Elon Musk के लिए भारत से ज्यादा मायने रखता है चीन, जानिए शी जिनपिंग के आगे क्यों नतमस्तक हुए Tesla बॉस?
Elon Musk China India: टेस्ला के बॉस एलन मस्क ने पिछले साल जून महीने में घोषणा की थी, कि वो अगले साल, यानि 2024 में भारत की यात्रा करने का प्लान बनारहे हैं, लेकिन भारत आने से ठीक 2 दिन पहले एलन मस्क ने अचानक अपना दौरा कैंसिल कर दिया।
लेकन, भारत की यात्रा टालने के एक हफ्ते के अंदर ही टेस्ला के सीईओ एलन मस्क फुल सेल्फ ड्राइविंग (FSD) कार पर जोर देने के लिए शी जिनपिंग के प्रशासन को मनाने बीजिंग पहुंच गये। जिससे साबित हो गया है, कि दुनिया की सबसे बड़ी इलेक्ट्रिक कार कंपनी टेस्ला के सप्लाई चेन के लिए चीन कितना ज्यादा महत्व रखता है और आखिर क्यों एलन मस्क 'चायना मैन' बन चुके हैं।

आखिर एलन मस्क के लिए भारत की जगह चीन इतना ज्यादा मायने क्यों रखता है, कि वो भारत का 'अपमान' कर चीन का मान मनौव्वल करने बीजिंग पहुंच गये? आइये समझने की कोशिश करते हैं।
बैटरी उत्पादन में चीन का वर्चस्व
दुनियाभर में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बिक्री में चीन की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से ज्यादा है, और इसकी सबसे बड़ी वजह इलेक्ट्रिक गाड़ियों के प्रोडक्शन के लिए बैटरी उत्पादन में चीन का प्रभुत्व है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन की यात्रा के दौरान एलन मस्क ने बैटरी बनाने वाली दिग्गज चीनी कंपनी कंटेम्परेरी एम्पेरेक्स टेक्नोलॉजी कंपनी लिमिटेड (CATL) के चेयरमैन रॉबिन ज़ेंग से हुई।
CATL का वैश्विक बैटरी उत्पादन में दो-तिहाई हिस्सा है, और यह टेस्ला के साथ-साथ वोक्सवैगन एजी और टोयोटा मोटर कॉर्प जैसे अन्य प्रमुख वाहन निर्माताओं के लिए भी बैटरी का उत्पादन करती है।
शंघाई में है टेस्ला का सबसे बड़ा प्लांट
जब इलेक्ट्रिक गाड़ियों के उत्पादन की बात आती है, को चीन ने अमेरिका और यूरोप को काफी पीछे छोड़ दिया है और अब चीन में ही टेस्ला की गाड़ियों में लगने वाले सबसे ज्यादा इंजन का निर्माण होता है। इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए चीन ने जब नई नीति बनाई, जिसके तहत पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनियां स्थापित करने की इजाजत दी गई और उसके बाद साल 2018 में टेस्ला ने चीन में अपनी सबसे बड़ी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट का निर्माण किया।
जब ईवी उत्पादन की बात आती है, तो चीन ने अमेरिका और यूरोप को काफी पीछे छोड़ दिया है, और अब वह टेस्ला के लिए विकास का एक प्रमुख इंजन है। नई चीनी नीति के बाद विदेशी कार निर्माताओं को देश में पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनियां स्थापित करने की अनुमति मिलने के बाद ईवी प्रमुख ने 2018 में शंघाई में अपनी सबसे बड़ी विनिर्माण इकाई खोली।
अकेले शंघाई प्लांट में एक साल में टेस्ला की सबसे सफल मॉडल 3 और मॉडल Y कारों की 1 मिलियन से अधिक यूनिट का उत्पादन होता है। गीगाफैक्ट्री, पहली बार अमेरिका के बाहर, टेस्ला के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप को अपनी कारों की आपूर्ति करती है।
टेस्ला के शंघाई प्लांट ने इसके बाद से जबरदस्त प्रोडक्शन शुरू किया और अकेले शंघाई प्लांट में एक साल में टेस्ला की सबसे कामयाब मॉडल 3 और मॉडल Y कारों की 10 लाख से ज्यादा यूनिट का उत्पादन होता है। टेस्ला अपने शंघाई प्लांट से अमेरिका के साथ साथ न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप में भी अपनी कारों को बेचता है।
इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए भारत का प्लान
इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बिक्री के लिए भारत के बाजार में एक विशाल मौका होने का अनुमान जताया गया है और भारत की कोशिश भी इलेक्ट्रिक गाड़ियों के उत्पादन से लेकर ग्लोबल सप्लाई चेन में अहम भूमिका निभाने की है। हालांकि, भारत भी बैटरी के लिए अन्य देशों पर निर्भर रहा है, लिहाजा भारत में अगर इलेक्ट्रिक गाड़ियां बनाने का प्लांट लगता भी है, फिर भी भारत को बैटरी किसी और देश से ही खरीदना होगा।
नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, लिथियम-आयन बैटरी (LIB) की सबसे बड़ी मांग लैपटॉप, मोबाइल फोन और टैबलेट जैसे उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स से आती है। भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की बिक्री के माध्यम से लिथियम-आयन बैटरी की डिमांड सिर्फ 1 गीगावॉट का है, जबकि इलेक्ट्रॉनिक्स बैटरी की डिमांड 4.5 गीगावॉट की है।
बैटरी की बढ़ती डिमांड को देखते हुए भारत ने एडवांस कैमेस्ट्री सेल (ACC) बैटरी भंडारण के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना के माध्यम से बैटरी उत्पादन पर जोर दे रहा है। एसीसी लिथियम-आयन बैटरी का एक महत्वपूर्ण घटक है। नीति आयोग का कहना है, कि भारत बढ़ते वैश्विक बाजार में एक बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने के लिए अच्छी स्थिति में है और 2030 तक वैश्विक बैटरी मांग का 13% तक भारत की सप्लाई चेन का हिस्सा होगा।

इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए भारत नई नीति
भारत की ईवी नीति सालों के टाल-मटोल के बाद पिछले महीने जारी की गई थी। 2018 में, तत्कालीन नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने कहा था, कि इलेक्ट्रिक वाहन नीति की कोई आवश्यकता नहीं है, और टेक्नोलॉजी को नियमों और कानूनों में नहीं फंसाया जाना चाहिए।
2018-19 में केंद्र सरकार ने मोटर वाहनों, मोटर कारों, मोटरसाइकिलों के आयात पर (CKD) सीमा शुल्क 10% से बढ़ाकर 15% कर दिया था, जिससे वैश्विक वाहन निर्माता नाराज हो गए थे। पिछले महीने जब भारत ने आखिरकार अपनी ईवी नीति जारी की, तो उसमें भारत में कम से कम 500 मिलियन डॉलर का निवेश करने वाली इलेक्ट्रिक कार कंपनियों को भारत में दूसरे देशों में बनाए कार को बेचने पर आयात शुल्क में छूट दी गई।
क्या चीन के रहते भारत के पास मौका है?
एलन मस्क के भारत दौरे से पहले चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने एक के बाद एक कई धमकी भरे लेख लिखे थे और माना जा रहा है, कि चीनी धमकियों से डरकर ही एलन मस्क भारत नहीं आए।
लेकिन, एक्सपर्ट्स का मानना है, कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों की सप्लाई चेन पर चीन के वर्चस्व के बाद भी भारत के पास एक बहुत बड़ा मौका है और अभी भी अमेरिका और यूरोप में भारत के लिए बड़ा अवसर मौजूद है।
यूरोपीय आयोग ने पिछले साल अक्टूबर में चीन से बैटरी इलेक्ट्रिक वाहनों (बीईवी) के आयात पर सब्सिडी की जांच शुरू की थी और जांच ये तय करेगी, कि क्या चीनी सब्सिडी से विदेशी बाजारों में बिकने वाली गाड़ियों को फायदा पहुंचता है। और क्या दूसरी इलेक्ट्रिक गाड़ी कंपनियों को आर्थिक चोट पहुंचता है। इस बीच, संयुक्त राज्य अमेरिका की वाणिज्य सचिव जीना रायमोंडो ने भी चेतावनी दी है, कि चीनी इलेक्ट्रिक गाड़ी निर्माता, अमेरिकी कार निर्माताओं के लिए खतरा हैं। लिहाजा, भारत अगर अपनी सप्लाई चेन को मजबूत करता है, तो निश्चित तौर पर इसका फायदा भविष्य में हो सकता है।
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