसकी एक वजह ये हो सकती है कि चीन की ओर से बार-बार लगाई जा रही इस तकनीकी रोक को देखते हुए ट्रंप प्रशासन (जिसका चीन के साथ पहले से व्यापार युद्ध चल रहा है) ने पिछले महीने सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे पर बहस करने का प्रस्ताव दिया था. अमरीका ने कहा था कि ये बहस परिषद के टेबल पर होनी चाहिए.

लेकिन चीन तो अबतक प्रतिबंध समिति में बंद दरवाज़ों के पीछे इसपर बात करता रहा है. अमरीका के इस प्रस्ताव के बाद उसे सार्वजनिक तौर पर इस मुद्दे पर बात करनी पड़ती.

इस तरह का दबाव बनता देख पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने ये प्रचार करना शुरू कर दिया कि मसूद अज़हर बहुत बीमार है और जबतक उनके ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं मिलता, तबतक उन्हें कोर्ट में घसीटा नहीं जाना चाहिए.

इसने चीन और पाकिस्तान को ये सोचने पर भी मजबूर किया होगा कि क्या मसूद अज़हर अब काम का नहीं रहा और क्या वो भारत के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किए जाने वाले हथकंडे के बजाए एक बोझ बन गया है.

ये भी दिलचस्प है कि चीन ने ये फैसला ऐसे वक़्त पर किया जब एक दिन पहले ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान चीन की बेल्ट एंड रोड समिट में हिस्सा लेकर बीजिंग से लौटे थे.

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मसूद अज़हर

इस दौरान उन्होंने राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत चीन के कई नेताओं से द्विपक्षीय बैठके की थीं. इस दौरान मसूद अज़हर पर भी बात हुई होगी.

हालांकि चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को अपना फैसला तो बता दिया, लेकिन पाकिस्तान को कम से कम नुक़सान हो, इसके लिए चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इसकी कोई समयसीमा नहीं बताई और अपनी पार्टी लाइन को दोहराते हुए कहा कि जल्द से जल्द इस मसले का उचित समाधान निकाला जाएगा.

चीन की इस नरमी के पीछे एक और कारण ये है कि पेरिस स्थित फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने पिछले एक साल में पाकिस्तान पर नकेल कसते हुए उसे अपनी 'ग्रे लिस्ट' में डाल दिया और उसे गंभीर परिणामों के साथ जून तक 'काली सूची' में डालने की भी चेतावनी दी.

उसने पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि वो अपनी धरती पर विभिन्न चरमपंथी संगठनों की आर्थिक फंडिग रोकने में नाकाम रहा.

चीन ने ये गणित भी लगाया होगा कि वो फिलहाल एफएटीएफ का वाइस प्रेसिडेंट है और अक्तूबर में प्रेसिडेंट बनने जा रहा है.

इसके अलावा भारत की हाल में की गई राजनयिक कोशिशों, ख़ासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आतंकवाद-विरोधी अभियान को भी सराहने की ज़रूरत है, जिसके तहत उन्होंने चीन समेत सभी महाशक्तियों से सक्रिय द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बातचीत की.

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मसूद अज़हर

ये भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि पिछले अप्रैल में हुई वुहान इनफोर्म समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाक़ात से भी कामयाबी हासिल हुई.

चीन की घोषणा की टाइमिंग से ये भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि सत्ताधारी पार्टी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की तरफ़ से मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने का फायदा आम चुनाव में ले सकती है. वो इसे चीन और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ अपनी विदेश नीति की बड़ी जीत के तौर पर पेश कर सकती है.

लेकिन सरसरी तौर पर किए रिएलिटी चेक बताते हैं कि मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया जाना प्रतिकात्मक जीत से ज़्यादा कुछ भी नहीं होगा.

हाफ़िज़ सईद का मामला सबसे उपयुक्त उदाहरण है.

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हाफिज़ सईद

मसूद अज़हर का क्या होगा

मुंबई में 26/11 के चरमपंथी हमले के बाद ओबामा प्रशासन ने 2012 में हाफ़िज़ सईद पर एक करोड़ डॉलर का ईनाम रखा था.

पाकिस्तान ग़रीबी और क़र्ज़ से जूझ रहा है, लेकिन ये ईनाम उसे लुभा नहीं सका.

कई बार सरकार ने सईद को 'सुरक्षात्मक हिरासत' में रखा और अदालतों ने (ऐसा माना जाता है) उन्हें सभी मामलों में बरी कर दिया.

हाफ़िज़ सईद ना सिर्फ़ पाकिस्तान में खुले आम घूमते रहे हैं, बल्कि उन्होंने वहां एक राजनीतिक पार्टी भी बना ली. इस पार्टी ने पिछले साल जुलाई में हुए चुनावों में नेशनल असेंबली के लिए 80 उम्मीदवारों और प्रांतीय विधान सभाओं के लिए 185 उम्मीदवारों को उतारा.

अज़हर मसूद की क़िस्मत भी इससे कुछ अलग नहीं होगी.

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