क़तर की पहल के बाद भी खाड़ी से लौटने वाले मज़दूर भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती

खाड़ी से लौटने वाले मज़दूर भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती

क़तर ने रविवार को श्रम क़ानून में एक सुधार किया है, जिसका वहाँ काम कर रहे प्रवासी भारतीय मज़दूरों ने आम तौर पर स्वागत किया है.

नए क़ानून के अंतर्गत अब किसी को नौकरी बदलने के लिए अपने क़तरी कफ़ील (स्पॉन्सर) से एनओसी नहीं लेना पड़ेगा और उनका न्यूनतम वेतन 1,000 क़तरी रियाल यानी लगभग 20 हज़ार रुपए प्रति महीना तय कर दिया गया है.

2022 के फ़ुटबॉल विश्व कप के लिए स्टेडियम बनाने के काम में लगे भारत, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हज़ारों प्रवासी श्रमिकों को इस ख़बर से राहत मिली होगी, क्योंकि मानवाधिकार संस्थाएँ अक्सर मज़दूरों के शोषण का मुद्दा सरकार के सामने रखती रही हैं.

दिल्ली स्थित सोसायटी फ़ॉर पॉलिसी रिसर्च एंड एम्प्लॉयमेंट की सीनियर रिसर्चर डॉक्टर महजबीन बानू कहती हैं, "यह श्रम सुधार की दिशा में एक बड़ा क़दम है."

वे अंतरराष्ट्रीय श्रम प्रवासन के क्षेत्र में सालों से काम कर रही हैं. वो कहती हैं, "मैं क़तर के प्रयासों की सराहना करती हूँ, क्योंकि वह मज़दूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए सही दिशा में आगे बढ़ रहा है."

डॉक्टर बानू के अनुसार, "क़तर में मज़दूरी का भुगतान न करने के मामलों की बड़ी संख्या है. ऐसे में यह भी चुनौती होगी कि क़तर उन मामलों को कैसे निपटाएगा और मज़दूरी का भुगतान कैसे कराया जाएगा."

जिस तरह का क़ानून क़तर में लागू किया गया है, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने उसे 2015 में ही लागू कर दिया था.

खाड़ी से लौटने वाले मज़दूर भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती

क्या कहते हैं श्रमिक

क़तर की राजधानी दोहा में काम करने वाले कुछ भारतीय मज़दूरों ने कहा कि नौकरी बदलने के लिए कफ़ील की सहमति न लेने की ज़रूरत उनके लिए बहुत अहम ख़बर है.

उनके अनुसार, इससे कफ़ील द्वारा होने वाला शोषण ख़त्म हो जाएगा. उनका कहना है कि कोरोना महामारी के दौरान सैकड़ों मज़दूरों को नौकरियाँ गँवानी पड़ी थीं. इनमें से कई ऐसे थे, जिन्हें क़तर में ही नौकरियाँ मिल जातीं, लेकिन कफ़ील की सहमति न होने के कारण उनमें से कई को भारत लौटना पड़ा.

नया क़ानून राहर भरी ख़बर तो लाया है, लेकिन क़तर में काम करने वाले लगभग तीन लाख भारतीय मज़दूरों के सिर पर बेरोज़गारी की तलवार अब भी लटक रही है.

बिल्डिंग मैटेरियल की एक दुकान चलाने वाले हैदराबाद से गए नियाज़ सिद्दीक़ी कहते हैं, "भारतीय मूल के कामगारों के बीच नौकरी गँवाने का ख़तरा आम तौर पर हमेशा बना रहता था लेकिन महामारी के बाद हज़ारों मज़दूरों की नौकरियाँ चली गईं. अब बेरोज़गारी बढ़ने का ख़तरा और बढ़ गया है."

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बेरोज़गारी का सामना अब भी जारी

दरअसल भारत से गए लाखों मज़दूरों को सभी खाड़ी देशों में बेरोज़गार होने के ख़तरे का सामना करना पड़ रहा है.

नौकरियाँ गँवाने वाले हज़ारों मज़दूर अब तक देश वापस आ चुके हैं. बहुत सारे लोग नौकरी से हाथ धो चुके हैं, लेकिन उनमें से कई ग़ैर-क़ानूनी तौर पर वहीं रह रहे हैं.

कई लौटना चाहते हैं लेकिन उनके पास वापस लौटने के लिए हवाई जहाज़ का किराया तक नहीं है. ऐसे मज़दूरों में से एक ने सऊदी अरब के शहर मदीना से बताया कि वो दोस्तों के साथ रह रहा है और किसी तरह से उसका गुज़ारा हो रहा है.

सऊदी सरकार ने महामारी के दौरान अवैध तौर पर रह रहे मज़दूरों को अपने देश लौटने की अनुमति दे दी है, जिसके कारण कई वापस भारत लौट गए हैं.

लेकिन इस समय भारतीय मज़दूरों को सबसे अधिक परेशानी कुवैत में हो रही है, जहाँ भारतीय दूतावास के अनुसार लगभग 10 लाख मज़दूर काम कर रहे हैं. दूतावास के मुताबिक़, इनमें अवैध तौर पर रह रहे 10,000 मज़दूर शामिल नहीं हैं.

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कुवैत की नेशनल असेंबली ने पिछले महीने एक क़ानून पारित किया, जिसके अनुसार भारतीयों को देश की कुल 43 लाख आबादी का 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए. देश की कुल आबादी में से वर्तमान में केवल 13 लाख ही कुवैती हैं.

इस क़ानून के कारण भारत के आठ लाख मज़दूरों को देश वापस लौटना पड़ सकता है. उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कई प्रवासी श्रमिकों ने इसे लेकर आवाज़ उठाना शुरू कर दिया है. वो भारत सरकार से देश वापस लाए जाने की मांग कर रहे हैं.

इनमें से लगभग 30 हज़ार कुवैत सरकार के मुलाज़िम हैं. कुवैत के वित्त मंत्री ने कहा है कि देश में 6.5 अरब डॉलर की तरलता बाक़ी रह गई है, जो अक्तूबर के बाद सरकारी कर्मचारियों वेतन को कवर करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी.

इससे सरकारी सेवाओं में काम करने वालों पर असर पड़ने की संभावना है. भारतीय दूतावास के अनुसार, कुवैत में सरकारी सेवाओं के लिए 30,000 भारतीय मज़दूर काम करते हैं.

खाड़ी से लौटने वाले मज़दूर भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती

भारत की बढ़ेंगी मुश्किलें

खाड़ी देशों से भारतीय मज़दूरों का वापस आना आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रही भारत सरकार के लिए दो मायनों में बुरी ख़बर है.

पहला तो यह कि सऊदी अरब, क़तर, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन में काम करने वाले भारतीय मुलाज़िम हर साल 30 से 35 अरब डॉलर रेमिटेंस भारत भेजते हैं.

खाड़ी देशों में भारतीय मज़दूरों की संख्या 85 लाख के क़रीब बताई जाती है. अगर इन में से आधे भी लौट आए तो रेमिटेंस की राशि भी आधी हो जाएगी. यानी भारत की कमाई का एक बड़ा साधन प्रभावित होगा.

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भारत के सामने दूसरी चुनौती यह होगी कि लौटने वाले मज़दूरों के पुनर्वास का इंतज़ाम करना पड़ेगा. अंतरराष्ट्रीय फ़्लाइट्स दोबारा खुलने के बाद भारत सरकार और राज्य सरकारों को आने वाले कुछ महीनों में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. उन्हें खाड़ी देशों से लौटने वाले मज़दूरों के पुनर्वास के लिए अभी से क़दम उठाने पड़ेंगे.

डॉक्टर महजबीन बानू कहती हैं, "भारत सरकार खाड़ी देशों से लौटने वाले भारतीय प्रवासी मज़दूरों का कौशल सेट और डेमोग्राफ़ी का डेटा इकट्ठा करे और भारतीय श्रम बाज़ार में उनकी खपत के लिए एक ठोस योजना बनाए."

उन्होंने कहा, "भारत सरकार को अपने दूतावासों के साथ मिलकर ये सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि सबको उनका वेतन मिल गया हो और उनका शोषण न हुआ हो."

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जिन राज्यों को भारत लौटने वाले मज़दूरों के लिए ज़्यादा काम करना पड़ेगा, उनमें केरल, उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडीशा और बंगाल शामिल हैं.

केरल सरकार का कहना है कि हवाई यात्रा खुलने के बाद पाँच लाख प्रवासी मज़दूर खाड़ी से लौट सकते हैं.

डॉक्टर बानू के अनुसार, राज्य सरकारों के लिए ये एक बड़ी समस्या है और इसके समाधान के लिए अभी से काम करने की ज़रूरत है.

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