60 सालों तक दुनिया की नजरों से गायब रहने वाला फाइव आइज क्या है? क्या भारत बन पाएगा इसका हिस्सा?

खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के मामले को लेकर भारत और कनाडा के बीच तनाव बढ़ता ही जा रहा है। दोनों देशों ने एक दूसरे के राजनयिक को अपने यहां से निष्कासित कर दिया है। इसके साथ ही भारत और कनाडा ने एक दूसरे के देशों में रहने वाले अपने नागरिकों के लिए ट्रैवल एडवाइजरी जारी की है।

भारत और कनाडा के बीच जारी इस विवाद पर अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। अमेरिका ने भारत के विरुद्ध कनाडा के आरोपों को 'बेहद चिंताजनक' बताया है। वहीं ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेन्नी वॉन्ग ने भी इसे 'चिंताजनक' करार दिया है।

 Five Eyes intelligence alliance

भारत और कनाडा के इस राजनयिक संकट पर अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया की प्रतिक्रियाएं इसलिए मायने रखती हैं क्योंकि क्योंकि कनाडा सहित ये तीनों देश फाइव आइज के सदस्य हैं। भारत-कनाडा के विवाद के बीच दुनिया भर में फाइव आइज को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

फाइव आइज क्या है?

फाइव आइज एक खुफिया गठबंधन है जिसमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, यूनाइटेड किंगडम और अमेरिका शामिल हैं। इसकी अवधारणा तब से है जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन और अमेरिका के कोड-ब्रेकरों के बीच अनौपचारिक गुप्त बैठकों को अंजाम दिया जाता था। इस दौरान दोनों देशों के बीच खुफिया सूचनाएं साझा की जाती थीं।

ब्रिटेन और अमेरिका ने निगरानी और खुफिया-साझाकरण को लेकर द्विपक्षीय समझौता को अंजाम दिया था। इसे यूनाइटेड किंगडम-यूनाइटेड स्टेट्स कम्युनिकेशन इंटेलिजेंस एक्ट (UKUSA) समझौते के रूप में जाना जाता था। UKUSA एग्रीमेंट कम्यूनिकेशन इंटरसेप्ट करने के लिए, कूट भाषा में भेजे गए संदेशों को समझने के लिए और लगभग सभी खुफिया जानकारी शेयर करने के लिए की गई थी।

UKUSA एग्रीमेंट एक गुप्त समझौता था, जिसमें ब्रिटेन और अमेरिका एक-दूसरे के साथ खुफिया जानकारी साझा करते थे। शीत युद्ध के दिनों में सोवियत संघ पर निगरानी और क्लासीफाइड इंटेलीजेंस शेयर करने के लिए इसकी उपयोगिता बढ़ गई थी।

UKUSA एग्रीमेंट इतना गुप्त था कि 2005 तक इसके अस्तित्व को भी स्वीकार नहीं किया गया था। कनाडा 1948 में UKUSA समझौते में शामिल हुआ। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड 1956 में शामिल हुए। इस प्रकार, फाइव आइज का जन्म हुआ और UKUSA एग्रीमेंट को फाइव आईज (FVEY) को नाम से जाना जाने लगा।

FVEY में शामिल सभी सहयोगी देशों के बीच सिग्नल इंटेलिजेंस साझा करने की सुविधा है। इसमें सभी देश अपने द्वारा एकत्र किए गए सिग्नल इंटेलिजेंस को डिफ़ॉल्ट रूप से आदान-प्रदान करने के लिए सहमत हैं।

फाइव आइज देश अति-संवेदनशील स्टोनघोस्ट नेटवर्क के माध्यम से एक-दूसरे के साथ जानकारी साझा करते हैं। इसके बारे में दावा किया जाता है कि इसमें 'पश्चिमी दुनिया के कुछ सबसे करीबी संरक्षित रहस्य' शामिल हैं।

FVEY एलायंस का आधार यूनाइटेड किंगडम के सरकारी संचार मुख्यालय (GCHQ) और यूएसए की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (NSA) की खुफिया जानकारी को बाधित करने की संयुक्त क्षमताओं पर आधारित है। ये एजेंसियां सिगइंट नामक सिग्नल इंटेलिजेंस एकत्र और डिक्रिप्ट करती हैं, जिसमें दुनिया भर से इंटरनेट, टेलीफोन, रेडियो और उपग्रह डेटा शामिल होता है।

यूकेयूएसए समझौता, जिसे 2010 में सार्वजनिक किया गया था, के मुताबिक "किसी भी तीसरे पक्ष को अपना अस्तित्व प्रकट करना इस समझौते के विपरीत होगा" और "प्रत्येक पक्ष तीसरे पक्ष के साथ किसी भी कार्रवाई के लिए दूसरे की सहमति की मांग करेगा और जब तक इसकी उपयुक्तता पर सहमति नहीं बन जाती, तब तक कोई कार्रवाई नहीं करेंगे।''

नए सहयोगियों की तलाश

अमेरिका पर हुए आतंकी हमले के बाद इस बात पर जोर दिया गया कि आतंकवाद से लड़ने के लिए अन्य देशों को भी इस संगठन में शामिल करना होगा। सितंबर 2021 में अमेरिकी संसद की प्रतिनिधि सभा में एक बिल पेश किया गया था जिसके तहत 'फाइव आइज' पैक्ट का दायरा बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया।

'फाइव आईज', 'नाईन आईज' बन पाएगा?

इसमें जापान, दक्षिण कोरिया, भारत और जर्मनी जैसे समान मानसिकता वाले देशों को नए सदस्य देश के तौर पर शामिल करने का प्रस्ताव रखा गया था। ड्राफ्ट में ये कहा गया कि 'फाइव आइज' पैक्ट में इन देशों को शामिल करने से खुफिया जानकारी साझा करने का नेटवर्क बढ़ाया जा सकेगा।

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