BBC का मालिक कौन है ? पक्षपात के आरोपों की हकीकत और कमाई का स्रोत जानिए
बीबीसी ने पीएम मोदी पर जो डॉक्यूमेंट्री प्रसारित किए हैं, उसको लेकर काफी विवाद है। लेकिन, बीबीसी के साथ यह नया नहीं है। बीबीसी पर ब्रिटेन में भी पक्षपात के आरोप हैं और एक समय इसके डीजी और चेयरमैन तक यह मान चुके हैं।

बीबीसी या ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन इन दिनों भारत समेत दुनिया में कई जगहों पर विवादों की वजह बन चुका है। इसका कारण ये है कि इसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ 'India: The Modi Question' नाम की एक डॉक्यूमेंट्री दिखाई है, जिसपर भारतीय संप्रभुता को चुनौती देने तक के आरोप लग रहे हैं। भारत सरकार ने बीबीसी की इस हरकत को 'प्रोपेगेंडा' और 'औपनिवेशिक मानसिकता' वाला बताया है। पिछले हफ्ते यूके के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक भी पीएम मोदी के समर्थन में उतर पड़े थे और कहा था कि वे इस डॉक्यूमेंट्री से सहमत नहीं हैं। भारत में भी इस डॉक्यूमेंट्री के बहाने विरोधियों को पीएम मोदी पर निशाना साधने का एक और मौका मिल गया है। हालांकि, इस मसले पर विपक्ष में भी गहरा मतभेद उभर आया है। पूर्व रक्षा मंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता एके एंटनी के बेटे अनिल एंटनी ने पार्टी नेतृत्व पर गंभीर आरोप लगाते हुए इस्तीफा तक दे दिया है।

बीबीसी कब और कैसे बना ?
बीबीसी की स्थापना 18 अक्टूबर, 1922 को हुई थी। तब यह निजी कंपनी थी और नाम था ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कंपनी। इसके शेयर सिर्फ ब्रिटिश मैन्युफैक्चरर ही रख सकते थे। शुरू में कंपनी ब्रॉडकास्टिंग इंडस्ट्री में जगह नहीं बना पा रही थी। लेकिन, 1926 की आम हड़ताल में इसकी किस्मत चमक गई। इसने उस समय जिस तरह से कवरेज दिया, उसे वहां के लोगों ने हाथों-हाथ लिया। उसी साल ब्रिटेन की संसद की एक समिति ने सुझाव दिया कि इस निजी कंपनी को सरकारी बनाकर 'ताज' के अधीन लाया जाए। इस तरह से ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कंपनी, ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन बना। मतलब अब यह संगठन ब्रिटिश संसद के प्रति जवाबदेह बन गया, लेकिन कथित तौर पर अपनी गतिविधियों के लिए स्वतंत्र बना रहा।

बीबीसी का मालिक कौन ?
तब से लेकर अबतक बीबीसी ब्रिटेन के रॉयल चार्टर के तहत संचालित होता है, जो ब्रिटिश सम्राट द्वारा प्रदान किया गया है। इसके तहत बीबीसी के लिए यह अनिवार्य है कि वह देश के गृहसचिव से लाइसेंस लेकर कार्य करे। रॉयल चार्टर के अनुसार बीबीसी को हर 10 साल में लाइसेंस को रिन्यू करवाना होता है। मौजूदा लाइसेंस की अवधि 31 दिसंबर, 2027 तक है। चार्टर के तहत बीबीसी का उद्देश्य 'यूनाइटेड किंगडम के सारे हिस्सों और विश्व के व्यापक भाग को लेकर लोगों की समझ बनाने के लिए विधिवत सटीक और निष्पक्ष समाचार, सम-सामयिकी और तथ्यात्मक प्रोग्रामिंग उपलब्ध करवाना चाहिए।' बताया गया है। हाल तक यह कंपनी बीबीसी ट्रस्ट और सरकारी नियामक संस्था Ofcam के द्वारा नियंत्रित होती थी। लेकिन, 2016 में एक स्वतंत्र समीक्षा के बाद ट्रस्ट को 'त्रुटिपूर्ण' मानते हुए भंग कर दिया गया। इसके बाद कहने के लिए एक बीबीसी बोर्ड का गठन जरूर हुआ, लेकिन इसका कंट्रोल पूरी तरह से सरकारी Ofcam के हाथों में दे दिया गया। बोर्ड की जिम्मेदारी रोजमर्रा के कामों तक सीमित कर दी गई।

बीबीसी की कमाई का स्रोत क्या है ?
बीबीसी की ज्यादातर फंडिंग सालाना टेलीविजन फीस से जुटाई जाती है, जो टेलीविजन के लाइव प्रसारण के लिए ब्रिटिश संस्थाओं से मिलती है। इसके अलावा बीबीसी स्टूडियोज और बीबीसी स्टूडियोवर्क्स से भी इसकी कमाई होती है। 2022 में जब ब्रिटेन की सरकार ने अगले दो साल तक इसकी सालाना फीस फ्रीज करने का ऐलान किया तो इसके सामने मुश्किलें पैदा हो गईं। यही नहीं सरकार ने यह भी कहा कि 2027 तक वह फीस की व्यवस्था पूरी तरह से खत्म कर देगी। गार्डियन में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, 'वैसे बीबीसी को लाइसेंस फीस के तौर पर 3.2 अरब पाउंड मिलता रहेगा, लेकिन मुद्रास्फीति के चलते प्रोग्राम बनाने की लागत बढ़ती जा रही है और नेटफ्लिक्स से भी प्रतियोगिता है। इसकी वजह से अपना हिसाब-किताब ठीक रखने के लिए कॉर्पोरेशन को खर्च में लाखों पाउंड की कटौती करनी होगी।'

बीबीसी और ब्रिटिश सरकार का रिश्ता
वैसे तो बीबीसी को अपने काम की गतिविधियों में पूरी तरह से स्वतंत्रता दी गई है और उसमें संसद का कोई दखल नहीं रहता। लेकिन, कई बार सांसदों को खासकर कंजर्वेटिव पार्टी के एमपी से इससे उलझते देखा गया है। दक्षिणपंथियों की ओर से इस पर दशकों से 'लिब्रल' और वामपंथियों के प्रति 'पक्षपात' करने के आरोप लगते रहे हैं। जब मार्गरेट थेचर प्रधानमंत्री थीं तो उनकी पार्टी के सदस्यों ने सार्वजनिक रूप से 'उनके खिलाफ पक्षपाती' होने का आरोप लगाया था। 2016 में 'Brexit-विरोधी' कवरजे को लेकर भी यह आरोपों के घेरे में रहा।

बीबीसी और पक्षपात
2020 में जब टिम टेवी बीबीसी के डायरेक्टर जनरल बने तो उन्होंने 'पूर्वाग्रही' कर्मचारियों से कहा कि या तो बदलें या फिर छोड़ दें। बीबीसी कर्मचारियों को दिए एक बयान में उन्होंने कहा था, 'अगर आप एक विचारक स्तंभकार या सोशल मीडिया पर पक्षपात करने वाला कैंपेनर बनना चाहते हैं तो यह एक सही विकल्प है, पर तब आपको बीबीसी में काम नहीं करना चाहिए।' दो साल बाद बीबीसी के चेयरमैन रिचर्ड शार्प ने भी माना कि 'बीबीसी में एक लिब्रल बाइअस है'। ऐसा नहीं है कि बीबीसी पर ऐसे आरोप सिर्फ दक्षिण पंथियों ने लगाए हैं। 2019 के आम चुनावों के दौरान लेबर पार्टी के पूर्व चीफ जेरेमी कॉर्बिन के समर्थकों ने भी इसपर बोरिस जॉनसन का पक्ष लेने का आरोप लगाया था।












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