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मोदी के 'चाणक्य' से चीनी डिप्लोमेट ने पूछा शांति पर सवाल, क्या भारत को गुप्त संदेश भेज रहे हैं शी जिनपिंंग?

India-China News: अमूमन ऐसा देखने को नहीं मिलता, कि एक देश का डिप्लोमेट किसी दूसरे 'प्रतिद्वंदी' देश के किसी अनुभवी राजनेता से कोई सवाल पूछे। और ये मामला उस वक्त और भी दुर्लभ हो जाता है, जब वो डिप्लोमेट चीन का हो।

खासकर ये मामला और भी दुर्लभ उस वक्त हो जाता है, जब ये सवाल किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में पूछा जाए और वो भी उस शख्स से, जिसके पास डिप्लोमेसी का विशालकाय अनुभव हो और वो डिप्लोमेट चीन मे भी अपनी डिप्लोमेसी का लोहा मनवा चुका हो।

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चीन को लेकर ये मामला दुर्लभ इसलिए है, क्योंकि बिना हेड क्वार्टर के आदेशों के चीन के डिप्लोमेट्स एक शब्द भी नहीं बोलते हैं और किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में 'दुश्मन देश' से सवाल पूछना तो असंभव ही लगता है।

चीनी डिप्लोमेट का एस. जयशंकर से सवाल

पिछले दिनों राजधानी नई दिल्ली में एक प्रमुख भारतीय समाचार पत्र की तरफ से आयोजित मीडिया कार्यक्रम में ऐसी दुर्लभ घटना घटित हुई। जब सवाल पूछने वाला शख्स नई दिल्ली में चीनी दूतावास का डिप्लोमेट झोउ योंगशेंग थे। झोउ योंगशेंग नई दिल्ली में चीनी दूतावास में तैनात चीन की विदेश नीति के सलाहकार हैं।

विदेश नीति के मामले में एस. जयशंकर को मोदी सरकार का चाणक्य कहा जाता है और चीन में काम करने का भी उनके पास काफी लंबा अनुभव है।

चीनी डिप्लोमेट का सवाल यह था, कि चीन और भारत, 'महत्वपूर्ण पड़ोसियों' के रूप में, कैसे समान हित को हासिल कर सकते है और प्रतिद्वंद्वी होने के बजाय क्या भागीदार बन सकते हैं?

जिसपर भारतीय विदेश मंत्री ने जवाब दिया, कि "मुझे लगता है, कि यह हमारे सामान्य हित में है, LAC पर हम दोनों के इतने ज्यादा फोर्स नहीं होने चाहिए। यह हमार साझा हित में है, कि हम अपने बीच हुए समझौतों का पालन करें, और आज के संदर्भ में ये सिर्फ साझा हित में नहीं, बल्कि चीन के हित में भी है।"

भारतीय विदेश मंत्री यहीं नहीं रुके, उन्होंने पिछले चार वर्षों से एलएसी के दोनों ओर मजबूत सैन्य उपस्थिति का जिक्र किया और कहा, 'तनाव ने हम दोनों के लिए अच्छा काम नहीं किया है। इसलिए जितनी जल्दी हम इसे सुलझा लेंगे, मेरा सचमुच मानना है, कि यह हम दोनों के लिए अच्छा है। और मैं अभी भी निष्पक्ष, उचित परिणाम खोजने के लिए प्रतिबद्ध हूं। लेकिन, एक ऐसा समझौता, जो समझौतों का सम्मान करता है, जो एलएसी को मान्यता देता है, और यथास्थिति को बदलने की कोशिश नहीं करता है।'

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भारत की घरेलू राजनीति पर क्या बोले जयशंकर?

वहीं, जब कार्यक्रम में एस. जयशंकर से भारत की घरेलू राजनीति को लेकर पूछा गया, कि लोकसभा चुनाव मे और ज्यादा सीट जीतने के बाद मोदी सरकार सीमा विवाद को लेकर और भी सख्ती से बात करने की स्थिति में आ जाएगा, तो भारतीय विदेश मंत्री ने कहा, कि "मेरे लिए भारतीय क्षेत्र और सीमा विवाद को सुलझाने का मुद्दा इस बात पर कोई निर्भर नहीं करता है, कि कितनी सीटों पर जीत मिलती है। बात सिर्फ इतनी है, कि ये डील अच्छा है या नहीं। आज का मुद्दा ये नहीं है, कि आपके पास राजनीतिक बहुमत है या नहीं, मुद्दा सिर्फ ये है, कि आपके पास उचित सौदा है या नहीं।"

भारतीय विदेश मंत्री ने कार्यक्रम में साफ शब्दों कहा, कि चीन के साथ सीमा विवाद भारत के लिए 'राष्ट्रीय चिंता' की बात है, चाहे शासन किसी का भी हो, चाहे किसी भी पार्टी के पास संसद में कितनी भी बहुमत क्यों ना हो।

इस कार्यक्रम के दौरान ऑस्ट्रेलिया, भूटान, जर्मनी, इंडोनेशिया और नेपाल के डिप्लोमेट्स भी मौजूद थे और भारतीय विदेश मंत्री ने इस दौरान बताया, कि चीन के विदेश मंत्री वांग यी से वो कैसे संपर्क में हैं, जिन्हें वो पिछले कई सालों से जानते हैं।

भारतीय विदेश मंत्री ने कहा, कि "हम लगातार संपर्क में हैं। गलवान घटना वाली सुबह भी वांग यी से ही मैंने बात की थी, जब एलएसी पर स्थिति काफी ज्यादा तनावपूर्ण और खतरनाक थी।"

क्या संबंधों में नरमी चाहता है चीन?

दिलचस्प बात ये है, कि चीनी डिप्लोमेट ने भारतीय विदेश मंत्री से उस वक्त सवाल पूछा है, जब पीएम मोदी के अरूणाचल प्रदेश की यात्रा पर चीन ने सवाल उठाया था और जिसका भारतीय विदेश मंत्रालय ने करारा जवाब दिया था।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल ने चीनी आपत्तियों को खारिज करते हुए कहा, कि "अरूणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा था, है और हमेशा अभिन्न अंग बना रहेगा।"

भारत ने साफ शब्दों में कहा, कि भविष्य में जब भी सीमा विवाद को लेकर बात होगी, उसमें अरूणाचल प्रदेश शामिल भी नहीं होगा। विदेश मंत्रालय ने कहा, कि भारत सीमा विवाद पर बातचीत को फिर से शुरू करने के पक्ष में है, लेकिन वो बातचीत गलवान और दूसरे जगहों पर होगी, जिन क्षेत्रों में चीन ने 2020 में जमीनी यथास्थिति का उल्लंघन किया था।

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