युगांडा में कौन लाया था भारतीयों के लिए 'बुरे दिन'?

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लगभग छह साल पहले बीबीसी रेडियो लेस्टर की जर्नलिस्ट रुपल रजनी ने युगांडा में सत्तर के दशक में भारतीयों के साथ हुए व्यवहार पर ये संस्मरणात्मक लेख लिखा था.


अफ़्रीकी देश युगांडा का तानाशाह ईदी अमीन याद है आपको? कैसी कैसी डरावनी कहानियाँ सुनी हैं हम सबने उसके बारे में.

वही ईदी अमीन जिसने एशियाई मूल के लोगों को अपने देश से निकाल दिया था. इनमें से अधिकांश लोग भारतीय थे.

लेकिन अब ईदी अमीन का ज़माना बीते भी एक ज़माना बीत चुका है. आपके ज़हन में भी आ रहा होगा कि क्या किया होगा लोगों ने निकाले जाने के बाद.

वो एशियाई या भारतीय लोग कहाँ होंगे, कैसे होंगे?

मेरे मन में भी ऐसे ही सवाल उभरते थे, हालांकि मेरा परिवार भी उन्हीं परिवारों में से एक था जिन्हें ईदी अमीन ने निकाल दिया था.

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उम्मीदें और स्मृतियां

जब में एंडेबी एयरपोर्ट पर उतरी तो मुझे नहीं मालूम था कि मेरी यात्रा में मेरा किन चीज़ों से सामना होगा.

मैं काकिरा जा रही थी जहां स्थित गन्ने के खेतों के बीच मेरा जन्म हुआ था.

मुझे उम्मीद थी कि मैं उन लोगों को मिलूंगी जिन्हें मेरे परिवार के वहां होने की याद है.

हमारे परिवार को 1972 में ईदी अमीन ने युगांडा से बाहर भेज दिया था. मैं उस वक्त सिर्फ़ दो साल की थी और मुझे ज़्यादा कुछ याद नहीं है.

इसलिए मैं अपने इतिहास के बिंदुओं को जोड़ने के लिए दूसरों पर निर्भर थी.

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युगांडा से देश निकाला

युगांडा के नेता ईदी अमीन ने अगस्त 1971 में सभी एशियाई मूल के लोगों को देश छोड़ने को कहा था.

आदेश था कि जो भी एशियाई युगांडा का नागरिक नहीं है वो तीन महीने के अंदर देश छोड़ दे. ऐसा लोगों की संख्या 60 हज़ार थी.

इनमें 30 हज़ार के पास दोहरी ( युगांडा और ब्रिटेन) नागरिकता थी और दोहरी नागरिकता वाले सभी लोग ब्रिटेन पहुंचे.

सभी को ब्रिटेन में पनाह दी गई. लेकिन मैंने जो कुछ काकिरा में पाया उसने मेरी भावनाओं को निचोड़ कर रख दिया.

मैं पहली बार उस दुकान पर गई जिसे मेरे पिता चलाते थे. हमारे जाने के बाद ये बंद हो गई थी और इसे करीब छह साल पहले दोबारा खोला गया है.

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नहीं जाते तो क्या होता?

ये बयान करना मुश्किल है कि मेरे दिल पर उस दुकान में घुसने के बाद क्या गुज़री. लगातार बहते आंसू सब कुछ कह रहे थे.

मैं कल्पना कर रही थी कि मेरे पिता यहीं इस काउंटर पर बैठते होंगे. मुझे लगा कि दुकान की बनावट अब भी वैसी ही है जैसी सत्तर के दशक में रही होगी.

आपके सुनकर ये बात बेवकूफाना लगेगी लेकिन मुझे तो लगा कि मेरे पिता वहीं मौजूद हैं.

तभी मेरे दिल में ये सवाल उठा, अगर हमें युगांडा छोड़ने पर मजबूर नहीं किया गया होता तो हमारी ज़िंदगी कैसी होती?

और इसी सवाल ने और कई मुश्किल सवालों को जन्म दिया. जैसे कि हमें निकाला ही क्यों गया था? और क्या हमारे साथ सही हुआ था?

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युगांडा की अर्थव्यवस्था

कुछ लोगों का तर्क रहा है कि उस समय के युगांडा में एशियाई लोगों और स्थानीय युगांडावासियों के बीच बड़ी असमानताएं थीं.

हमें ये तो मालूम ही है कि 1972 से पहले युगांडा की 90 प्रतिशत अर्थव्यवस्था पर एशियाई लोगों का कब्ज़ा था.

तो क्या वे स्थानीय लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करते थे या सिर्फ़ उनका शोषण कर रहे थे?

युगांडा वासी एशियाई मूल के लोगों से आमतौर पर कम कामयाब थे. अगर मैं यही रहती तो मुझे नहीं मालूम ये बात मुझे कैसे लगती.

ईदी आमिन ने 1972 में सभी एशियाई मूल के लोगों को यूगांडा छोड़ने का आदेश दिया था.

गन्ने की खेती

अपनी यात्रा के दौरान मैंने ये सवाल कई लोगों से किए.

इन्हीं में से एक है माधवानी परिवार, जिन्होंने वापस लौटकर काकिरा में युगांडा की सबसे सफल गन्ने की खेती दोबारा शुरू की है.

लेकिन मुझे इस विषय पर आम राय नहीं मिली. सच पूछिए तो मुझे इसकी उम्मीद भी नहीं थी.

ब्रिटेन से युगांडा लौटे यास्मिन अलीभाई-ब्रॉउन जैसे लोगों का मत था कि एशियाई लोग युगांडावासियों को अपने बराबर का नहीं समझते थे और वो नस्लवादी थे.

लेकिन कुछ का ये भी कहना था कि एशियाई लोगों के निकलने के बाद युगांडा की अर्थव्यवस्था का ध्वस्त होना उनके महत्त्व को दर्शाता है.

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सकारात्मक सोच रखते हैं...

फ़िरोज़ और उनकी पत्नी उसी दुकान को चलाते हैं जिसे मेरे पिता छोड़कर चले गए थे. ये परिवार भारत से यहां आया है.

वही सपने लेकर जिनके साथ मेरा परिवार यहां पहुंचा था. उनकी उम्मीदें और सपने भी एक जैसे ही हैं.

जब मैंने फ़िरोज़ से अश्वेत समुदाय और एशियाई लोगों के बीच संबंधों के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि सब बढ़िया है.

फ़िरोज़ और उनकी पत्नी अपने नए घर के बारे में सकारात्मक सोच रखते हैं. उन्हें अपना लाइफ़ स्टाइल पसंद है और उन्हें यहां के लोग और मौसम भी भा रहा है.

मैंने यही सवाल उन एशियाई लोगों से भी जिन्हें सत्तर के दशक में देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया था और जो अब वापस लौट आए हैं.

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सत्तर के दशक में...

जिंजा के जिस गेस्ट हाउस में हम रह रहे थे उसे वापिस लौटकर आए सत्तर के दशक के निर्वासित परिवार का एक व्यक्ति चला रहा था.

सुरजीत भार्ज कहते हैं कि मीठी यादों ने उनके वापस लौटने के फैसले को प्रभावित किया.

साथ ही वे ब्रिटेन में अपनी ज़िंदगी से खुश नहीं थे और एक नई शुरुआत करना चाहते थे. तो क्या वे स्थानीय लोगों को अपने बराबर मानते हैं?

झट से जवाब आया - बिलकुल. उन्होंने बताया कि वो अपने कर्मचारियों से लोगों के साथ बिना रंग की परवाह किए बराबरी का व्यवहार करने की शिक्षा देते हैं.

युगांडा में एशियाई लोगों के प्रति ये शिकायत रही है कि वो इस देश के लिए कुछ नहीं करते.

बराबरी का सुलूक

तो क्या सुरजीत भार्ज युगांडा के लिए कुछ करते हैं? उनका जवाब है कि वो काफ़ी कुछ करते हैं.

उनकी पत्नी एक अनाथालय चलाती है जहां युगांडा के लावारिस बच्चों को पनाह दी जाती है.

उनका कहना है कि सीधे भारत से आने वाले नए लोगों में युगांडा और यहां कि बाशिदों के प्रति अच्छी समझ है और वो उनके साथ बराबरी का सलूक भी करते हैं.

लेकिन क्या अब युगांडा ही उनका घर बन गया है?

वो कहते हैं, "स्थाई घर नहीं. ये डर हमेशा लगा रहता है कि जो कुछ 1972 में हुआ वो कहीं दोबारा ना हो जाए."

डर है लेकिन ज़िंदगी चल रही है.

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