कोरोना वायरस के बाद कैसी होगी दुनिया? क्या बढ़ेगी तानाशाही?
कोविड-19 संक्रमण से लड़ने के लिए दुनिया भर के लोग और सरकारें जो रास्ता चुनेंगे वह आने वाले सालों में हमारी दुनिया को बदल देगा. यह मानना है बाइ सेपियन्स- ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ हम्यूमनकाइंड के लेखक इतिहासकार युवाल नोआह हरारी का.
इस महामारी के बाद किस तरह का समाज उभरेगा? क्या दुनिया के देशों में आपसी एकजुटता बढ़ेगी या एक दूसरे से दूरी बढ़ेगी? अंकुश लगाने और निगरानी रखने के तौर तरीक़ों से नागरिकों को बचाया जाएगा या उनका उत्पीड़न होगा?
बीबीसी के न्यूऑवर प्रोग्राम में हरारी ने इन सवालों पर कहा, "संकट ऐसा है कि हमें कुछ बड़े फ़ैसले लेने होंगे. ये फ़ैसले भी तेजी से लेने होंगे. लेकिन हमारे पास विकल्प मौजूद है."
राजनीतिक' संकट
हरारी ने कहा, "हमारे पास दो अहम विकल्प हो सकते हैं- इस संकट का सामना हम राष्ट्रवादी अलगाव से करेंगे या फिर फिर वैश्विक साझेदारी और एकजुटता प्रदर्शित करते हुए करेंगे."
"प्रत्येक राष्ट्र के स्तर पर भी हमारे सामने विकल्प मौजूद हैं. सर्वधिकार संपन्न केंद्रीकृत निगरानी व्यवस्था (पूरी तरह सर्विलेंस व्यवस्था) और सामजिक एकजुटता वाले नागरिक सशक्तीकरण में से एक को चुनना है.''
हरारी के मुताबिक़ कोरोना वायरस महामारी ने वैज्ञानिक और राजनीतिक दोनों तरह के सवालों को जन्म दिया है.
उनके मुताबिक़ दुनिया कुछ वैज्ञानिक चुनौतियों को हल करने की कोशिश तो कर रही है लेकिन राजनीतिक समस्याओं की ओर उसका ध्यान कम ही गया है.
उन्होंने कहा, "महामारी को रोकने और हराने के लिए मानवता के पास वह सब कुछ है जिसकी ज़रूरत है."
"यह कोई मध्यकालीन समय नहीं है. यह प्लेग वाली महामारी भी नहीं है. ऐसा भी नहीं है कि लोग मर रहे हैं और हमें मालूम ही नहीं हो कि वे क्यों मर रहे हैं और क्या करना चाहिए."
चीन के वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस संक्रमण फैलने के दौरान ही सार्स-कोव-2 वायरस की पहचान कर उसे मैप कर लिया. दूसरे देशों में भी इसी तरह की जांच चल रही है.
अब तक कोविड-19 संक्रमण का कोई इलाज नहीं मिला है. हालांकि दुनिया भर के रिसर्चर अत्याधुनिक तकनीक और इनोवेशन के ज़रिए इस वायरस का टीका विकसित करने में जुटे हैं.
हमलोगों को यह भी मालूम हो चुका है कि हाथ धोते रहने और सोशल डिस्टेंसिंग से वायरस के संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता है.
हरारी ने बीबीसी के न्यूजऑवर प्रोग्राम में कहा, "इस वायरस को हम लोग पूरी तरह समझ चुके हैं. हमारे पास तकनीक भी है. इस वायरस को हराने के लिए हमारे पास आर्थिक संसाधन भी मौजूद हैं. लेकिन सवाल यही है कि हम इन ताक़तों का इस्तेमाल कैसे करते हैं? यह निश्चित तौर पर एक राजनीतिक सवाल है."
ख़तरनाक तकनीक का इस्तेमाल
हरारी ने हाल ही में फाइनेंशियल टाइम्स में लिखे अपने एक लेख में कहा है कि इमर्जेंसी ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को फास्ट फॉरर्वर्ड कर देती है. आम तौर पर जिन फ़ैसलों को करने में सालों का वक़्त लगता है उन फ़ैसलों को रातोरात करना होता है.
इसी लेख में उन्होंने लिखा है कि इमर्जेंसी के वक़्त में ख़तरनाक तेज़ी से विकसित हो रहीं निगरानी तकनीकों को समुचित विकास और सार्वजनिक बहस के बिना भी काम पर लगा दिया जाता है.
हरारी के मुताबिक़ सरकार के अंदर भी यह तकनीकें ग़लत हाथों में इस्तेमाल हो सकती हैं. सरकार पूरी तरह से निगरानी की व्यवस्था लागू कर सकती हैं, जिसमें हर आदमी पर हर पल नज़र रखी जा सकती है और अपारदर्शी ढंग से फ़ैसले कर सकती है.
उदाहरण के लिए इसराइल की सरकार ने सीक्रेट सर्विसेज की ताक़त को बढ़ाया दिया है. इसके ज़रिए ना केवल वे स्वास्थ्य अधिकारियों पर नज़र रख रहे हैं बल्कि हर शख्स के लोकेशन डेटा पर नज़र रखी जा रही है. इसे दक्षिण कोरिया में भी लागू किया गया है लेकिन हरारी के मुताबिक दक्षिण कोरिया में इसे कहीं ज़्यादा पारदर्शिता के साथ लागू किया गया है.
दुनिया की अत्याधुनिक निगरानी व्यवस्था वाले देशों में शामिल चीन में क्वारंटीन को उल्लंघन करने वाले नागरिकों की पहचान के लिए चेहरा पहचान वाली तकनीक का इस्तेमाल किया गया है.
हरारी के मुताबिक़ थोड़े समय के लिए इन तकनीकों के इस्तेमाल को मान्य माना जा सकता है लेकिन इन्हें स्थायी करने के कई ख़तरे हैं.
हरारी ने बीबीसी के कार्यक्रम में कहा, "स्वास्थ्य हो या फिर आर्थिक मसले हों, सरकारें निर्णायक फ़ैसले ले सकती हैं, कड़े क़दम उठा सकती हैं. मैं इसके पक्ष में हूं लेकिन यह वैसी सरकारों को करना चाहिए जो पूरी आबादी का प्रतिनिधित्व करती हों."
"आम तौर पर, 51 प्रतिशत आबादी के समर्थन से सरकारें बन सकती हैं. लेकिन ऐसे मुश्किल वक़्त में सरकारों को पूरे देश यानी प्रत्येक नागरिक का ख्याल रखना चाहिए.''
अलगाववाद और आपसी सहयोग
हरारी के मुताबिक़, "हाल के सालों में राष्ट्रवाद और लोकलुभावन वादों की लहरों पर सवार सरकारों ने समाज को दो शत्रुता रखने वाले शिविरों में बाँट दिया है. विदेशियों और दूसरे देशों के प्रति नफ़रत को बढ़ावा दिया है."
लेकिन दुनिया भर में फैलने वाली महामारी, सामाजिक समूहों और देशों में कोई भेदभाव नहीं करतीं.
हरारी कहते हैं कि मुश्किलों का सामना करते हुए यह तय करना होगा कि अकेले चलना है या सहयोग से चलना है.
दुनिया के कई देशों ने इस महामारी से निपटने की अकेले कोशिश की है, वे ऐसा चिकित्सीय सुविधाओं और प्राइवेट फर्म से मिलने वाली आपूर्तियों के ज़रिए कर रहे हैं. दूसरे देशों को मास्क, रसायन और वेंटिलेटर की आपूर्ति कम करने के लिए अमरीका की ख़ासतौर पर आलोचना भी हुई है.
आशंका जताई जा रही है कि अमीर देशों की प्रयोगशालाओं में तैयार टीके विकासशील और ग़रीब मुल्कों में पर्याप्त संख्या में नहीं पहुंच पाएंगे.
हरारी इस दौर में आपसी सहयोग के महत्व को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि सुबह में चीनी वैज्ञानिकों ने कोई सबक सीखा हो तो उससे शाम में तेहरान में किसी मरीज़ की जान बचाई जा सकती है.
हरारी के मुताबिक़, "दुनिया भर में आपसी सहयोग की मज़बूती, जानकारी और सूचनाओं का एक्सचेंज और महामारी से प्रभावित देशों में मानव एवं मेडिकल संसाधानों का निष्पक्ष वितरण कहीं ज़्यादा तर्कसंगत हैं."
हरारी कहते हैं, "आख़िरी बार महामारी के वक़्त लोगों ने ख़ुद को अलग-थलग रखकर कब अपना बचाव करने में सफल रहे थे, यह पता लगाने के लिए वास्तविकता में आपको फिर से पाषाणकालीन युग में ही जाना होगा. मध्यकालीन युग में भी 14वीं शताब्दी प्लेग की महामारी फैली थी. मध्यकालीन युग में जाने से भी बचाव संभव नहीं होगा."
सामाजिक व्यवहार को भी बदलेगा?
हरारी के मुताबिक़ महामारी से निपटने के लिए चुने गए विकल्पों का जो भी असर हो, मनुष्य की समाजिकता में बदलाव नहीं होगा, मनुष्य एक समाजिक प्राणी है और रहेगा.
इंसानों की प्रकृति बीमारों के नज़दीक जाने और उससे करुणा जताने की रही है. हरारी के मुताबिक़ कोरोना वायरस इंसानों के सबसे अच्छी प्रकृति का शोषण कर रहा है.
हरारी कहते हैं, "यह वायरस हमें संक्रमित करने के लिए, हमारी अच्छी प्रकृति का शोषण कर रहा है. लेकिन हमें स्मार्ट होना पड़ेगा, दिमाग़ से सोचना होगा, दिल से नहीं और सामाजिक अलगाव, सोशन डिस्टेंसिंग का रास्ता चुनना होगा."
"हम सब सामाजिक प्राणी के लिए ऐसा करना बेहद मुश्किल है. लेकिन मेरा ख्याल है कि जब यह संकट दूर होगा तब लोगों को सामाजिक जुड़ाव की ज़रूरत ज्यादा महसूस होगी. मुझे नहीं लगता है कि यह वायरस इंसानों की मूल प्रकृति को बदल पाएगा."
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