Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

बांग्लादेश के अलग होने की वजह क्या थी- भाषा, संस्कृति, अन्याय या कोई साज़िश?

पाकिस्तानी सेना के जनरल भारत के जरनल के सामने आत्मसमर्पण करते हुए.
Getty Images
पाकिस्तानी सेना के जनरल भारत के जरनल के सामने आत्मसमर्पण करते हुए.

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल मार्च में बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर ढाका दौरे पर थे और तब वहां की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना से मुलाक़ात के दौरान दोनों देश इस बात पर सहमत हुए थे कि वो 6 दिसंबर को 'मैत्री दिवस' मनाएंगे.

इस दिन का महत्व जानने के लिए हमें 50 साल पीछे जाना होगा. भारत ने 6 दिसंबर, 1971 को बांग्लादेश को एक स्वतंत्र देश के तौर पर मान्यता दी थी. हालांकि तब वो पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा था.

उसके केवल 10 दिन बाद पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के कमांडर लेफ़्टिनेंट जनरल अमीर अब्दुल्ला ख़ान नियाज़ी ने भारतीय सेना के लेफ़्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के साथ आत्मसमर्पण के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करके अपनी हार मान ली थी.और इस तरह बांग्लादेश औपचारिक तौर पर दुनिया के नक़्शे पर एक नए देश के रूप में उभरकर सामने आया था.

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि दक्षिण एशिया के देशों में बांग्लादेश के सबसे क़रीबी संबंध भारत के साथ ही हैं. सिर्फ़ व्यापार के स्तर पर बात करें तो दोनों देशों के बीच 10 अरब डॉलर का कारोबार होता है, जो पूरे दक्षिण एशिया में सबसे ज़्यादा है.

पाकिस्तान में पढ़ाई जाने वाली पाठ्य पुस्तकों के अध्ययन से इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि बांग्लादेश और भारत के बीच के इतने घनिष्ठ संबंध और पूर्वी पाकिस्तान के उससे अलग होने के क्या कारण हैं.

भाषा के आधार पर होने वाले दंगे
Getty Images
भाषा के आधार पर होने वाले दंगे

पाकिस्तान के केंद्रीय बोर्ड द्वारा प्रकाशित नौवीं और दसवीं कक्षा की पुस्तकों को यदि देखें तो उनमें कहा गया है कि 'पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान को अलग करने में भारत की भूमिका थी.

इन किताबों में लिखा है कि भारतीय नेतृत्व को पाकिस्तान का बनना पसंद नहीं आया और उन्होंने उपमहाद्वीप के विभाजन के तुरंत बाद पाकिस्तान को तोड़ने की साज़िशें शुरू कर दी थीं.

इन किताबों में आगे यह भी कहा गया है कि पूर्वी पाकिस्तान में बड़ी संख्या में हिंदू रहते थे, जो भारत के प्रति सहानुभूति रखते थे और समय के साथ वहां अलगाववादी तत्वों को पनपने की जगह मिल गई. इसकी वजह से पूर्वी पाकिस्तान के लोग वैसी विचारधारा के शिकार हो गए.

शोधकर्ता और लेखिका अनम ज़कारिया ने इस बारे में अपनी किताब '1971, ए पीपल्स हिस्ट्री फ़्रॉम बांग्लादेश, पाकिस्तान एंड इंडिया' में लिखा कि इन पाठ्य पुस्तकों में सभी बंगाली हिंदुओं को भारत के समर्थक और 'देशद्रोही' के रूप में प्रस्तुत किया गया. इसलिए हैरानी की बात बिल्कुल नहीं है कि पाकिस्तान में एक आम धारणा है कि पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के टूटने का कारण भारत था.

अब जब बांग्लादेश अपनी स्थापना के 50 साल पूरे कर रहा है, तब बीबीसी ने विभिन्न शोध पुस्तकों और शोधकर्ताओं के साथ बातचीत करके ये जानने की कोशिश की कि वे कौन से कारक थे, जिनके चलते अपनी स्थापना के महज़ 24 साल बाद ही पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए. क्या इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था और क्या भविष्य में इन दोनों देशों के ठंडे पड़े रिश्तों में गर्माहट आएगी?

शेख़ मुजीबुर्रहमान
Getty Images
शेख़ मुजीबुर्रहमान

राजकीय भाषा का दर्जा सिर्फ़ उर्दू को देना

अगस्त 1947 में जब पाकिस्तान अस्तित्व में आया तो इसमें दो प्रमुख क्षेत्र- पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान शामिल थे. पूर्वी पाकिस्तान में देश की 56 प्रतिशत आबादी रहती थी, जो बांग्ला भाषा बोलती थी.

वहीं पश्चिमी पाकिस्तान में पंजाबी, सिंधी, बलूची, पश्तो और अन्य स्थानीय भाषाओं के बोलने वाले रहते थे. इसके साथ-साथ भारत से पलायन करने वाले मुसलमान भी थे, जो उर्दू बोलते थे. देश की आबादी में उनका ​हिस्सा केवल 3 फ़ीसदी था.

बांग्लादेश के इतिहास का अध्ययन करने वाले डच प्रोफ़ेसर विलियम वॉन शिंडल ने अपनी किताब 'ए हिस्ट्री ऑफ़ बांग्लादेश' में लिखा कि पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद 'उत्तर भारत' के लोगों का वर्चस्व उभरकर सामने आया.

वह लिखते हैं कि जहां एक तरफ़ बांग्लादेशी मुसलमानों को उम्मीद थी कि वो बहुसंख्यक आबादी होने के कारण पाकिस्तान में अहम भूमिका निभाएंगे, लेकिन 'उत्तर भारत' के मुस्लिम नेताओं ने देश की बागडोर अपने हाथों में ले ली. ऐसा इसलिए कि दक्षिण एशिया में ख़ुद को वो मुस्लिम आंदोलन का रखवाला समझते थे. उनका मानना था कि पाकिस्तान का भविष्य उनकी ही विचारधारा के तहत होगा.

विलियम शिंडल इसे और स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि पश्चिमी पाकिस्तान में रहने वाले 'उत्तर भारतीय' मुसलमान दो समूहों- शरणार्थियों और पश्चिमी पंजाब के मुसलमानों पर निर्भर थे. वे लोग ही देश के हर अच्छे बुरे के मालिक थे.

भारत से पलायन करके पाकिस्तान जाने वाले शरणार्थी उर्दू बोलते थे. पलायन के बाद अल्पसंख्यक होने के बावजूद, उन्हें उम्मीद थी कि उनके ही रीति-रिवाज़ और परंपराएं पाकिस्तान की स्थानीय संस्कृति पर हावी रहेंगी. वहीं पंजाब में रहने वाले मुसलमानों का देश के नागरिक संस्थानों, सेना और कृषि भूमि पर क़ब्ज़ा था और वे देश के बहुसंख्यक बनकर सामने आये.

विलियम शिंडल ने भाषा के बारे में अपनी पुस्तक में लिखा कि पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच शुरुआती विवाद इसी वजह से हुआ. पश्चिमी पाकिस्तान में न के बराबर लोग बांग्ला भाषा जानते थे. इन लोगों का मानना था कि बांग्ला पर 'हिन्दुओं का असर' था.

शायद यही वजह थी कि फ़रवरी 1948 में जब असेंबली के एक बंगाली सदस्य ने प्रस्ताव पेश किया कि असेंबली में उर्दू के साथ-साथ बांग्ला का भी इस्तेमाल हो. इस पर तब के पीएम लियाक़त अली ख़ान ने कहा कि पाकिस्तान उपमहाद्वीप के करोड़ों मुसलमानों की मांग पर बना है और मुसलमानों की भाषा उर्दू है. इसलिए ये अहम है कि पाकिस्तान की एक कॉमन भाषा हो, जो केवल उर्दू ही हो सकती है.

अगले ही महीने यानी मार्च 1948 में पाकिस्तान के संस्थापक क़ायदे आज़म मोहम्मद अली जिन्ना ने जब ढाका का दौरा किया, तो उन्होंने भी वहां दो टूक कहा कि ''मैं यह साफ़ कर देना चाहता हूं कि पाकिस्तान की राजकीय भाषा केवल उर्दू होगी. यदि आपको कोई गुमराह करता है, तो वो पाकिस्तान का दुश्मन है. जहां तक राजकीय भाषा का सवाल है, वो केवल उर्दू है.''

दक्षिण एशिया के इतिहास के एक और जानकार और लेखक नीलेश बोस ने अपनी किताब 'रीकास्टिंग द रीज़न' में इस बारे में बताया है. उन्होंने लिखा कि कुछ बंगाली बुद्धिजीवी मोहम्मद अली जिन्ना के साथ जनवरी 1948 से बांग्ला भाषा की स्थिति पर बात कर रहे थे, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हुई.

जिन्ना ने इस बात पर ज़ोर दिया कि पूर्वी पाकिस्तान में निजी तौर पर बांग्ला भाषा का इस्तेमाल होता रहे, पर आधिकारिक भाषा उर्दू ही बनी रहेगी.

बीबीसी ने अमेरिका की जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर अहसान बट से जब इस बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के संस्थापकों की अपनी भाषा उर्दू थी और वे उर्दू को शायद इस्लाम से जोड़ रहे थे.

अलगाववादी आंदोलनों पर किताब लिखने वाले लेखक प्रोफ़ेसर अहसान बट ने कहा कि जब भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों की कोई राष्ट्रभाषा नहीं है, तब पाकिस्तान को राष्ट्रीय भाषा की ज़रूरत क्यों पड़ी? ये सोचने वाली बात है.

बीबीसी ने इस बारे में अनम ज़कारिया से पूछा तो उन्होंने इसके बारे में विस्तार से जवाब दिया. उन्होंने कहा कि उनकी राय है कि बांग्लादेश के गठन में भाषा आंदोलन की भूमिका मुख्य रही.

ज़कारिया ने कहा, "बात सिर्फ़ इतनी सी नहीं है कि आप किसी की भाषा को स्वीकार नहीं कर रहे, बल्कि ये उससे कहीं बढ़कर है. भाषा को दबाने का मतलब होता है कि आप उनकी संस्कृति को दबा रहे हैं. और पाकिस्तान बनने के तुरंत बाद ऐसा ही हुआ, जब हमने देखा कि 1952 में भाषा के लिए हुए आंदोलन में छात्रों की मौत हो गई.''

मारपीट
Getty Images
मारपीट

सांस्कृतिक वर्चस्व, अन्याय और असमानता

एक ओर जहां भाषा का मुद्दा काफ़ी अहम था, वहीं दूसरी ओर कई शोधकर्ता आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक तौर पर पूर्वी पाकिस्तानियों के प्रति रवैये और उनके साथ हुए अन्याय की निशानदेही करते हुए कहते हैं कि पाकिस्तान के टूटने में इन कारकों का भी बड़ा हाथ है.

लाहौर में रहने वाले शोधकर्ता और लेखक डॉ. तारिक़ रहमान से जब बीबीसी ने पूछा तो उन्होंने कहा कि मुख्य मुद्दा पूर्वी पाकिस्तान के साथ अन्याय का ही था.

उन्होंने कहा, "चाहे उनके साथ सांस्कृतिक रूप से किया गया भेदभाव हो या सत्ता विभाजन में होने वाला भेदभाव हो, या भाषा और आर्थिक स्तर का भेदभाव हो. यह साफ़ है कि उन्हें न्याय नहीं मिल पाया.''

प्रोफ़ेसर अहसान बट भी इस बात का समर्थन करते हैं. वो कहते हैं कि पूर्वी पाकिस्तान की बंगाली आबादी के साथ असमानता और हर तरह के भेदभाव के चलते उनकी आबादी में दुःख और गुस्सा पैदा हो गया था. उसका परिणाम 1971 के रूप में निकला.

दूसरी ओर, अनम ज़कारिया का कहना है कि आर्थिक शोषण या तानाशाही जैसे दूसरे कारक भी हैं, लेकिन उनके अपने शोध में जो बात बार-बार सामने आई वो है- पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रदर्शन करना.

ज़कारिया ने कहा कि पूर्वी पाकिस्तानियों के ख़िलाफ़ नस्लीय शब्द इस्तेमाल किए जाते थे. उन्हें 'कमज़ोर और हीन' माना जाता था. उनके ख़िलाफ़ नस्लवादी रवैया और नैरेटिव बनाया गया. और कहा जाता था कि उनकी संस्कृति 'हिंदू' है और इसे शुद्ध करना है.

डॉ. तारिक़ रहमान ने भी कहा कि बांग्लादेशी नागरिकों को अपमानजनक तरीक़े से बुलाया जाता था.

रहमान ने कहा, "मेरी राय में यदि आप किसी के साथ उचित व्यवहार नहीं करते और उन्हें बराबर का नागरिक समझने के बजाय निचले दर्जे का नागरिक मानते हैं, तो मेरी नज़र में देश टूटने का यह मुख्य कारण था."

हालांकि, बीबीसी ने इस बारे में ढाका यूनिवर्सिटी की पूर्व प्रोफ़ेसर मेघना गोहथाकर्ता से भी सवाल पूछा. इस पर उन्होंने जवाब दिया कि भाषा और संस्कृति को लेकर असमानता और आर्थिक भेदभाव बांग्लादेश की आज़ादी के मुख्य कारण थे. उनके अनुसार, पश्चिमी पाकिस्तान को पूरी तरह से हावी रखने की नीति इसकी सबसे बड़ी वजह थी.

वो कहती हैं, "मुझे लगता है कि सबसे अहम कारण इस्लामाबाद से केंद्र सरकार के पूर्ण निर्णय लेने के साथ-साथ देश के पूर्वी हिस्से में उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रतिरोध को आक्रामकता का उपयोग करके उसे दबाने के प्रयास सबसे अहम कारण थे. अगर लोकतांत्रिक तरीक़े को अपनाया जाता और संसाधनों को समान रूप से बांटा जाता, तो आर्थिक और सांस्कृतिक असमानताओं को दूर किया जा सकता था.''

भ्रष्टाचार
Getty Images
भ्रष्टाचार

लेकिन पाकिस्तान का पक्ष क्या है?

पाकिस्तान के पूर्व नौकरशाह और स्तंभकार सफ़दर महमूद ने, जिनकी कुछ महीने पहले मृत्यु हो गई, अपनी किताब 'पाकिस्तान क्यों टूटा' में इस बारे में बताया है. उन्होंने लिखा कि पाकिस्तान के गठन के बाद, देश के विभिन्न हिस्सों में प्रांतवाद की प्रवृत्ति उभरने लगी और उसके चलते ढाका में पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान के बीच दुश्मनी परवान चढ़ने लगी. उसका फ़ायदा कुछ वामपंथी नेताओं ने उठाया.

सफ़दर महमूद लिखते हैं कि अवामी लीग वास्तव में प्रांतीय और क्षेत्रीय उद्देश्यों वाला केवल एक दबाव समूह था. उसने कभी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी की भूमिका निभाने की कोशिश भी नहीं की.

फ़रवरी 1948 में विधानसभा में बांग्ला भाषा के इस्तेमाल के लिए पेश किए गए प्रस्ताव पर उन्होंने अपनी बात रखी. उन्होंने लिखा कि पीएम लियाक़त अली ख़ान के इस प्रस्ताव को ख़ारिज करने से छात्रों और अन्य शिक्षित लोगों को लगा कि 'पंजाब के दबदबे वाले केंद्र सरकार ने बंगालियों से उनकी मातृभाषा छीन ली है. हालांकि गवर्नर जनरल और प्रधानमंत्री दोनों में से कोई भी पंजाबी नहीं थे.'

दूसरी ओर, बांग्लादेश में पाकिस्तान के उच्चायुक्त की भूमिका निभाने वाले अफ़रासियाब मेहदी हाशमी ने अपनी किताब '1971, फ़ैक्ट एंड फ़िक्शन' में लिखा कि आम धारणा यही है कि पश्चिमी पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान पर अपनी भाषा उर्दू थोपने की कोशिश की, पर यह आरोप पूरी तरह झूठा है.

अफ़रासियाब मेहदी लिखते हैं, ''उर्दू पीढ़ियों से उपमहाद्वीप के मुसलमानों की भाषा रही है और यह देश के दोनों हिस्सों में बोली और समझी जाती है. उन्होंने लिखा कि उर्दू भाषा अरबी के समान है, जो क़ुरान की भाषा है. इसलिए एक मुस्लिम देश होने के नाते उर्दू भाषा पाकिस्तानी पहचान के लिए बेहतर है.''

उन्होंने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए लिखा, ''अगर पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने बांग्ला को राष्ट्रभाषा बनाने की मांग को स्वीकार कर लिया होता, तो संभव है कि पाकिस्तान को भविष्य में और अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ता और दूसरे क्षेत्र भी अपनी प्रांतीय भाषाओं का दर्जा बदलने की मांग करते.''

बांग्लादेश बनते ही वो पाकिस्तान का हिस्सा नहीं रह गया.
BBC
बांग्लादेश बनते ही वो पाकिस्तान का हिस्सा नहीं रह गया.

क्या पाकिस्तान का टूटना तय था?

कई शोधकर्ता और विशेषज्ञों के अनुसार, पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान का एक साथ

रहना संभव ही नहीं था. ऐसे लोग दोनों इलाक़ों के बीच एक हज़ार मील से अधिक की दूरी की तरफ़ इशारा करते हैं, जिसके बीच एक 'दुश्मन' देश मौजूद था.

वहीं कई लोग कहते हैं कि दोनों क्षेत्रों में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मतभेद इतने ज़्यादा थे कि उनके लिए लंबे समय तक एक साथ रहना असंभव था.

यही सवाल जब डॉ. तारिक़ रहमान से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि पश्चिमी पाकिस्तान अपने प्रांतीय और संघीय दर्जे के कारण शुरू से ही सत्ता की धुरी रहा है. वो कहते हैं कि संघीय सरकार पटसन की बिक्री से मिलने वाली रक़म पर टैक्स लगाता और इसका इस्तेमाल देश की रक्षा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए करता था.

विलियम वॉन शिंडल ने भी अपनी किताब में इस बारे में लिखा है. वो कहते हैं कि 1947 से 1970 तक पाकिस्तान के कुल ख़र्च का आधे से ज़्यादा हिस्सा रक्षा पर ख़र्च हुआ था. उन्होंने आगे लिखा कि पाकिस्तान अपनी विदेशी मुद्रा का दो तिहाई पटसन की बिक्री से कमा रहा था, लेकिन यह लगभग समूचा पश्चिमी पाकिस्तान में ही ख़र्च हो रहा था.

पटसन या जूट
Getty Images
पटसन या जूट

डॉ. तारिक़ रहमान का कहना है कि इसके अलावा अधिकांश विकास परियोजनाएं भी पश्चिमी पाकिस्तान में थीं और पूर्वी पाकिस्तानियों के प्रति लोगों का रवैया भी 'मज़ाक' बनाने वाला होता था.

उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान की पार्टी अवामी लीग के नेता शेख़ मुजीबुर्रहमान का ज़िक्र करते हुए कहा कि अगर 1970 के चुनाव में जीत के बाद उन्हें सरकार मिल भी जाती तो भी देश एक नहीं रहता.

शेख़ मुजीब ने कई बार इस बात का संकेत दिया था कि वो पूर्वी पाकिस्तान में विकास परियोजनाओं को शुरू करने के लिए रक्षा बजट में कटौती करेंगे, लेकिन देश की सबसे शक्तिशाली संस्था पाकिस्तानी सेना अपना बजट घटा नहीं सकती थी. इसलिए मुझे नहीं लगता कि दोनों हिस्से लंबे समय तक एक साथ रह पाते.

हालांकि, इसी सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर मेघना गोहथाकर्ता ने कहा कि कई लोग दोनों क्षेत्रों के बीच की दूरी को ध्यान में रखते हुए कहते हैं कि अलग होना तय था, लेकिन ऐसा ज़रूरी नहीं था.

वो कहती हैं, "ये इसलिए नहीं हुआ कि दोनों हिस्से काफ़ी दूर हैं. इसके बजाय, पाकिस्तान की सरकार ये बात समझ नहीं पाई कि उनके दूसरे हिस्से में रहने वाले लोगों की सांस्कृतिक और आर्थिक आकांक्षाएं क्या हैं. वो भी एक ऐसा हिस्सा, जहां देश की अधिकांश आबादी रहती है.''

दूसरी ओर, अनम ज़कारिया का कहना है कि पाकिस्तान को यह मानना ही नहीं चाहिए कि अलगाव निश्चित था.

वो कहते हैं, "यदि हम ये सोच लें कि ये तो होना ही था, तो हम इसके कारणों पर कभी विचार नहीं कर पाएंगे. उन 24 सालों में बहुत सारे कारक और घटनाएं घटी, जो हालात को उस मुक़ाम तक ले गई. याद रखें कि पूर्वी बंगाल ही वो जगह थी, जहां मुस्लिम लीग का गठन हुआ था और वहां पाकिस्तान के लिए अपार समर्थन मौजूद था.''

ज़कारिया कहते हैं, "मेरे विचार से ऐसा तय नहीं था. इसकी वजह वो नीतियां थीं, जिन्हें जानबूझकर देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को दबाने के लिए लागू किया गया, केवल इसलिए कि वे अपने अधिकार मांग कर रहे थे.''

शेख़ मुजीब, अगरतला साज़िश और '70 के चुनाव

अगर आप पाकिस्तान का इतिहास पढ़ें तो अक्सर 60 के दशक को पाकिस्तान के विकास का दशक कहा जाता है जब फ़ील्ड मार्शल अयूब ख़ान राष्ट्रपति के रूप में देश का नेतृत्व कर रहे थे.

हालांकि, उनके कार्यकाल के दौरान, पूर्वी पाकिस्तान के साथ संबंध बिगड़ते जा रहे थे और अभाव की भावना बढ़ रही थी.

प्रोफ़ेसर अहसान बट ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जब 1965 में पाकिस्तान और भारत के बीच युद्ध हुआ था, तो उस समय पूर्वी पाकिस्तान के पास केवल एक डिवीज़न सेना और 15 सेबर फ़ाइटर जेट्स के साथ नाममात्र की रक्षा सुविधाएं थीं, और पश्चिमी पाकिस्तान के साथ कोई संचार न होने के बराबर था.

उन्होंने आगे लिखा कि पाकिस्तान की रक्षा रणनीति "पश्चिम से पूर्व की रक्षा करना" थी और जब भारत ने आक्रमण किया, तो पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों ने महसूस किया कि उनकी सुरक्षा पश्चिमी पाकिस्तान के लिए प्राथमिकता नहीं थी.

इस पृष्ठभूमि में, जब अवामी लीग के शेख़ मुजीब ने अगले साल लाहौर में अपना छह सूत्री एजेंडा पेश किया, तो उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा और इसे 'भारतीय साजिश' करार दिया गया.

कुछ महीने पहले, फ़ारूक आदिल ने इन बिंदुओं के बारे में बीबीसी उर्दू पर एक लेख में लिखा था, कि 'शेख़ मुजीब का कहना था, कि प्रांतों के आर्थिक विकास में एकरूपता पैदा करने के लिए भी प्रांतीय स्वायत्तता आवश्यक है. उन्होंने कहा कि पूर्वी पाकिस्तान की जनसंख्या 5 करोड़ है, इसलिए देश की रक्षा में भी उसका हिस्सा जनसंख्या के अनुपात में होना चाहिए, इस प्रकार देश की एकता मजबूत होगी, कमज़ोर नहीं.'

लेकिन उनके दिए गए सुझावों को न केवल नज़रअंदाज किया गया बल्कि शेख़ मुजीबु-उर-रहमान के ख़िलाफ़ 1968 में 'अगरतला षडयंत्र' केस के तहत मुक़दमा दर्ज किया गया था और उन पर आरोप लगाया गया कि वह भारत सरकार के साथ मिलकर पूर्वी पाकिस्तान को तोड़ने की साज़िश कर रहे हैं.

पूर्व राजदूत अफ़रासियाब मेहदी ने पश्चिमी पाकिस्तान द्वारा पूर्वी प्रांत के आर्थिक और सामाजिक शोषण के आरोपों पर अपनी पुस्तक में लिखा है, कि कहा जाता है कि पाकिस्तान के दो बंगाली नेताओं, ख़्वाजा नाज़िमुद्दीन और हुसैन शहीद सुहरावर्दी का कार्यकाल बहुत कम था, लेकिन लोग यह भूल जाते हैं कि 50 के दशक में पाकिस्तान के अन्य गैर-बंगाली नेताओं को भी ज़्यादा समय तक शासन करने का मौक़ा नहीं मिला.

उन्होंने आगे लिखा कि मोहम्मद अली जिन्ना की मृत्यु के बाद, पाकिस्तान को राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ा जिसके नतीजे में स्थिति ऐसी बन गई.

अगर पाकिस्तान की सरकार का यह ख्याल था कि अगरतला साजिश की वजह से शेख़ मुजीबु-उर-रहमान की साख को नुकसान पहुंचेगा, तो यह उसकी भूल थी. न केवल पूर्वी पाकिस्तान में उनके समर्थन में आवाज़ बुलंद हुई, बल्कि वह इस क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण और सबसे लोकप्रिय नेता बनकर उभरे, उन्हें 'बंगा बंधो',यानी 'बंगाल के दोस्त' की उपाधि मिली.

जब पाकिस्तान के नए तानाशाह जनरल याहया ख़ान की सरकार में 1970 के चुनाव हुए, तो उनकी पार्टी अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान की 162 सीटों में से 160 सीटों पर जीत हासिल की और स्पष्ट बहुमत हासिल किया लेकिन सरकार बनाने का मौक़ा नहीं मिल सका.

चुनाव में स्पष्ट जीत के बावजूद सरकार न मिलने के बारे में राजदूत अफ़रासियाब मेहदी ने अपनी किताब में लिखा है कि यह सोचना बचकाना है कि इस्लामाबाद को शेख़ मुजीबु-उर-रहमान के भारत के साथ गठजोड़ की जानकारी नहीं थी.

वह लिखते हैं कि बांग्लादेश में आज भी यह बात स्वीकार की जाती है कि भारतीय ख़ुफ़िया एजेंसी ने शेख़ मुजीब को न केवल 1970 के आम चुनावों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की, बल्कि जब भी उन्हें पाकिस्तान को नुक़सान पहुंचाने के लिए धन की ज़रुरत पड़ी उन्हें धन मुहैय्या कराया गया.

हालांकि, प्रोफ़ेसर अहसान बट ने अपनी किताब में लिखा है कि इन निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया गया और "सेना और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने शेख़ मुजीब को उनका हक़ नहीं दिया."

तो क्या यह वह मोड़ था जब यह निश्चित हो गया था कि पश्चिम और पूर्वी पाकिस्तान अलग हो जाएंगे, इस सवाल पर प्रोफ़ेसर अहसान बट कहते हैं कि वे किसी एक घटना को 'टर्निंग पॉइंट' कहना उचित नहीं समझते, लेकिन 1970 के चुनाव के बाद हुई घटनाओं ने पाकिस्तान के टूटने का मार्ग प्रशस्त किया था.

जब यही सवाल डॉक्टर तारिक़ रहमान से पूछा गया तो उन्होंने मार्च 1971 की घटनाओं की ओर इशारा किया.

उन्होंने बताया कि चुनाव परिणाम के बाद तीनों मुख्य किरदारों, ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो, शेख़ मुजीबु-उर-रहमान और राष्ट्रपति याहया ख़ान की कई बैठकें हुईं और अंत में राष्ट्रपति याहया ख़ान ने ढाका में 3 मार्च को नवनिर्वाचित विधानसभा बुलाने की तारीख़ दी.

"लेकिन बाद में उन्होंने एक नई तारीख़ (25 मार्च) दे दी और फिर जब सेना ने 25 मार्च को सैन्य अभियान (ऑपरेशन सर्च लाइट) शुरू किया, तो स्थिति हाथ से निकल गई और कोई रास्ता नहीं बचा."

डॉक्टर तारिक़ रहमान का कहना है कि अप्रैल तक पूर्वी पाकिस्तान में हालात बहुत ख़राब हो चुके थे और लोग मुक्ति वाहिनी में शामिल होने लगे थे, जबकि दूसरी तरफ़ भारत ने फ़ैसला कर लिया था कि वह बांग्लादेश की 'स्वतंत्रता की कोशिश' में अपनी भूमिका निभाएगा.

हालांकि, प्रोफ़ेसर मेघना गोहथाकर्ता ने भी इस बात को दोहराते हुए कहा कि राष्ट्रपति याहया ख़ान द्वारा संसदीय सत्र को स्थगित करना जिसमें शेख़ मुजीबु-उर-रहमान और अवामी लीग को सत्ता मिलनी थी, वो एक निर्णायक मोड़ था जिसके बाद स्थिति हाथ से निकल गई.

बांग्लादेश का झंडा लिए शेख़ मुजीबुर्रहमान के समर्थक
Getty Images
बांग्लादेश का झंडा लिए शेख़ मुजीबुर्रहमान के समर्थक

'नरसंहार' और 'युद्ध अपराध' के आरोप और भविष्य का सवाल

पूर्वी पाकिस्तान के अलगाव की जांच के लिए पाकिस्तान सरकार द्वारा स्थापित हमूदुर रहमान आयोग की रिपोर्ट में पाकिस्तानी सेना द्वारा की गई कथित "बर्बरता" के अध्याय में लिखा गया है कि "यह नहीं भूलना चाहिए कि अवामी लीग के चरमपंथियों ने मार्च के महीने में किस तरह अत्याचार और बर्बरता की थी.'

रिपोर्ट के अनुसार, कथित तौर पर अनुमानित एक लाख से पांच लाख बहारी, पश्चिमी पाकिस्तानी और देशभक्त बंगाली लोगों को मारा गया था.

रिपोर्ट में कहा गया है, कि ''यह बताने का मक़सद ये नहीं है कि अगर कथित तौर पर पाकिस्तानी सेना ने कोई अपराध और बर्बरता की है, तो उसके लिए कोई औचित्य बनता है, लेकिन बताने का मक़सद यह ज़रूर है कि अवामी लीग के गुंडों की तरफ़ से किये गए अपराधों से पाकिस्तानी सेना में नाराज़गी और गुस्सा ज़रूर बढ़ा होगा, और हो सकता है कि केंद्र सरकार की रिट पर हिंसक प्रतिक्रिया दी हो.''

दूसरी ओर, बांग्लादेश के आधिकारिक पक्ष के अनुसार, पाकिस्तानी सेना ने कथित तौर पर 30 लाख लोग मारे थे. जहां अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों और कई शोधकर्ताओं के अनुसार, पाकिस्तानी सेना ने 'नरसंहार' और 'महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन अपराध' किए हैं.

वहीं पाकिस्तान सरकार ने हमेशा यही कहा है कि बांग्लादेश ने मरने वालों की संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है और उनकी संख्या 26 हज़ार के क़रीब है.

लेकिन क्या आंकड़ों की ये बहस दोनों देशों को आगे बढ़ने और संबंधों को सुधारने से तो नहीं रोक रही है?

इस संबंध में अनम ज़करिया ने बहुत स्पष्ट तौर पर कहा कि ऐसा नहीं है और बांग्लादेश के साथ संबंध सुधारने के लिए पाकिस्तान को अपने 'अपराध' को स्वीकार करना होगा.

"बार-बार माफ़ी की तो बात की जाती है लेकिन माफ़ी का असली उद्देश्य ग़लतियों का स्वीकार करना है और पाकिस्तान तो जो हुआ है उसे स्वीकार ही नहीं करता है, और यही हमारी ग़लती और कमी है. ये घाव अभी भरे नहीं हैं."

अनम ने कहा, "हमारा पूरा नैरेटिव, हमारी पाठ्यपुस्तकें, हमें हिसाब देना होगा, हमें इतिहास को वैसा ही बताना होगा जैसा हुआ है और जब हम इसे स्वीकार करेंगे और अपनी ग़लतियों पर विचार करेंगे, तभी आगे बढ़ना संभव होगा."

पाकिस्तान-बांग्लादेश संबंधों के भविष्य पर टिप्पणी करते हुए, डॉक्टर तारिक़ ने कहा कि दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध होना बिलकुल संभव है और अगर दक्षिण अफ्रीक़ा की तरह तथ्यों और सुलह पर आधारित आयोग बने तो कुछ हो सकता है.

लेकिन ऐसा होने के लिए, पाकिस्तान को पहले बांग्लादेश से ईमानदारी से माफ़ी मांगनी चाहिए. मेरा यह भी मानना है कि मार्च 1971 में बांग्लादेश में जो बहारी लोग मारे गए, बांग्लादेश को भी उन लोगों और उनके परिवारों से माफ़ी मांगनी होगी. लेकिन पहले पाकिस्तान को माफ़ी मांगनी पड़ेगी, और ज़्यादा विनम्रता दिखानी होगी.

उन्होंने उम्मीद जताई कि अगर ऐसा हुआ तो संभव है कि रिश्ते में सुधार हो.

हालांकि, प्रोफ़ेसर अहसान बट इसे लेकर बहुत आशावादी नहीं हैं. उनका कहना है कि जब तक तथ्य-आधारित संवाद और पारदर्शिता नहीं होगी, आगे बढ़ने की कोई संभावना नहीं है.

"हमने अपनी पाठ्यपुस्तकों को मिथकों से भर दिया है और अगर हम लगातार इन घटनाओं को नकारते रहेंगे तो क्या होगा?"

उनका कहना है कि दोनों देशों के बीच फ़िलहाल संबंध सुधरने के कोई आसार नहीं दिख रहे हैं, लेकिन यह भी याद रखना ज़रूरी है कि उनके संबंधों में शीतलता सिर्फ़ इतिहास की वजह से नहीं बल्कि मौजूदा राजनीतिक स्थिति और दोनों देशों के मौजूदा नेतृत्व की वजह से भी है.

"पाकिस्तान के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह बांग्लादेश को भारत के नज़रिये से न देखे, बल्कि इसे एक स्वतंत्र देश के रूप में देखे और समस्याओं से मौजूदा स्थिति को ध्यान में रखते हुए निपटे."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+