US Federal Reserve: अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने फिर बढ़ाई ब्याज दरें, जानिए क्या होगा भारत पर असर?
US Federal Reserve: अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने एक बार फिर से ब्याज दरों में इजाफा किया है और इस बार फेडरल रिजरव ऑफ अमेरिका ने ब्याज दरों को बढ़ाकर 5.25 प्रतिशत से 5.50 प्रतिशत कर दिया है। पिछली 12 बैठकों में ये 11वीं बार है, जब फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को बढ़ाने का फैसला किया है।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व जब ब्याज दर बढ़ाता है, जिसे फेडरल फंड्स रेट भी कहा जाता है, तो इसका मतलब उस ब्याज दर को लेकर होता है, जो वाणिज्यिक बैंक्स एक दूसरे को दिए रातोंरात ऋण के एवज में वसूलते हैं।

इसका मतलब ये हुआ, कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरें को बढ़ाने के फैसले के बाद, वाणिज्यिक बैंकों के लिए एक-दूसरे से ऋण उधार लेना ज्यादा महंगा हो जाएगा। भारत में, जब आरबीआई द्वारा ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं, तो वाणिज्यिक बैंकों को आरबीआई से उच्च ब्याज दरों पर पैसा उधार लेना पड़ता है।
दुनियाभर के सेन्ट्रल बैंक्स, देश में महंगाई को कंट्रोल में करने के लिए ब्याज दरों को बढ़ाने का फैसला करती हैं, जिसका मकसद महंगाई को कम करना होता है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व में 12 बैठकों में से 11 बैठकों में ब्याज दरों को बढ़ाया है और इसका सबसे बड़ा असर ये हुआ है, कि अमेरिका में महंगाई कम हो गई है। हालांकि, फेडरल रिजर्व ने इस बात के पूरे संकेत दे दिए हैं, कि सितंबर महीने में होने वाली बैठक में भी ब्याज दरों में इजाफा किया जाएगा।
ब्याज दरों में वृद्धि का क्या होगा असर?
जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरें बढ़ाता है, तो चिंताएं होती हैं कि इससे अमेरिका में आर्थिक विकास धीमा हो सकता है, क्योंकि ब्याज दरों के बढ़ने की वजह से अमेरिका से उधार लेना महंगा हो जाता है। जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था धीमी होती है, तो इसका असर सबसे पहले भारतीय आईटी कंपनियों पर पड़ता है।
हम पहले से ही भारत में आईटी क्षेत्र में मंदी देख रहे हैं और टेक महिंद्रा और इंफोसिस जैसी कंपनियों के तिमाही नतीजे अच्छे नहीं रहे हैं।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों को बढ़ाने का दूसरा प्रभाव यह होता है, कि अमेरिका में सॉवरेन बांड पर ब्याज दरें ऊंची हो जाती हैं और इसलिए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक, अब भारत में स्टॉक बेच सकते हैं और यूएस बांड में निवेश कर सकते हैं।
आइए इसे थोड़ा समझते हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक, भारत के सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड से रजिस्टर्ड होते हैं, जो भारतीय शेयरों में निवेश करते हैं।
जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को बढ़ा देता है, तो विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी बैंक में पैसा जमा करने पर ज्यादा रिटर्न मिलने लगता है और जब ब्याज दरें ज्यादा हो जाती हैं, तो निवेशकों के लिए यूएस सॉवरेन बांड में निवेश करना काफी ज्यादा सुरक्षित हो जाता है, लिहाजा अब आशंका इस बात को लेकर है, कि विदेशी निवेशक भारतीय स्टॉक बेच सकते हैं और अमेरिका में सरकारी बांड खरीद सकते हैं।
इससे भारत में विदेशी मुद्रा भंडार कम हो सकता है।
हालांकि, रेट बढ़ोतरी का अनुमान पहले से ही था, लिहाजा भारतीय शेयर बाजारों पर इसका ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन, विदेशी मुद्रा भंडार के घटने की वजह से भारतीय रुपया कमजोर हो सकता है और विदेशी सामानों का आयात महंगा हो सकता है, जिससे देश में महंगाई बढ़ सकती है, लिहाजा इस स्थिति को टालने के लिए आरबीआई भी ब्याज दरों को बढ़ा सकता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दर बढ़ाने के फैसले से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ना तय माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
वर्तमान में, चिंताएं इस बात की हैं, कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों में बढ़ोतरी से दुनिया भर में आर्थिक विकास धीमा हो सकता है और मंदी आ सकती है। जब ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो होता ये है, कि उधार लेने के बदले ज्यादा ब्याज दरों का भुगतान करना पड़ता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बोझ पड़ता है।
इसलिए, जिस देश ने अमेरिका से ऋण ले रखा होता है, या फिर जिस किसी व्यक्ति ने भी बैंकों से ऋण ले रखा होता है, उसे अब ज्यादा ब्याज का भुगतान करना होगा, लिहाजा उसकी जेब में कम पैसा होगा, जिसका नतीजा ये निकलेगा, कि लोग अपनी खर्च में कटौती करेंगे, जिससे मुद्रास्फीति कम होती है, और मध्यम अवधि में मंदी आ सकती है।
इसलिए, अमेरिका में ब्याज दरों को बढ़ाने का जो सिलसिला चल रहा है, उसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंदी के तौर पर हो सकता है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी का जो सिलसिला चल रहा है, उससे शेयर बाजारों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि निवेशक अधिक जोखिम वाले शेयरों से पैसा निकालकर अमेरिका के सुरक्षित सरकारी बॉन्ड में निवेश करना शुरू कर सकते हैं।
ब्याज दरों में वृद्धि का असर सोने जैसी कीमती धातुओं पर भी पड़ता है, क्योंकि इससे व्यक्ति और निवेशक सोने में बिक्री करके सुरक्षित सरकारी बांडों में निवेश करना शुरू कर देते हैं।
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