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कल पाकिस्तान में 57 इस्लामिक देशों का शिखर सम्मेलन, इमरान खान के एजेंडे से घबराए मुस्लिम देश?

इस्लामाबाद बैठक को आयोजन कर रहा है, जिसमें सभी 57 इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों को आमंत्रित किया गया है। राजधानी इस्लामाबाद में सुरक्षा के मद्देनजर शुक्रवार से रविवार तक फोन और मोबाइल फोन सेवा को बंद कर दिया गया है।

इस्लामाबाद, दिसंबर 18: पाकिस्तान ने सभी 57 मुस्लिम देशों को इस्लामाबाद में एक 'विशालकाय' बैठक के लिए आमंत्रित किया है और पाकिस्तान ने कल यानि 19 दिसंबर को विश्व के सभी 57 इस्लामिक देशों के साथ बैठक करने का दावा किया है। लेकिन, सवाल ये उठ रहे हैं, कि आखिर पाकिस्तान सभी मुस्लिम देशों के साथ बैठक कर क्या हासिल करना चाहता है और क्या मुस्लिम देश पाकिस्तान में होने वाली बैठक को लेकर उत्साहित भी हैं, या फिर मुस्लिम देशों को 'एक' करने की इमरान खान की कोशिश बेदम रहने वाली है।

कितने उत्साहित हैं मुस्लिम देश?

कितने उत्साहित हैं मुस्लिम देश?

इस्लामिक सहयोग संगठन यानि ओआईसी की बैठक की तारीख 19 दिसंबर की रखी गई है और पाकिस्तानी मीडिया में छपी रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार सभी मुस्लिम देशों से बैठक में शामिल होने का अनुरोध कर रही है, लेकिन बैठक को लेकर ज्यादातर मुस्लिम देश उत्साह नहीं दिखा रहे हैं। इस्लामाबाद में होने वाली इस 'महाबैठक' के लिए पाकिस्तान ने सभी 57 मुस्लिम देशों से शामिल होने के लिए मनुहार की है, लेकिन अभी तक सिर्फ 24 देशों ने ही बैठक में शामिल होने पर सहमति जताई है। हालांकि, पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने दावा किया है कि, बैठक में सभी मुस्लिम मुवालिक शामिल होंगे, लेकिन अभी तक पाकिस्तान की तरफ से शामिल होने वाले देशों को लेकर लिस्ट जारी नहीं की गई है। ऐसे में देखने वाली बात होगी, कि बैठक में कितने मुस्लिम देश शामिल होते हैं?

बैठक को लेकर दुविधा में मुस्लिम देश?

बैठक को लेकर दुविधा में मुस्लिम देश?

इस्लामाबाद जिस बैठक का आयोजन कर रहा है, उसमें सभी 57 इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों को आमंत्रित किया गया है। वहीं, राजधानी इस्लामाबाद में सुरक्षा के मद्देनजर शुक्रवार से रविवार तक फोन और मोबाइल फोन सेवा को बंद कर दिया गया है। वहीं, पाकिस्तान के अखबार 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के मुताबिक 57 मुस्लिम देशों के 24 विदेश मंत्रियों ने ही शिखर सम्मेलन में शामिल होने की मंजूरी दी है और इस बात को पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने भी माना है। शाह महमूद कुरैशी को उम्मीद है कि 18 दिसंबर को कुछ और देशों के विदेश मंत्री शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए तैयार हो जाएंगे। लेकिन, पाकिस्तानी विदेश मंत्री को इस बात की उम्मीद नहीं है, कि सभी मुस्लिम देशों के विदेश मंत्री शामिल होंगे। इसके अलावा बैठक में पी-5 देशों के प्रतिनिधि भी भाग ले सकते हैं। आपको बता दें कि, पी-5 देशों का मतलब उन देशों से है, जो यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल के परमानेंट मेंबर हैं और ये देश हैं अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन और फ्रांस।

अफगानिस्तान पर पाकिस्तान की नजर?

अफगानिस्तान पर पाकिस्तान की नजर?

जानकारों का मानना है कि, इस्लामिक देशों के साथ होने वाली इस बैठक के जरिए पाकिस्तान अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार पर इस्लामिक देशों में एक आम सहमति बनाने की कोशिश कर रहा है। अब तक पूरी ताकत लगाने के बाद भी पाकिस्तान को दुनिया के किसी भी देश से तालिबान की सरकार को मान्यता दिलाने में कामयाबी नहीं मिली है। लिबाजा, इस बैठक में पाकिस्तान ने तालिबान की सरकार के विदेश मंत्री को भी बुलाया है। ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि, कई देशों के विदेश मंत्री बैठक में हिस्सा लेने नहीं पहुंचे।

तालिबान के लिए कुछ भी करेगा पाकिस्तान?

तालिबान के लिए कुछ भी करेगा पाकिस्तान?

राजनीतिक एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस शिखर सम्मेलन का मुख्य एजेंडा भी अफगानिस्तान ही होने वाला है, हालांकि अफगानिस्तान अभी तक ओआईसी का सदस्य नहीं है। दूसरी तरफ अमेरिका, यूरोप और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संगठन तालिबान को वित्तीय मदद देने से साफ इनकार कर चुके हैं। जिससे पाकिस्तान बुरी तरह से परेशान है। पाकिस्तान को अफगानिस्तान में तालिबान राज स्थापित होने के बाद अभी तक कुछ भी हासिल नहीं हुआ है, लिहाजा पाकिस्तान इस्लामिक देशों से अफगानिस्तान को आर्थिक मदद दिलवाना चाहता है और खुद बीच की कड़ी बन सकता है। आर्थिक कंगाली से बचने के लिए अफगानिस्तान की पाकिस्तान के लिए आखिरी उम्मीद बचा है, लिहाजा पाकिस्तान तालिबान को आर्थिक मदद दिलाने के लिए हर कदम उठा रहा है। इसके साथ ही, इस बात की भी पूरी उम्मीद है, कि इस्लामिक देशों के साथ बैठक में पाकिस्तान कश्मीर का मुद्दा उठा सकता है।

कहीं अपने ही जाल में ना फंस जाए पाकिस्तान?

कहीं अपने ही जाल में ना फंस जाए पाकिस्तान?

इंटरनेशनल एक्सपर्ट्स का मानना है कि, सभी 57 इस्लामिक देशों के साथ बैठक करना कहीं पाकिस्तान के लिए उल्टा ना पड़ जाए। एक्सपर्ट्स का मानना है कि, इस शिखर सम्मेलन का मुख्य मकसद तालिबान को इस्लामिक देशों के बीच में लाना है और इसी बात को लेकर कई इस्लामिक देश सवाल उठा सकते हैं। जानकर बताते हैं कि, कई इस्लामिक देशों ने इस बार तालिबान से काफी दूरी बना रखी है, लिहाजा पाकिस्तान का ये प्लान फेल हो सकता है। अफगानिस्तान में पाकिस्तान की भूमिका पर भी नए सवाल उठ सकते हैं। अमेरिकी कांग्रेस की विशेष समिति ने साफ तौर पर कह दिया है कि अफगानिस्तान मामले में पाकिस्तान ने उसके साथ विश्वासघात किया है। वहीं, भारत के 50,000 टन गेहूं और दवाओं से लदे ट्रकों को रास्ता देने से इनकार रा मामला भी बैठक में उठ सकता है। इसके साथ ही इस्लामिक देश पाकिस्तान की सरकार से सियालकोट में श्रीलंकाई नागरिक को जिंदा जलाने को लेकर भी सवाल पूछ सकते हैं।

इस्लामाबाद में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी

इस्लामाबाद में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी

पाकिस्तान में सुरक्षा के हालात क्या हैं और पाकिस्तान में आतंकवादी कितनी आसानी से लोगों को निशाना बनाते हैं, इस बात की जानकारी पूरी दुनिया को है। लिहाजा देश आने वाले राजनयिकों को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने के लिए राजधानी इस्लामाबाद में मोबाइल फोन सेवा बंद कर दिया गया है। पाकिस्तान में शिखर सम्मेलन से पहले ही लैंडलाइन के साथ साथ तमाम मोबाइल सेवा को पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। इसके साथ ही राजधानी में पाकिस्तान सरकार ने इंटरनेट सेवा को भी पूरी तरह से बंद कर दिया है और चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाबल तैनात हैं।

क्या है इस्लामिक सहयोग संगठन?

क्या है इस्लामिक सहयोग संगठन?

आपको बता दें कि, इस्लामिक सहयोग संगठन, इस्लामिक देशों का एक संगठन है, जिसकी स्थापना 1967 में हुए अरब-इजरायल युद्ध को देखते हुए 1971 में की गई थी, जिसका मकसद एकजुट होकर फिलिस्तीन की मदद करना और इजरायल को दवाब देना था। इस्लामिक सहयोग संगठन की स्थापना में पाकिस्तान में काफी भूमिका निभाई थी और शुरूआत में इस संगठन में विश्व के 30 मुस्लिम देश जुड़े थे और धीरे धीरे विश्व के सभी 57 देश इसके सदस्य बन गये। इस्लामिक सहयोग संगठन के तहत कुल 57 देश आते हैं, जिसकी आबादी करीब 180 करोड़ है। हालांकि, शुरूआत से ही ओआईसी पर सऊदी अरब का वर्चस्व बना रहा, जिससे अब पाकिस्तान को ऐतराज रहता है और पिछले दिनों पाकिस्तान ने तुर्की और मलेशिया के साथ मिलकर नया ब्लॉक बनाने की कोशिश की थी, जिसका खामियाजा तुर्की को एफएटीएफ द्वारा प्रतिबंधित होकर चुकानी पड़ी। वहीं, सऊदी अरब, जो अब खुद को कट्टर इस्लाम से बाहर निकालना चाहता है, वो किसी ऐसे गुटबाजी में नहीं पड़ना चाहता है, जिसके केन्द्र में कट्टरवादी विचार हो।

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