जानिए क्या है SWIFT सिस्टम, जिसपर प्रतिबंध से टूट सकती है रूस की कमर, भारत में महंगे हो सकते हैं तेल-गैस
मास्को/कीव, 27 फरवरी। यूक्रेन पर जिस तरह से रूस लगातार सैन्य कार्रवाई कर रहा है उसके बाद अमेरिका और यूरोपीय देश रूस पर कई प्रतिबंध लगा रहे हैं। लेकिन बावजूद इसके जिस तरह से रूस यूक्रेन को लेकर अपने रुख में नरमी नहीं दिखा रहा था उसे देखते हुए अमेरिका और यूरोपीय देशों ने अबतक का सबसे बड़ा प्रतिबंध लगा दिया है। जी हां, अमेरिका और यूरोपीय यूनियन ने रूसी बैंकों पर स्विफ्ट ट्रांजैक्शन का प्रतिबंध लगा दिया है। इस प्रतिबंध के बाद रूस अपने विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। रूसे का राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए 600 बिलियन डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार सबसे बड़ा आर्थिक हथियार था, ऐसे में इसपर स्विफ्ट बैन लगने से रूस को आर्थिक रूप से बड़ा नुकसान हो सकता है। स्विफ्ट बैन को एक तरह से आर्थिक परमाणु बम कहा जाता है।
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सोशल मीडिया पर मॉनेटाइजेश पर भी प्रतिबंध
इस प्रतिबंध का सीधा असर रूस पर देखने को मिलेगा। इस प्रतिबंध के जरिए रूसी लोगों को पैसों के लेन-देन में काफी दिक्कत हो रही है। अहम बात यह है कि यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर ने भी रूसी मीडिया पर और चैनल पर प्रतिबंध लगा दिया है। इन चैनलों के वीडियो के द्वारा सोशल मीडिया पर होने वाली कमाई जोकि रूसी बैंकों में जमा होती थी उसपर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। बता दें कि इंटरनेट के जरिए कई प्लेटफॉर्म से लोग पैसों की कमाई करते हैं, लेकिन स्विफ्ट प्रतिबंध के बाद इस कमाई पर भी रोक लग जाएगी।

कब हुई इस सिस्टम की शुरुआत
स्विफ्ट सिस्टम में 200 से अधिक देश जुड़े हैं। इस व्यवस्था की शुरुआत 1977 में हुई थी। यह एक मैसेजिंग नेटवर्क है, इसके जरिए कुछ कोड का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे पैसों का लेनदेन होता है। इस प्रणाली को चलाने के लिए स्विफ्ट का मुख्यालय बेल्जियम के ब्रूसेल्स में ला हुल्पे में स्थापित किया गया है। 1977 में इस नेटवर्क की शुरुआत के वक्त सिर्फ 250 बैंक इससे जुड़े थे लेकिन आज 11 हजार से अधिक बैंक और संस्थान इससे जुड़े हैं।

200 से अधिक देश जुड़े
200 देशों में इसका नेटवर्क है। हर वित्तीय संस्थान को बैंक आइडेंटिफिकेशन कोड दिया जाता है, जिसमे AAAA-BB-CC-DDDD यानि 4 अंकों का बैंक कोड, दो अंकों का देश का कोड, दो अंकों का लोकेशन कोड और चार अंकों का ब्रांच कोड होता है। इस सिस्टम को समझने के लिए आप आईएफएससी कोड की तरह से समझ सकते हैं। आईएफएससी का इस्तेमाल स्विफ्ट की तर्ज पर है। जैसे हम बैंकों में लेनदेन के लिए इस आईएफएससी कोड को इस्तेमाल करते हैं। वैसे ही स्विफ्ट का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किया जाता है। हर साल स्विफ्ट ट्रांजैक्शन का इस्तेमाल बढ़ रहा है।

अमेरिका का है इस व्यवस्था में दबदबा
2012 में स्विफ्ट ओवरसाइट फोरम की स्थापना की गई, जोकि यह देखता है कि स्विफ्ट सही से काम कर रहा है या नहीं। इसमे भारत की ओर से रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से भी एक प्रतिनिधि को भेजा जाता है। स्विफ्ट में होने वाले ज्यादातर लेनदेन डॉलर में होता है और इसका लेनदेन न्यूयॉर्क से होता है। लिहाजा अमेरिका कभी भी इसे रोक सकता है। ईरानी बैंकों पर भी अमेरिका ने प्रतिबंध लगाया था।

70 फीसदी लेन-देन स्विफ्ट सिस्टम से
स्विफ्ट यानि सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटर बैंक फाइनेंशियल टेलीकम्यूनिकेशन। इसे आप ग्लोबल ट्रांजैक्शन का व्हाट्सएप कह सकते हैं। दरअसल स्विफ्ट खुद पैसे जमा नहीं करता है बल्कि यह एक प्लेटफॉर्म है जिसके जरिए दुनियाभर में बैंक पैसों का आपस में लेनदेन करते हैं। ग्लोबल ट्रांजैक्शन इसी के जरिए होता है। लिहाजा स्विफ्ट बैन से रूस के बैंक विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। तकरीबन 70 फीसदी विदेशी मुद्रा का लेन-देन रूसी बैंक स्विफ्ट के जरिए ही करते हैं, ऐसे में यह प्रतिबंध अबतक का सबसे बड़ा प्रतिबंध माना जा रहा है।

क्या कहना है एक्सपर्ट का
वित्तिय मामलों के एक्सपर्ट फाइनेंशियल टाइम्स के लेख हेनरी फॉय ने ट्वीट करके लिखा, रूस के पास 630 बिलियन डॉलर का भंडार है जिसमे से अधिकतर विदेशी मुद्रा डॉलर में है। इसका एक बड़ा हिस्सा विदेश में है। ऐसे में पश्चिमी देशों के स्विफ्ट प्रतिबंध लगाने की सहमति के बाद राष्ट्रपति पुतिन इस विदेशी मुद्रा में से एक भी पैसे का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। ऐसे में इस बात की संभावना है कि रूस की मुद्रा रूबल को भारी नुकसान पहुंचे और यह काफी निचले स्तर पर पहुंच जाए। दरअसल विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल नहीं कर पाने की वजह से रूसी मुद्रा रूबल पर इसका सीधा असर देखने को मिलेगा।

भारत पर भी होगा इसका असर
ऐसे में स्विफ्ट सिस्टम से अगर कोई देश निकाल दिया जाता है तो वह विदेश से होने वाले लेन-देन को नहीं कर सकता है। विदेशी निवेश उसे हासिल नहीं हो सकता है। लिहाजा रूस पर इस प्रतिबंध के बाद उसे दूसरे देशों में तेल बेचने पर मुश्किल का सामना करना होगा। तेल और गैस से रुस को विदेश से कुल 40 फीसदी निवेश प्राप्त होता है। लिहाजा इस प्रतिबंध से रूस को काफी बड़ा नुकसान हो सकता है। रूस को दूसरे देशों के साथ तेल और गैस बेचने में दिक्कत होगी। जिसका सीधा असर तेल और गैस की कीमतों पर देखने को मिलेगा। लिहाजा भारत में भी पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम पर इसका असर देखने को मिल सकता है।












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