भारत विभाजन: जब एक मुस्लिम अफ़सर ने सिख परिवार की जान बचाने के लिए क़ुरान की क़सम खाई
भारत के बंटवारे से पहले लाहौर की एक स्थानीय मस्जिद के इमाम ने एक सरकारी अधिकारी से पूछा कि कई दिनों से इलाक़े में ख़बर चल रही है कि आपने अपने घर में किसी को पनाह दी हुई है. कौन है वो?
तो जवाब मिला कि वह मेरा भाई और उसका परिवार है.
मस्जिद के इमाम को उनकी बात पर शक हुआ और उन्होंने क़ुरान मंगाकर उस अधिकारी से कहा कि इसकी क़सम खाओ कि आपके घर में आपका भाई और उनका परिवार रह रहा है. जिस पर सरकारी अधिकारी क़ुरान की क़सम खाते हैं कि जिसे मैंने घर में पनाह दी है वह मेरा भाई है.
भारत के विभाजन के समय, हिंदू, सिख और मुसलमान, वर्तमान पाकिस्तान और भारत में, जहां जहां भी वे अल्पसंख्यक थे बहुसंख्यकों के प्रकोप का शिकार हुए थे. बलवाइयों के जत्थे अपने-अपने इलाक़ों से प्रवास करने वालों पर हमला करते थे. कुछ खुशनसीब प्रवासी अपने इलाक़ों को छोड़कर सही सलामत ज़िंदा विस्थापन करने में सफल रहे और कई को अपनी जान और माल गंवाना पड़ा.
जहां ज़्यादातर लोग अल्पसंख्यकों पर हमला कर रहे थे, वहीं कई ऐसी घटनाएं भी मौजूद हैं जिनमें हिंदुओं और सिखों ने मुसलमानों की जान-माल की रक्षा की और मुसलमानों ने अपनी जान जोखिम में डालकर हिंदुओं और सिखों की मदद की.
जब क़िस्से-कहानियों में बदली असली घटना
लाहौर की घटना के बारे में कई सालों से भारत और फिर अमेरिका में ज़बानी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को बताया जाता रहा है, जिसमें एक मुस्लिम सरकारी अधिकारी क़ुरान की क़सम खाता है कि उनके घर में उनका भाई अपने परिवार के साथ रह रहा है.
इस घटना के बारे में अमेरिका में रहने वाले डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया को उनकी दादी ने बताया था.
डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया ने अपने बचपन में इस घटना के बारे में इतनी बार सुना था कि उनको इसके सारे किरदार, इलाक़े और दृश्य ज़बानी याद हो गए थे. कई साल बाद वह इस घटना की पृष्ठभूमि और अन्य घटनाओं को जानने के लिए कई बार पाकिस्तान के पंजाब, लाहौर और गुजरांवाला का दौरा कर चुके थे.
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डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया का कहना है कि जिसने क़सम खायी थी उसने झूठी क़सम नहीं खायी थी, बल्कि उसने क़ीमती इंसानी ज़िन्दगियों को बचा कर इंसानियत को ज़िंदा किया था और जिस व्यक्ति के लिए उन्होंने क़सम खायी थी वह वास्तव में उनका भाई था. वे आपस में भाई बने हुए थे. क़सम खाने वाले ने जिसको भाई बनाया था अपनी जान जोखिम में डालकर उसकी रक्षा की थी.
इससे पहले कि हम भारत के विभाजन की इस घटना के बारे में और अधिक जाने उससे पहले ये देखते हैं कि डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया और उनका परिवार कौन है.
बोताला का जमींदार परिवार
डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया का परिवार विभाजन के समय गुजरांवाला से भारत आया था. डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया कई सालों से अमेरिका में रह रहे हैं.
डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया के पूर्वज पंजाब के शासक महाराजा रणजीत सिंह के दरबार से जुड़े हुए थे. विभाजन से पहले, उन्हें क्षेत्र का बहुत बड़ा जागीरदार माना जाता था. गुजरांवाला के बोताला गांव में उनकी ज़मीन थी. इसलिए डॉक्टर तरुणजीत सिंह आज भी अपने नाम के साथ बोतालिया लगाते हैं.
भारत के विभाजन के बाद भी, पाकिस्तान में कई सैन्य और नागरिक अधिकारियों के परिवारों के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध थे.
डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया के दादा कैप्टन अजीत सिंह लाहौर के एचिसन कॉलेज के छात्र थे. बहावलपुर के पूर्व नवाब, नवाब सादिक़ ख़ान, जनरल मूसा ख़ान और अन्य महत्वपूर्ण शख्सियतों के दोस्त और सहपाठी थे, जबकि उनकी दादी नरेंद्र कौर इलाक़े की एक प्रसिद्ध राजनीतिक और सामाजिक शख्सियत थीं.
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डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया कहते हैं कि मेरी दादी मुझे हमेशा भारत के विभाजन के समय की कहानियां सुनाती थीं. वह कहती हैं कि जब विभाजन का समय आया और दंगे भड़क उठे, तो उस समय लाहौर में रहने वाले एक मुस्लिम सरकारी अधिकारी और उनकी पत्नी ने उन्हें दो महीने तक पनाह दी थी.
उस दौरान पनाह देने वाले परिवार ने न केवल ख़ुद मुश्किलों का सामना किया था बल्कि उस परिवार ने इंसानियत की वो मिसाल क़ायम की थी जिस पर मैंने न केवल एक किताब लिखी है बल्कि उस परिवार को खोजने के लिए कई साल तक कोशिश करता रहा.
किताब अहसान करने वालों से संपर्क का ज़रिया बनी
डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया कहते हैं कि मैंने अपने शोध और अपने पूर्वजों से जो कुछ सुना उसके आधार पर एक किताब लिखी. इस किताब के लिए शोध करते हुए मैंने लाहौर, गुजरांवाला और बोताला में अपने पूर्वजों की हवेली का भी दौरा किया. मुझे यह देखकर बहुत ख़ुशी हुई कि वहां अब लड़कियों का स्कूल है.
वो कहते हैं कि, "मैंने अपनी किताब में अपने पूर्वजों से सुनी हुई कहानियां लिखी थीं. ये किताब लाहौर में मौजूद एक प्रोफ़ेसर कैलाश ने पढ़ी. प्रोफ़ेसर कैलाश ख़ुद भी एक इतिहासकार और शोधकर्ता हैं.
वो कहते हैं कि जब मैं उनसे मिला तो किताब में लिखी घटनाओं के आधार पर उन्होंने मुझे बताया कि यह परिवार मुस्लिम लीग के सांसद महमूद बशीर वर्क का परिवार है.
डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया ने कहा कि इसके बाद मैंने महमूद बशीर अहमद वर्क से संपर्क किया. उन्हें इस पूरी कहानी के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी, सिवाय इसके कि उनके पूर्वजों ने भारत के विभाजन के दौरान कई हिंदुओं और सिखों की मदद करके उनकी जान बचाई थी.
आंसुओं से होने वाली मुलाक़ात
महमूद बशीर वर्क के साथ मुलाक़ात का वर्णन करते हुए डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया कहते हैं कि जब मैं उनके पास पहुंचा, तो एक सांसद की विनम्रता ने ही मुझे सबसे पहले प्रभावित किया.
"मैंने उनसे पूछा कि क्या आपके परिवार में कोई सरकारी अधिकारी था, तो उन्होंने बताया कि हां, उनके दादा सूबे ख़ान भारत के विभाजन के बाद लाहौर में एक तहसीलदार थे."
"मुझे भी मेरी दादी ने बताया था कि उनके परिवार को पनाह देने वाले परिवार के मुखिया टैक्स विभाग में एक सरकारी कर्मचारी थे. फिर मैंने उनसे पूछा कि आमना बेगम कौन थीं. यह सुनते ही बशीर वर्क की आंखों में आंसू आ गए थे."
उन्होंने कहा, कि "जब मैं अपने दादा-दादी की मदद करने और उन्हें बचाने वालों और उन पर अहसान करने वालों के बच्चों से मिला, तो मेरी आंखों में अपने आप आंसू आ गए थे. महमूद बशीर वर्क का भी यही हाल था. वे महान लोग थे, जिन्होंने दूसरों को बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी थी."
'अगर मेरे दादा-दादी जीवित नहीं होते, तो ज़ाहिर है मैं और मेरा परिवार भी इस दुनिया में नहीं होता.'
डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया कहते हैं कि मेरी दादी ने मुझे बताया था कि सूबे ख़ान हमारे पारिवारिक मित्र थे. जब दंगे भड़के, तो सूबे ख़ान और उनकी पत्नी ने हमें बहुत ही अवसाद की स्थिति में लाहौर में अपने घर में पनाह दी थी.
उन्होंने कहा कि ये ऐसे हालात थे जब आज के पाकिस्तान और भारत में मौजूद बहुसंख्यक, अल्पसंख्यकों को ढूंढ ढूंढ कर नुकसान पहुंचा रहे थे. स्थिति ऐसी थी कि दोनों तरफ़ मौजूद बहुसंख्यकों के लिए भी किसी अल्पसंख्यक को पनाह देना संभव नहीं रहा था.
डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया कहते हैं कि मेरे दादा-दादी दो महीने तक लाहौर में सूबे ख़ान के सरकारी आवास में छिपे रहे थे. इस बीच, आस-पड़ोस में यह बात फैल गई कि सिखों या हिंदुओं ने सूबे ख़ान के यहां शरण ली हुई है, तो स्थानीय मस्जिद के इमाम ने सूबे ख़ान से पूछताछ की थी.
सूबे ख़ान ने झूठी क़सम नहीं खायी थी. उन्होंने मेरे दादा को भाई बनाया हुआ था. दो महीने तक अपने भाइयों से बढ़कर उन्होंने उनकी रक्षा की थी. यहां तक कि उन्होंने सिखों की धार्मिक परंपराओं का भी ख़्याल रखा था.
घर में दो तरह का खाना बनता था
डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया कहते हैं कि मेरी दादी बताती हैं कि जब हमने अपनी हवेली छोड़ी थी तो मेरे एक चाचा ढाई महीने के थे और दूसरे चाचा केवल ढाई साल के थे. भीषण गर्मी में वो लोग किसी तरह से लाहौर पहुंचे थे.
वो बताते हैं कि उनकी दादी कहती थीं कि जब वे लाहौर पहुंचे तो उन्हें ऐसा लगा जैसे वह सुरक्षित हाथों में पहुंच गए हैं. सूबे ख़ान की पत्नी और महमूद बशीर अहमद वर्क की दादी मेरे दोनों चाचाओं की देखभाल अपने बच्चों की तरह करती थीं.
डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया के मुताबिक़, दादी दोनों बच्चों को अपने पास सुलाती थीं. वह उनका हर तरह से ख्याल रखती थीं. यहां तक कि मेरे दादा-दादी के कपड़े भी धो देती थीं. वे जो कुछ भी कर सकते थे उससे भी बढ़ कर करती थीं.
डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया का कहना है कि सहिष्णुता इतनी अधिक थी कि मुसलमानों के घर में उनके धर्म और तरीक़े के अनुसार हलाल खाना बनाया जाता था, जबकि हमारे दादा-दादी के लिए हमारी धार्मिक परंपराओं के अनुसार खाना बनाया जाता था.
इसलिए जब मैं अपने अहसानमंदों के गांव में उनके पूर्वजों की क़ब्रों पर गया, तो मैंने वहां पर माथा नहीं टेका बल्कि प्यार और भक्ति में उनकी क़ब्रों को चूम कर उन महान लोगों को श्रद्धांजलि दी.
गांव जहां सिख और हिंदू सुरक्षित रहे
मुस्लिम लीग (नवाज़) के नेशनल असेंबली के सदस्य महमूद बशीर वर्क ने कहा कि डॉक्टर तरुणजीत सिंह बोतालिया से मिलने से पहले उन्हें उनके परिवार के साथ हुई घटनाओं के बारे में कुछ नहीं पता था. लेकिन यह ज़रूर पता था कि हमारे पूर्वजों ने भारत के विभाजन के दौरान अपने कर्तव्य को निभाते हुए हिंदुओं और सिखों की जान बचाने में भूमिका निभाई थी.
"जब भारत का विभाजन हुआ था उस समय मैं छोटा था लेकिन उस समय की यादें आज भी ताज़ा हैं. हमारे गांव इब्ने वाला और आसपास के गांवों, देहात में बड़ी संख्या में सिख और हिंदू रहते थे. सिखों के पास ज़मींदारी थी. उनमें बड़े बड़े ज़मींदार भी शामिल थे, जबकि हिंदू व्यापार करते थे, ज़्यादातर साहूकारी यानी ब्याज पर क़र्ज़ देने का काम करते थे."
उन्होंने कहा कि हमारे आसपास के गांवों में ज़्यादा मुसलमान थे, लेकिन सब मिलजुल कर रहते थे. आपस में भाईचारा था. हमारा परिवार और बिरादरी भी इलाक़े में ज़मींदारी करते थे. मेरे पिता बशीर अहमद वर्क इसकी देखभाल करते थे जबकि मेरे दादा चौधरी सूबे ख़ान तहसीलदार थे.
महमूद बशीर वर्क ने कहा कि 'जैसे-जैसे विभाजन के दिन नज़दीक आ रहे थे, तनाव बढ़ता जा रहा था. मैं देख रहा था कि मेरे पिता थोड़े चिंतित रहते थे. गांव के लोगों के साथ ज़्यादा से ज़्यादा बात करते थे. अब वे हमेशा अपने हथियार अपने साथ रखते थे. यह एक बारह बोर की बंदूक़ और एक रिवॉल्वर थी. उन दिनों रिवॉल्वर ऐसी ही था जैसे आज कल एटम बम.'
महमूद बशीर वर्क ने कहा कि 'जब विभाजन के दिन बिलकुल नज़दीक आ गए और विभाजन की घोषणा हो गई, तो उस समय ऐसी ख़बरें सुनने में आ रही थीं कि लूट का बाज़ार गर्म हो चुका है, हिंदू, मुस्लिम और सिख लड़ रहे हैं. इस स्थिति में, मेरे पिता ने गाँव में एलान किया कि हमारे गाँव में रहने वाले हिंदुओं और सिखों को कोई भी नुक़सान नहीं पहुंचाएगा. उनकी जान माल और इज़्ज़त की रक्षा हमारी ज़िम्मेदारी होगी.'
'पिता जी ने बाक़ायदा पहरेदारी की व्यवस्था की थी जहां मुसलमान तो होते ही थे, अगर सिख हमला करने की कोशिश करते तो गाँव के सिख भी लड़ने के लिए तैयार होते थे.'
सिख मुक़ाबले के लिए बाहर निकल आये
महमूद बशीर वर्क ने कहा कि एक बार यह अफ़वाह फैल गई कि आसपास के गांवों के सिख हमारे गांव पर हमला कर सकते हैं. उनका सामना करने के लिए गांव के लोग इकट्ठा हो गए. सभी ने बंदूकें, कुल्हाड़ी और लाठी इकट्ठे करने शुरू कर दिए थे.
उन्होंने कहा कि उस समय हमारे गांव के सिख भी पूरी तैयारी के साथ मौक़े पर पहुंच गए. उन्होंने कड़े पहने हुए थे. उनकी किरपाण और दूसरे हथियार भी उनके पास थे. सिखों ने कहा कि अगर सिख इस गांव पर हमला करेंगे, तो उन्हें पहले हमारा सामना करना होगा.
"इसके बाद क्या हुआ मुझे याद नहीं है. लेकिन फिर ये हुआ कि आस-पास के गांवों के हिंदूओं और सिखों ने भी हमारे गांव में शरण लेनी शुरू कर दी."
महमूद बशीर वर्क के अनुसार, मुझे याद है और मैंने देखा था कि कुछ महिलाओं और बच्चों ने हमारे घर में शरण ली थी. उनकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी मेरी मां आमना बेगम की थी. वो पूरी रात अपने पास ख़ंजर रख कर दरवाज़े पर पहरा देती थीं.
उन्होंने कहा कि उनमें दो अनाथ बच्चे भी शामिल थे. मुझे नहीं पता कि वो हिंदू थे या सिख लेकिन मां उन्हें अपने साथ रखती थीं. वह उनकी देखभाल बिलकुल एक मां की तरह करती थीं.
हमारे गांव में यह भी पाबंदी थी कि हमारे गांव का कोई व्यक्ति लूटपाट में शामिल नहीं होगा.
लूटे गए माल को बरामद कर कोषागार में जमा कराया गया
महमूद बशीर वर्क ने कहा कि स्थिति यह थी कि हमारे गांव में तो पूरी तरह से शांति थी लेकिन हमारे गांव के आसपास से दंगों और लूटपाट की ख़बरें रोज़ाना आ रही थीं. एक दिन पता चला कि हमारे गाँव का एक व्यक्ति दूसरे गाँव में गया था और लूट में शामिल हुआ था.
इस पर पिता जी ने गाँव वालों के साथ मिलकर तत्काल कार्रवाई करते हुए, उसके घर से लूटे गए माल को बरामद कर कोषागार में जमा करा दिया था.
उन्होंने कहा कि पाकिस्तान और भारत के अस्तित्व में आने के बाद कई दिनों तक हिंदुओं और सिखों की रक्षा की गई. हिंदू और सिख भारत जाना चाहते थे. पिता जी ने उन्हें सुरक्षित रूप से शरणार्थी शिविर में पहुँचाया, उनमें से कई को ट्रेन में बैठाया और उनके घरों और पशुओं की रक्षा करते रहे.
मुझे अच्छी तरह याद है कि पिता जी एक-एक से गले मिल कर अलविदा कह रहे थे. उन्हें आश्वासन दे रहे थे कि उनकी संपत्ति की रक्षा की जाएगी और अगर हालात अच्छे हुए और वो वापस आये तो उनकी अमानत उन्हें वापस कर दी जाएगी.
महमूद बशीर वर्क ने कहा कि कुछ परिवार बंटवारे के दौरान चले गए और कुछ परिवारों ने बंटवारे के कई महीने बाद इलाक़ा छोड़ा, लेकिन जाने वाले वापस नहीं आये. इसी तरह, जब भारत से मुस्लिम शरणार्थी आए, तो यहां से चले गए हिंदुओं और सिखों की ज़मीन जायदाद, उन लोगों के हिस्से में आई थी, जिनसे उन लोगों का रोज़गार चला था.
'मेरे पिता जीवन के अंतिम दिनों में अक्सर मुझसे कहते थे कि मेरी बख़्शीश इंसानी जानों की रक्षा की वजह से होगी.'
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